30 दिसंबर 2016

सपने

से रात की उदासी अच्छी लगने लगी थी, नहीं भाता तो सड़कों पर दौड़ते टायरों की आवाज़, वह तारों को देखकर अपने सपने आसमान की तरफ उछाल देता और देर तक ऊपर देखता रहता कि शायद कोई सपना टूटकर बिखर जाए और रात का काला आसमान उसके सपनों के रंग में जल उठे। लेकिन उसके सपने भी धीरे धीरे काले होने लगे थे जो उसकी आँखों के नीचे धंस गये थे, उसकी आँखों का कालापन रोज दर रोज बढ़ता जाता लेकिन सपने उछालना उसने बंद नहीं किए। जब बहुत देर तक भी आसमान का रंग ना बदलता तो वह समुद्र की तरफ चला जाता और लहरों की आवाज़ मे सपने ढूंढता, उसके सपने लहरों मे चमकते थे। वह लहरों को बहुत देर तक पढ़ता और चमकते सपनों की माला गूँथ कर अपनी जेब मे डाल लेता, सुबह उसकी जेब भीगी हुई होती। लहरों का खारा पानी और उसकी जेब की मुहब्बत के किस्से मशहूर होने लगे थे, लोग उसके पास सपनों और जेब की कहानियां सुनने आते।  एक रोज़ सपनों और लहरों की कहा सुनी हो गई जेब सूखी रहने लगी, लहरों का चमकना बंद हो गया और लहरें पत्थरों से टकराकर वापस लौटने लगीं, उसकी आँखों का कालापन और भी बढ़ गया। आसमान के तारों को उसके सपनों से रंजिश थी लेकिन वह उसके सपनों से ही चमकते थे, उन्हे लहरों पर हंसी आती थी, उसने लहरों को पढ़ना बंद कर दिया था और लहरें सफेद सी उदास हंसी बन कर किनारों पर बिखर जाती, तारे और आसमान उसकी जेब मे बची हुयी सपनों की माला भी साथ ले गए, आसमान काले और तारे और चमकीले हो गए, शहर रोशनी से भर गए, सड़कों का शोर और बढ़ गया। वह ना जाने कहाँ चला गया, कहते है वह पहाडों पर चला गया, इसीलिए वहां की नदियां सपनों के गीत गाती हैं और आसमान तारों से भरकर चमकता है और शहर के आसमान काले हो गए, तारों ने भी चमकना वहां बंद कर दिया.........लहरें अब दुखी रहने लगीं और अपनी सफेद उदासी को किनारों पर  छोड़कर वापस लौट जातीं हैं।

29 दिसंबर 2016

मैं तैनू फ़िर मिलांगी

मृता के लिए इमरोज़ की कविता--
"अब ये घोसला घर चालीस साल का हो चुका है
तुम भी अब उड़ने की तैयारी में हो,
इस घोसला घर का तिनका-तिनका,
जैसे तुम्हारे आने पर सदा,
तुम्हारा स्वागत करता था,
वैसे ही इस उड़ान को,
इस जाने को भी,
इस घर का तिनका-तिनका
तुम्हें अलविदा कहेगा।"
— इमरोज़
यह आखिरी कविता थी इमरोज़ की जो उन्होने अमृता के लिए लिखी थी, और तब लिखी थी जब अमृता अपने आखिरी दिनों मे थी, बिस्तर से उठना भी नहीं होता था। यूं तो इमरोज़ को पुनर्जन्म मे कोई भरोसा नहीं था लेकिन अमृता बार बार कहती थीं कि मैं तुम्हें फिर मिलूंगी। अपनी आखिरी कविता में इमरोज़ को वह कहती हैं,
मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे ? किस तरह पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते
इक रह्स्म्यी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी।
एक कलम पकड़ती थी तो दूसरा ब्रश का जादूगर, अमृता कुछ ना कुछ लिखती रहतीं थीं और कई बार वह अपनी उँगलियों से साहिर का नाम इमरोज़ की पीठ पर लिख देती थी। सोचता हूँ कभी कभी इमरोज़ जितना बेचारा इंसान कौन होगा? जिसके साथ जीवन के 41 बसंत बिता दिए बिना शादी किए वह उसी की पीठ पर किसी और का नाम लिखती है और कहती भी है कि अगर मुझे साहिर मिल गया होता तो तू ना मिलता। इमरोज़ हंस कर कह दिया करते कि मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ अदा करते हुए ढूँढ़ लेता। मुहब्बत की मिसाल थे दोनों, कहते हैं कि कभी इमरोज़ और अमृता मे कभी कोई तकरार भी नहीं हुई और ना ही कभी दोनों ने एक दूसरे को मुहब्बत का इज़हार किया। यह मोहब्बत सारी खुदाई से ऊपर है.... अगर इन दोनों को पढें तो ज़िन्दगी एक चिठ्ठी लगने लगती है, मुहब्बत का खत जहां मुहब्बत का ज़िक्र नहीं। मुंबई आने पर चंडी भैया के साथ एक प्रोग्राम मे जाना हुआ था, वह अमृता और इमरोज़ पर ही था। इसे आप मेरा कबूलनामा मानें या फिर जो भी लेकिन इमरोज़ से वह मेरी पहली मुलाकात थी उनके इस दुनिया से कूच करने के बाद, अमृता को गाहे बगाहे पढ़ा था लेकिन इस नज़र से नहीं.... तब से लेकर आज तक मैंने किसी ना किसी तरह दोनों को पढ़ने की कोशिश की, उस दिन के बाद मैंने अमृता की कोई तस्वीर नहीं देखी.... इमरोज़ के शब्दों से देखा है उन्हे... सोचता हूँ कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है... या कोई किसी पर ऐसे कैसे मर सकता है.... इमरोज़ कहते हैं..
"अमृता जब भी खुश होती-
मेरी छोटी-छोटी बातों पर
तो वो कहती-
वे रब तेरा भला करे।
और मैं जवाब में कहता हूँ-
मेरा भला तो
कर भी दिया रब ने
तेरी सूरत में
आकर..."
और जो इमरोज़ पुनर्जन्म को नहीं मानते था वह अमृता के जाने को भी नहीं स्वीकार पाए।
"उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं" - कहते हुए एक दिन इमरोज़ भी चले गए और पीछे छोड़ गए मोहब्बत के किस्से।
अमृता और इमरोज़ आज खयालों मे कैसे आए नहीं जानता....लेकिन कुछ थोड़ा बहुत जो जान पाया वह यहां है।


- नीरज 

सपने

उसे रात सपने नहीं दिखाती थी एक तलब जगाती थी कुछ करने की, वह रात मे सोचता था क्या किया सही और क्या गलत... रोज़ एक नए रेजोल्यूशन बनाता और रोज़ उन्हे तोड़ देता लेकिन खुद कभी नहीं टूटा। ज़िन्दगी से उसे कोई शिकवे नहीं थे अब और ना ही कोई नई अभिलाषा या महत्वाकांक्षा, विश वाले खत पर जब उसके विश के लिखने की बारी आई तो उसके पास कुछ था ही नहीं मांगने को, सब तो था उसके पास, जीने रहने और खाने के लिए माकूल पैसे कमा लेता था, घर पर भी थोड़ा बहुत भेज देता था, और कुछ ना बचाते हुए भी खुश रहता था। हर रात नए सपने बुनता बिना सोए और सुबह होते ही सपनों को तकिये के पास रखकर करीने से सजा देता, ऐसा करते करते लाखों सपने इकठ्ठे हो गए थे, उसके पास अब जगह नहीं बची थी सपनों को और रखने के लिए लेकिन सपने बुनना भी जरूरी था। उसने एक रास्ता ढूंढा और सपनों को छांँटना शुरु किया, जो सपना पूरा नहीं हुआ था उन्हे फिर से बुनने लगा, लेकिन अब सपने उसके साथ चलने लगे, जीवन की खुशी काफूर होने लगी, खुशियां सपनों के धागे बनने लगीं, वह अब रात मे जब खिड़की के बाहर देखता तो हर तरफ शोर चलता हुआ दिखता और अधूरे सपने उस शोर को और बढ़ाते रहते, खुशियों की लगातार कमी के चलते सपनों ने विद्रोह कर दिया था.....अधूरे सपने दुखी होने लगे थे और जगह जगह से फटने लगे थे वह रोज उस सपने मे पैबंद लगाता जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती, देखते देखते बाकी सपने गुमने लगे, तकिये के पास फिर जगह बन गयी थी और पैबंद लगे सपनों को वह खिड़की पर टांग देता, सपने रात भर शोर से मिलकर साजिश रचते हैं और वह एक नई पैबंद किसी जरूरी सपने मे लगाता है, उसकी खुशियां जल्द ही आएंगी वापस, बहुत जल्द वह सपनों को खाली कर देगा और धागे बचाएगा....... इतने सपने नहीं बुनेगा कि पैबंद की जरूरत पड़े। उसने खुद से वादा किया है..... वह खुशियों के सपने देखेगा क्यूंकि सिर्फ वही सपने धागे बनाते हैं।
टूटा वह अब भी नहीं है..... वह एक दिन एक घर बनाएगा, बड़ा सा घर और फिर ढेर सारे सपने बुनेगा, और उन्हे करीने से सजाएगा. उतने बड़े घर मे सपने ज्यादा नहीं होंगे, पैबंद की जरूरत नहीं पड़ेगी और ना ही सपने छाँटने की.... वह खूब धागे बचाएगा, खूब धागे और अगली बार विश मांगने वाले खत पर एक विश जरूर लिखेगा।

27 दिसंबर 2016

दिल्ली #1

चाँद शांत पानी में झलकता रहा,
लहरों ने टुकड़े बिखेर दिए।
दिल्ली आज फिर शिद्दत से याद आ रही है। कई शहरों में रहा लेकिन दिल्ली दिल में घर कर गयी, इसके अपने कारण हैं, हर शहर रोज उठता है, दौड़ता है और थक हार कर रात में तनहाइयाँ गिनता है, सोता फिर भी नहीं , लेकिन दिल्ली सोती है चैन की नींद, आखिर उसे अगली सुबह लिखनी होती हैं हज़ारों कहानियां। कहानियां जिनमे हम और आप बड़ी शिद्दत से अपनी अपनी चाय और कॉफ़ी की चुस्की लेते रहते हैं। दिल्ली रुलाती है, हंसाती है, नचाती है, दौड़ाती है और जब ज्यादा हो जाता है तो ठंढ की लिहाफ में भींच कर सुला देती है। दिल्ली मुस्काती है कातिल हंसी, कुछ इसमें उलझ कर खो जाते हैं और कुछ आग में डुबकी लगाकर आँखें खोलकर खौलते लावे से आँखों को सेंक लेते हैं। दिल्ली महबूब है , महबूबा नहीं, दिल्ली दर्द है, और है वह जिसमे डूबकर ग़ालिब भी काफ़िर हो गए।
खैर, बहुत कुछ खोकर पहुंचा था यहाँ, दिवाली से ठीक एक दिन पहले, पूर्वा एक्सप्रेस थी शायद, कोलकाता से दिल्ली.........थोड़ी देर हो गयी थी, स्टेशन पहुँचने पर अलग ही नज़ारा था, सरसो गिराने की भी जगह ना थी, हर कोई अपने अपने घर पहुँच जाना चाहता था, हर किसी का कोई इंतज़ार कर रहा था सिवाय मेरे, जिसको यह भी नहीं पता था कि उसे जाना कहाँ है। दिल्ली भले ही छोटी दिखती हो , है बहुत बड़ी, बड़ी बड़ी चौड़ी सड़कें, एक के ऊपर एक.......इंसान तो बढ़ा ही है इस शहर में, उससे भी तेजी से बढ़ी हैं सड़कें और उनका चिकनापन.......काली धारदार सड़कें, कि उनमे अपना मुह भी चमक जाये। स्टेशन के बाहर पीली रोशनी बिखरी हुई थी, आँखों को चकाचौंध कर देने के लिए काफी थीं, दूर तक कारों, ऑटो और गाड़ियों का काफिला दिख रहा था, रुकी हुई , खुद से यह पूछने की कोशिश में लगी हुई थीं, कि यह कारवां है किसका, कौन है वह तुग़लक़ जो इन्हें रोज़ इस काफिले से जोड़ता जाता है। ऐसा लगा जैसे काफिले का हर शख्स मुझे ही देख रहा है, सबके अंदर एक बेचैनी है मुझे मेरी मंज़िल तक पहुँचाने के लिए सिवाय मेरे जिसकी मंज़िल का पता ही गुमा हुआ था। काफिले से थोड़ा अलग जहाँ स्टेशन थोड़ा एकांत हो जाता है, कुछ लोग बेतरतीबी से पड़े हुए थे, एक के बाद एक, लाशों को ऐसे कैसे फेंक दिया गया है बबल में रैप करके, दिल्ली तो ऐसी न थी, सामने एक अखबार वाला आया, जेब टटोली तो तीन रुपये मिल गए, पर्स में थे कुछ पैसे लेकिन पर्स में थे जेब में नहीं , ले लिया एक अखबार। कोने की न्यूज़ में था कि गरीबों को बाँटे गए बबल रैप, ओह.........तो वह लाशें नहीं बबल रैप में लिपटे इंसान हैं, क्या सच में गर्म है वह रैप ? कुछ देर यूँ ही बैठा रहा, रात के १२ बज चुके थे, दिवाली आ गयी थी और उसकी तैयारियां हर तरफ थीं, और मैं अपने को बबल में लपेटने की सोच रहा था, एक रात ऐसी भी सही, तभी फ़ोन बजने लगा, पापा का फ़ोन था, "पहुँच गए ठीक से?"
"हाँ पापा, पहुँच गया "
"कोई परेशानी तो नहीं है न?"
"नहीं, बिलकुल नहीं, किसी का फ़ोन नहीं मिल रहा, इतनी रात गए किसका दरवाज़ा खटखटाउं? होटल ले लिया है " - अपने पर्स को एक बार छू के देखता हूँ और कहता हूँ खुद से ही ,"ग़ालिब रहने के ठौर और भी हैं "
"ठीक है , कोई दिक्कत हो तो फ़ोन कर देना "
मम्मी अचानक से आ जाती हैं फ़ोन पर ,"ठंढी बहुत होई न वंह ? कहत रहली कि लेते जा जाकिट, लेकिन तुहें तो लगत नाई ठंढी ?"
माँ का प्यार और दिल कोई नहीं बन सकता और न बाप का स्नेह कोई दे सकता है, पापा भी शायद पूछना चाहते थे , लेकिन पूछ नहीं पाए, हर बाप अपने बेटे को मजबूत देखना चाहता है, टूटते और बिखरते हुए नहीं। वह बोले थे जब गांव से निकला था, पैसे की कोई दिक्कत हो तो मांग लेना , भेज दूंगा। लेकिन उनको भी पता था कि अब नहीं मांगूंगा, कुछ भी हो जाये।
"अरे हम ठीक हई, होटल में बाटी, रजाई बहुत मोट बाय, खिड़किया खोलले हई तनी तो आवाज़ अंदर आवत बाय , अब रखा, बिहान बतिआईब। " अपने पर्स को एक बार फिर छूता हूँ, और जल्दी से फ़ोन रख देता हूँ, बैलेंस ख़तम हो गया तो दिक्कत हो जाएगी और अगर माँ को पता चल गया कि कहाँ हूँ तो उसे रात भर नींद नहीं आएगी, नाज़ों से पाले बेटे को बाहर रात गुज़ारना पड़े, वह शायद यह सह नहीं पाती और घंटों अपने पति को सुनाती कि दिल्ली के सारे जानने वाले और रिश्तेदार मर गए हैं क्या जो उसके बेटे को अपने घर रख भी नहीं सकते या फिर उसने यूँ ही अपनी ज़िन्दगी सबकी सुनने में ख़तम कर दी और रोती तब तक जब तक कि आंसूं सुख नहीं जाते, वह सो नहीं पाती रात भर और सुबह होते ही उसका फ़ोन दनदनाते हुए फिर आ जाता और साथ में आते कई औरों के फ़ोन जो अपनी झूठी कहानियां गढ़ कर नकली माफ़ी मांग रहे होते और मैं उनके होने या न होने का मतलब खोज रहा होता। खैर रात काली होने लगी थी ऊपर आसमान में और नीचे पीली रोशनी और तेज होती जा रही थी, बबल खोजने का काम शुरू कर दिया था, इतना गरीब भी नहीं था कि एक रात किसी होटल में न गुज़ार सकूँ, भला किस गरीब का बबल खींचूं? अंत में एक चाय की दुकान पर आकर चाय पीने लगा, रात लंबी लगने लगी थी और चाय कड़वी।
फ़ोन एक बार फिर गुर्राने लगा था, खीझ बढ़ रही थी कि इस गरीब की याद अब किसको आ गयी, फ़ोन उठाया ,"कहाँ है बे?"
"क क कौन?" शब्द बड़ी मुश्किल से निकले थे, इतने प्रेम की संभावना अब किसी तरफ नहीं दिख रही थी।
"नवीन "
"नवीन भैया ?"
"हाँ, नवीन भैया.......कहाँ है? दिल्ली पहुँच गया?"
"हाँ भैया, बस अभी अभी, ट्रेन लेट हो गयी थी " कितनी साफगोई से मैं झूठ बोल गया था, रश्क़ होता है आज खुद पर कि झूठ बोलना भी एक कला है और मैं उस दिन इस कला में हर पल पी एच डी करने की तरफ बढ़ा जा रहा था।
 "चुपचाप घर आ जा, तेरा ही इंतज़ार कर रहा था, साथ खाना खाएंगे " उन्होंने अपना पता दिया और फ़ोन रख दिया।
बहुत कुछ एक साथ दिमाग में चलने लगा था, आँखों में थोड़ी नमी भी थी जो कभी भी बाहर आने के लिए तैयार खड़ी थी, हलक थोड़ा रुंधने लगा था और बचपन के नवीन भैया और उनकी यादें , उनके थप्पड़ और उनकी चाय... सब कुछ गुथ्थम गुथ्था होकर दिमाग में दौड़ने लगा था, यह भी सोच रहा था कि इनको मेरा नंबर कैसे मिला? किसी तरह चाय वाले का पैसा पूछा और पहली बार पर्स से दिल्ली आने के बाद चार घंटों में पैसे निकाले, उसे दिए और ऑटो स्टैंड की तरफ बढ़ गया। रात का कालापन घटने लगा था और सामने सड़क पर बिछे, ठहरे हुए काफिलों के चेहरे चमक उठे थे।
"बदरपुर चलोगे भैया ?"
"हाँ हाँ साहब क्यों नहीं चलेंगे , आइये बैठिये"
"मीटर से चलोगे न?"
"अब इतनी रात गए मीटर से कौन चलता है भैया, दो सौ दे देना, मीटर से भी उतना ही आएगा और इतनी रात गए बदरपुर जाता कौन है, खाली ही आना पड़ेगा उधर से "
"अरे मुझे बदरपुर नहीं प्रहलादपुर जाना है, उससे पहले पड़ेगा " भैया ने बता दिया था, दिल्ली के इस छोर पर अकेले पहली बार जा रहा था।
"सही बताओ" मैंने फिर से पूछा , रात के साथ साथ मेरी भी छटपटाहट बढ़ती जा रही थी और बहुत कुछ चल रहा था दिमाग में जिसे एकांत की जरुरत थी।
"चलो एक सौ अस्सी दे देना, अब बैठो" उसके कहने में ऐसा था कि कहीं मैं दूसरे ऑटो की तरफ न बढ़ जाऊं।
"चलो"
"कौन से रस्ते से चलें भैया ? रिंग रोड ले लेते हैं , जल्दी पहुँच जायेंगे"
दिल्ली अब बचपन की दिल्ली नहीं रह गयी थी, बदल चुकी थी, सडकों का एक मायाजाल बिछ चूका था अब , मैं कहाँ जानता था सब और नहीं जानता हूँ, जाहिर भी नहीं करना चाहता था।
"ठीक है, वही ले लो जिससे जल्दी पहुँच जाएं " कहते हुए मैंने अपना सामान उठा के ऑटो में डाल दिया और बैठ गया।

ऑटो चल पड़ी थी, स्टेशन के बाहर भी भीड़ ही थी, अभी भी लोग आ रहे थे, सबको अपने घर पहुंचना था किसी भी तरह और मैं इस उधेड़ बन में था कि आगे क्या? आगे आकर सड़क और चौड़ी हो गयी थी, फुटपाथ पर कुछ लोग सोये हुए थे, ठंढ की आगोश अपने लिहाफ में बहुत कुछ समेटती है, यह किसी के लिए गर्म तो किसी के लिए ठिठुरती है, कोई बिना किसी सोच के सो रहा होता है आसमान के नीचे तो कोई ब्लोअर से गर्म घरों में भी बेचैनी से इधर उधर करवटें लेता है। लैम्पोस्ट जले हुए थे और सड़कें पहाड़ों सी कहीं ऊपर तो कहीं मैदान की तरह सोई हुईं थीं, दिमाग में घंटे बज रहे थे कि भैया को कैसे पता चला मैं दिल्ली आ रहा हूँ, फेसबुक वाली किताब पर तब उतना आना जाना नहीं होता था कि कहाँ जा रहा हूँ बताता चलूँ।
बचपन के कई किस्से अपनी किस्सागोई लिए उतर जाना चाहते थे आँखों की पलकों पर, ऑटो की आवाज़ और सामने सड़क का शोर मिलकर एक ऐसे एकांत को बना रहे थे जो अब सहा नहीं जा रहा था, अकेले होना अच्छा होता है, लेकिन किसी का अचानक आ जाना और आपके दुःख में शामिल हो जाना आपको हिला जाता है , मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।
नवीन भैया को तब से जानता हूँ जब से खड़ा होना सीख लिया था, कलकत्ते में हम जहाँ रहते थे, हमारा घर बहुत बड़ा हुआ करता था और हम वहां के बड़े लोगों में गिने जाते थे, हमारे घर के सामने एक पोस्टऑफिस था, आज भी है और उसके कोने पर सीढ़ियों के नीचे एक दुकान हुआ करती थी चाय की, नवीन भैया उसी चाय की दुकान को चलाया करते थे। हमारे घर के नीचे हमारी दुकानें थीं, एक कपडे की, एक जनरल स्टोर, एक आटा चक्की और एक दरजी की दुकान थी जिसे पलान दा चलाते थे, गरीब थे इसलिए उनसे कोई किराया नहीं लिया जाता था बदले में वह हम सबके कपडे सिल दिया करते थे, हम बच्चे उन्हें दादू कहा करते और वह दिन भर हमारे साथ खेल पुचकार करते। नवीन भैया दुकान पर किसी के भी आने पर चाय ले आया करते और हम बच्चे उन्हें भैया कहते, उनकी उम्र कोई ज्यादा ना थी, रही होगी कोई दस बारह साल, घर से कुछ दूर पर एक स्कूल था, कमला हाई स्कूल, वहीँ पढ़ते थे भैया, पढ़ते क्या थे सिर्फ परीक्षा देने जाते और कभी कभी स्कूल भी ऐंवई चले जाते। बड़े घर के थे हम लेकिन पापा नहीं चाहते थे कि हमें कोई अलग से सम्मान मिले बल्कि सब के साथ घुल मिल कर रहें, सबके प्रति इज्जत हो, तो नवीन भैया हम बच्चों के साथ खेलते, हम उनकी दुकान पर भी जाकर बैठ जाते और वह हमें कुछ न कुछ खिला दिया करते। पापा के लाख कहने पर भी वह पैसे न लेते, इस तरह नवीन भैया हमारे बड़े भाई थे और हम उनके छोटे भाई, एक बार कहीं बदमाशी करते हुए धर लिया गया, थोड़ा बड़ा हो गया था, उनका थप्पड़ आज तक याद है। घर आने पर जो जुत्तम जुताई पापा के हाथों हुई वह अलग, कुछ दिन नवीन भैया से कट्टी रही और फिर कब बोल चाल हो गयी, पता ही नहीं चला। नवीन भैया दिल्ली बहुत पहले आ गए थे, तीन भाइयों ने मेहनत करके न सिर्फ अपना घर बनाया बल्कि समाज में देखे जाने वाले नज़रिये को भी बदला, इससे बड़ी बात कुछ नहीं हो सकती। हमारे लिए वह जैसे पहले थे, वैसे ही आज भी हैं और रहेंगे।
प्रहलादपुर आ गया था और भैया भी वहीँ चौराहे पर अपनी बाइक लिए खड़े थे, घडी में सुई साढ़े बारह बजा रही थी। घर पहुंचा, "बताया क्यों नहीं कि दिल्ली आ रहा है?"
"अरे अचानक ही प्लान बन गया "
"पता है मुझे तेरा अचानक, मुझे मत बना "
ऐसी ही कुछ बातों के बीच हमने खाना खाया और मैं उनके घर के आगे वाले कमरे में सो गया, नींद जैसे दबोचे खड़ी थी, बिस्तर पर गिरते ही कब नींद आयी पता ही नहीं चला, सारी सोच, सारी समस्याएं न जाने कहाँ गायब हो गयीं, वैसे यह भी एक सच है कि जब पेट में भोजन और सर पर छत हो तो कई समस्याएं स्वतः ही ख़त्म हो जाती हैं और मेरे पास तो अब बड़े भाई का स्नेह भी था।

- नीरज 

27 अप्रैल 2016

एक नया आगाज़

ज़िन्दगी इतनी आसान कहाँ,
लेकिन कुछ है,
जो ज़िंदा रखता है शख्सियत हमारी।

आपके सुझाव और टिप्पणियों के इंतज़ार में Debutant's Trail



- नीरज 


19 अप्रैल 2016

अलिखा इतिहास


शाम ढल चुकी थी, रात बढ़ने लगी थी, समुद्र की लहरों पर रोशनी ने अपना डेरा डाल लिया था. रह रह कर चमक उठती थी उसकी निगाहें पानी की लहरों को रोशनी की रोशनाई में नहाते हुए, सामने टेबल पे रखा काग़ज़ खिड़की से होकर आती हुई हवा से उड़ने लगता था, पेपरवेट शायद इसी समय के लिए इज़ाद किए गये थे जिससे उड़ते पंखों को दबा कर रखा जा सके, वह अब भी चुपचाप खड़ा था, उसकी पीठ अब खिड़की की तरफ हो गयी थी और निगाहें अटक गयी थी पेपरवेट से दबे हुए फड़फड़ाते काग़ज़ पर. कमरे की रोशनी ज़्यादा नही थी और बाहर की रोशनी कमरे में पहुँच कर अपना अधिपत्य जमा लेना चाहती थी, टेबल पर बिखरी हुई किताबें कुछ कहानियाँ लिखना चाहती थी, लेकिन कलम शांत पड़ी हुई थी, किताबों मे वह साहस अब भी नही था कि वे कलम से लड़ाई लड़ सकें, हमेशा से ही कलमें किताबें लिखती आई हैं, किताबों ने कलम नही गढ़ा. लेकिन आज किताब के पन्ने रह रह कर सिहर उठते थे, ना जाने कितने इतिहास उन पन्नों में जब्त थे, वह भी जिन्हे कलमें लिख नही पाईं, लेकिन पन्नों ने निगाहों से उन्हे जब्त कर लिया अपने अंदर, किताबों के वह पन्ने अपने अंदर ज़ज़्ब उन कहानियों को आज लिख डालना चाहते थे, लेकिन कलम की रोशनाई का वह ज़ज़्बा कहीं जब्त हो गया था, उसके अंदर का सिपाही शहीद होकर काली इबारतों में चुनवा दिया गया था, और हर इबारत ज़िंदा होकर जल जाना चाहती थी. हवा तेज़ हो गयी थी, उसके अंदर का इंसान जिंदा हो जाना चाहता था, वह फिर से घूम गया खिड़की की तरफ, और समुद्र की लहरें सिमटती चली गयीं उसकी निगाहों में, खारापन उसकी रगों से निकलकर बहने लगा था, हर आँसू मीठा होने लगा था, हर जंगल फिर से बढ़ने लगे थे, ज़ख़्म भरने लगा था, और पूरी की पूरी कायनात दर्द से निज़ात पा चुकी थी, और उसकी आँखों से एक कतरा चुपके से ढूलक गया उसके गालों पर, किताब के पन्ने चुप हो गये, कलम खड़खड़ाते हुए नीचे जा गिरी, पूरा का पूरा अलिखा इतिहास रोशनाई में बह गया और समुद्र लहराकर साहिल से टकराकर वापस लौट गया.
सुबह का सूरज एक सिपाही की मौत पर रो रहा था, जो कभी नही लिख पाया सच............लेकिन उसके खून से क्षितिज लाल हो गया था, और कोई प्रवासी पक्षी सूरज की तरफ उड़ते हुए काले रंग में किसी कैमरे के लेंस में क़ैद हो गया. दुनिया वैसी ही चलती रही, लेकिन खिड़की के पर्दे उसकी कहानी के गवाह थे जो अब हवा के बहने पर भी तन कर खड़े रहते हैं, किताबों के हर्फ बर्फ में तब्दील होकर जम गये थे, उन्हे लिखने वाला अब कोई नही है.
- नीरज

20 मार्च 2016

उसने कहा था

सने कहा था कि कुछ ना कहना लेकिन समय की परतों पर जमती धूल ने उसे और उसके कहे को कहीं भुला दिया, अब ......अब क्या? ज़िंदगी? लेकिन ज़िंदगी भी इतनी आसान कहाँ......उसने कहा था, लेकिन उसका कहा मेरे अंदर हर्फ हर्फ वैसा ही रहा जैसे पतझड़ की शाम में गिरते पत्तों के बीच खड़ा मेरा वज़ूद कुछ भी नही देख पाता।
लिखता रहता हूँ कुछ कि भुला सकूँ,
कि उसने कहा था,
कुछ ना कहना,
और समय सिमटके,
फिर वहीं पहुँच जाता है,
जहाँ से शुरू होती है हर यात्रा जीवन काल की।
दुनिया गोल है, लेकिन क्या सब कुछ गोल है, कुछ तो ऐसा ज़रूर होगा जो गोल नही है, लेकिन जब भी इबारतों में छिपे हर्फ बोलते हैं, कतरा कतरा जम कर बहने लगता है, और समय के आयामों में तैरते हुए वह फिर हूबहू ठीक उसी तरह कैसे खड़े हो जाते हैं सामने?
उसने कहा था कि जो भी है, भुला देना
लेकिन कहाँ इतना आसान होता है भूलना?
भावों में उतर कर जम जाना,
बर्फ होना नही होता,
बल्कि यादों का पत्थर हो जाना होता है,
उन तमाम किताबों का एक हो जाना भी होना होता है,
जो यह चीख चीख कर कहती हैं,
कि गोल दुनिया नही होती,
गोल वह विंदु होता है,
जिससे हम सब एक टक लटके हुए रहते हैं।
ऐसा बहुत कुछ अब भी है, जो शायद प्रेम नही है, आकर्षण के भुलावे में भी मत जाना, वह भी प्रेम का ही एक रूप है, लेकिन यह कहना कि प्रेम नही है, कदाचित् सच भी नही, उसने कहा था, प्रेम छलावा है, और वह आज तक उसी प्रेम के लिबलिबे जालों में बिधी हुई समय के ना जाने कितने आयामों में बह रही है, उसका कहा अब भी वैसे ही मेरे इर्द गिर्द है, जैसे उसका मुझसे प्रेम।

- नीरज

19 फ़रवरी 2016

तिरंगा


तुम्हारा मरना बेकार गया दोस्त,
मुझे आज फिर अफ़सोस है,
कल भी था, आगे भी रहेगा,
कि तुम्हारी अंतिम इक्षा के अनुरूप,
मैं कुछ भी ना कर सका,
ना ही दे सका अपनी जान,
और ना ले सका,
मैं भी तुम्हारे साथ वहीं,
उन खंडहरों के बीच,
काली रात मे,
गोलियों के बीच,
मर गया था,
अपने उस दोस्त की आँखों में देखते हुए,
जिसने मेरे मूह को दबा रखा था,
की मेरी वजह से और जानें ना जायें,
उसकी आँखों के आँसू,
अब भी मेरी आत्मा को भिंगो देते हैं,
लेकिन उन्हे भी मैं,
पलकों के नीचे न गिरा सका दोस्त,
मुझे माफ़ कर देना,
कि मैं तुम्हारी माँ से किया गया वादा भी पूरा ना कर सका,
जिसका बेटा उसे छोड़के तब चला गया,
जब उसे उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी,
आज भी माँ, 
उस तीन रंग के कपड़े से लिपटकर रोती है,
जिसमे तुम आखरी बार लिपटे हुए आए थे,
उसके पास,
हाँ, माँ अब भी रोती है उससे लिपट कर,        
गाँव का वह मोड़,
आज भी वहीं खड़ा है,
जहाँ तुम उसे अलविदा कह गये थे,
और तिरंगा,
वह आज तुम्हारी याद में,
और तुम्हारे साथ उन सबके,
जो आज भी, उसके लिए मरने को तैयार हैं,
बेबस है, 
क्यूंकी आज वह भी बेबस हैं,
जो उसके लिए मर मिटे,
और मैं, 
कुछ नही कर सकता,
आँसू आज भी पलकों में भरे हैं,
लेकिन ना जाने क्यूँ,
उनसे अब भी नही छलका जाता,
क्या पता,
कोई बाँध टूटने वाला हों शायद। 

- नीरज

15 फ़रवरी 2016

रहस्यमय

स दुनिया से उस दुनिया तक,
कहीं तो होगी कोई राह,
कहीं तो बनी होंगी कुछ सीढ़ियाँ,
जिनसे होकर जाना होता होगा वहाँ,
या फिर कुछ चीज़ें सिर्फ़ बातों में ही अच्छी लगती है,
"मन का बहलाव"

होता कुछ भी नही,
और हम मानकर चलने लगते हैं,
बहुत कुछ,
बना लेते हैं परम्परायें,
भगवान, राक्षस, शैतान, खुदा, पैगंबर,
दे देते हैं अनेकों नाम,
उसे,
जिसके अस्तित्व को भी कभी महसूस नही किया,
लेकिन बन जाता है, अपने चारो ओर,
एक ऐसा चक्र,
कि वह नही होकर भी होता है हर जगह,
हमारे चारो ओर,
हमेशा, "अनंत तक",
हाशिए पर लटके प्रमाणों से हम खुश होते रहते हैं,
और एक सीमा से बाँध लेते हैं खुद को,
और टाँग देते हैं अपनी देह,
विचारों की,
वृक्ष की सबसे कमजोर साख से,
और उसके होने का एहसास,
रोज़ महसूसते हैं,
उसकी तरफ से नज़रें घुमा कर,
कहीं दूर तक बिधे रहते हैं,
खून से तर बतर,
उस रहस्यमय मायाजाल में,
और घोटते रहते हैं गला,
अपने अंदर छिपे इंसान का,
हमेशा, लगातार।

- नीरज

12 फ़रवरी 2016

तुम


तुम्हारा आना हवा में खुश्बू का घुल जाना था,
तुम्हारा आना एक नयी सुबह थी,
तो शामों का शायराना हो जाना भी था,
तारों का एक जुट होकर मिलना था,
तो तुम्हारा आना.........
पर्दे के उस पार की धुंधली तस्वीर का साफ हो जाना भी था।

तुम्हे जानना एक अबूझ पहेली की तरह था,
जैसे एवरेस्ट फ़तह कर लेना,
लेकिन एवरेस्ट पर जाने के बाद,
जान पाना,
कि यह फ़तह थी या फिर,
प्रेम का बर्फ के हर्फ में बदल जाना था,
और फैल जाना उन वादियों में,
जहाँ जीत और हार के कोई मानी नही हैं,
और एवरेस्ट की आगोश से लिपटकर यह बुदबुदाना,
"किसने कहा कि मैने तुम्हे फ़तह किया,
मैं तो अपने आपको तुम्हे पहले ही हार चुका था"
यह सब ठीक वैसे ही था,
मै तो अपने आपको तुम्हे पहले ही हार चुका था,
तुम्हे समझना या फिर समझने की बातें करना तो बेमानी थी,
तुम्हारी वह हँसी ही काफ़ी थी मेरे लिए,
जो मुझे देखते ही तुम्हारे चेहरे पर खिल जाती थी,
और शाम चुपके से पर्दे के उस पार,
खिड़की के मनी प्लांट के झुरमुट मे ढल जाती थी।

- नीरज

11 फ़रवरी 2016

ख्वाब


तुमने छीन लिए अपने सारे ख्वाब
और ज़ब्त कर दिया उन्हे,
ना जाने किन दीवारों में,
लेकिन आज सुबह जब तुम रसोई में रोटियाँ बेल रही थी,
रसोई की खिड़की पर मनी प्लांट का एक पत्ता,
सूरज से झगड़ता हुआ अपना सर बाहर निकालके,
तुम्हे एक टक देखे जा रहा था,
और सपनों की दरारें उनसे छन छन कर बिखर जाती थीं,
तुम्हारे चेहरे पर,
और तुम अपने हाथों से उन्हे हटा देती थी,
सपने तब भी तुम्हे जकड़ लेना चाहते थे,
चलो ना, सपनों को उन दरारों से बाहर निकालो,
और अपने हाथो से उन्हे फिर से छू लो,
सच कहता हूँ, वे चमक उठेंगे एक नये उजास से,
भोर बदल जाएगी फिर,
और रातें तारों से भर कर मिलेंगी,
एक नये आसमान के साथ.

- नीरज

10 फ़रवरी 2016

इश्क़

ये इश्क़ है मेरी जान,
कहाँ ऐसे गुम हो जाएगा,
घुला है साँसों में यूँ,
कि अब मरने के साथ ही जाएगा.
बड़े दिनों बाद आज फिर तारी है इश्क़, अपने पूरे शबाब में, सोच ही नही पा रह हूँ कुछ, मन है कि उड़ता ही जाता है, उड़ता ही जाता है जाने किन दिशाओं में.
कहता है खुदा,
मुझे बुतो में ना तलाश,
और प्यार के सारे कशीदे,
तू बुतो पर ही लिखता है,
अब तू ही बता,
तू "खुदा" है या "रकीब" मेरी मुहब्बत का,
या तुझे भी अब शामिल कर दूं,
काफिरों की फेहरिस्त में.
कई सारे ख़याल, जो कहीं सो गये थे, अचानक ही उठ गये हैं तर-ओ-ताज़ा हो के. ढोल नगाड़े सब बजने लगे हैं, फ़िज़ाओं में घुल गयी है खुश्बू मुहब्बत की और तुम मुस्कुरा के उन्हे हरा भरा किए जा रही हो.
ग़ालिब ये इश्क़ नही आसां,
वाह वाह, वाह वाह,
इक आग का दरिया है,
क्या बात, क्या बात,
अमा, ग़ालिब चाचा दरिया तो हमें दिखता नही, पतझड़ में लाल गुलमोहर ज़रूर जलते से दिखते हैं, क्या यही वो दरिया है, जिसमे इश्क़ डूबता है, अगर ऐसा है तो सचमुच यह बड़ा खूबसूरत है, हम भी कभी कभी सोचा करते थे कि चाचा इतनी आसानी से तो कुछ कहते नही थे, और जब कहा भी तो इश्क़ और आग का दरिया, सच कहें तो उसी दिन हमने ठान लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए हम इश्क़ ना करेंगे, पर भला हो हमारे फिराक़ गोरखपुरी बाबा का कि उन्होने बड़े ही प्यार से हमारे कानो में घोल दिया "पाल ले एक रोग नादां" और सच कहते हैं वो तब का दिन था और ये आज का दिन है, हमने सिर्फ़ और सिर्फ़ इश्क़ किया है, कभी ज़िंदगी से तो कभी अपनी मुहब्बत से.
ये खूबसूरती जो आज फैली है फ़िज़ाओं में,
यही इश्क़ की रोशनी है,
कहता है खुदा गर काफ़िर हमें तो कहता रहे.
एक दिन खुदा से ही पूछ लूँगा,
गर इतनी ही नफ़रत है मुहब्बत से,
तो बता, मगरिब से तेरा वास्ता क्या है?
#
कुछ यूँ शामिल हुई है तू ज़िंदगी में,
कि खूबसूरती ने भी अपना नाम बदलकर मुहब्बत रख लिया है.
#
लगता है शायरों की आज रहमत है,
जो आसमान से हर्फ उतरने लगे हैं,
इश्क़ की खिदमत में,
यह नसीब ही तो है मेरी मुहब्बत का,
कि फ़िज़ाओं में भी चर्चे,
आज इश्क़ के हैं.
#
तू "खुदा" है या "रक़ीब" मेरे इश्क़ का,
जो नाज़िम रहा तू हर इज़हार में.
#
नक़ार देता मैं तुझे तेरे ही अख्तियार से,
लेकिन तू तो हर वक़्त फ़ानूस बना रहा मेरी,
कैसे कह दूं आज कि इश्क़ क़ाफिरी है,
पता है मुझे, इसमे तेरी भी रज़ामंदी है.
- नीरज

28 जनवरी 2016

यात्रा

वीकेंड आते आते बहुत कुछ बदल जाता है, ५ दिनों की लगातार भागमभाग अपने अंदर बहुत कुछ अस्थिर कर देती है और एक एक करके कई सारी नयी पुरानी यादें मनस पटल पर अपनी पूरी व्यग्रता के साथ चस्पा हो जाती हैं। मन एकांत ढूंढता है, सच है लेकिन एकांत कम अस्थिर नहीं होता, घर के उस एकांत कोने में बैठे बैठे चाहे जितनी चाय और कॉफी खत्म ही जाये, मन वस्तुतः वहाँ नहीं होता, वह तो अनवरत विचरता ही रहता है. और उस विचरण में नया तो नहीं पता लेकिन पुरानी तसवीरें अचानक ही जीवंत हो जाती हैं, और यादों के दरवाज़े धाड़ धाड़ करके बजने लगते हैं, एक अजीब सी स्थिति होती है, जो समझ में नहीं आती लेकिन यात्रा का एक पूरा काल यादों के बड़े परदे पर चलने लगता है. इसमें ड्रामा, एडवेंचर, कॉमेडी और एक्शन सब कुछ होता है, और उनके खत्म होने तक आँखों के कोने मोतियों से भीग जाते हैं. 
कभी कभी सोचता हूँ कि जीवन एक यात्रा ही तो है, और क्या है भला यह? एक ऐसी यात्रा जो अंतिम साँस के साथ ही ख़त्म होगी, इस यात्रा में भी पड़ाव आते हैं, पड़ाव पर मिलती हैं खुशियां, कभी ग़म भी अपनी अचमन में बांध लेता है कुछ पल, नए चेहरे, लोग, जगह, रिश्ते - नाते और क्या क्या नहीं है इस यात्रा में, इस यात्रा में बंधी होती है अनेकों यात्राएं जो रह रह कर शुरू हो जाती हैं लेकिन ख़त्म नहीं होतीं, ख़त्म होती है तो साँस और जीवन के इस अंत से हम हमेशा भागते रहते हैं, विवश होकर ही सही लेकिन इस यात्रा को जारी रखते हैं, आगे न बढ़ पाने का भय और उस भय से जीतने का प्रयास हमेशा चलता रहता है, लेकिन मंज़िल तो अपना पता ढूंढ़ ही लेती है, और उसके आगोश में जाते ही सारी यात्राएं थम जाती हैं, रह जाता है एक सन्नाटा, जिसको महसूसने के लिए हम कभी तैयार नहीं होते, न होना चाहते हैं. 
क्या ऐसा ही कुछ सन्नाटा घर के उस कोने में बैठे महसूस नहीं होती? कॉफी के मग के ठीक पास शीशे के छोटे से पारदर्शी मर्तबान में हरा भरा लकी बम्बू, अपनी जड़ों को ताल में टिकाये कॉफी के ख़त्म होने का इंतज़ार करता रहता है इस आस में कि कॉफ़ी के ख़त्म होने  के साथ ही निगाहें उसकी तरफ जरूर जाएंगी, उसे कॉफ़ी से हमेशा चिढ होती होगी लेकिन इन सबके बावजूद वह चुपचाप कॉफ़ी को सूंघता रहता है, ऐसा नहीं है कि निगाहें वहाँ नहीं जाती हैं लेकिन यह उसकी यात्रा है, कॉफी के मग की खुशबु, टेबल का ग्लास, खिड़की से छनकर आती धूप और परदे को धकेलकर अंदर आने वाली हवा, यह सब उसकी यात्रा के साथी हैं, और वह शायद इन सबमे ही खुश रहता है, शायद न भी हो, हमें क्या पता? हमें तो उसका हरापन अच्छा लगता है, कितना लकी है यह तो आज तक नहीं जान पाया , लेकिन हवा से हिलते समय वह कई सारी पुरानी यादें ताज़ा करता है, हाँ गर्मी के समय गॉव की वह रात, जिसमे हवा के साथ बांस का झूमना हमेशा डराता था मुझे, लेकिन शहर पहुँचते ही उतना याद भी आता था, समय के साथ साथ वे बांस भी न रहे और न रही वह हवा और वह घर, क्या पता खंडहरों के बीच उसके कुछ बीज आज भी कहीं जिन्दा हों, क्या पता उन खंडहरों में फिर कोई जीवन सांस लें और फिर से खड़ा हो जाये वहाँ एक फलता वह फूलता बड़ा सा घर, जिसके हर कोने में आवाज़ हो, ज़िन्दगी हो, प्रेम हो, दुःख हो, तृष्णा हो और हो बचपन कि वह लड़ाइयां, जहाँ कितना भी सही होने पर पापा से मार तो पड़नी ही थी, कोई शर्मिंदगी नहीं, ढीठता से कहते थे, अरे खा लूँगा आज मैं मार लेकिन बेट्टा आज तो तुम्हे बिना मारे न जायेंगे, और अगर यह बात उनके कानों तक पहुँच जाये तो दो डंडा और बढ़ जाता था, लेकिन दुसरे दिन आँखों में आँखें डाल कर यह कहने पर कि "देखला" ....सारा दर्द छू मंतर हो जाता था. ऐसे ना जाने कितने गाँव हम सबके अंदर अभी भी साँस लेते रहते हैं, और फिर गाँव ही क्यों, यादों कि यह यात्रा सिर्फ गाॉवों भर से थोड़े ही बनती है, इसमें ना जाने कितने शहर होंगे, बचपन का पहला प्यार होगा, वह पहली शहर की यात्रा, कॉलेज का पहला दिन, मम्मी पापा के साथ पहली छुट्टियां, पहला विदेश जाने का खुश और न जाने कितना कुछ. यादों का यह बक्सा हमेशा बजता ही रहता है, चाभी देने भर की देर है और यात्रा का रंगमंच तैयार हो जाता है, उसके पात्र, निर्देशक सब दो मिनट में रेडी और सेट तो पूरी दुनिया ही होती है, कहीं भी डेरा डाल दिया.
सोच रहा हूँ कि क्या शाम हो गयी है? क्या एक दिन और ढल जाने को है इस यात्रा का .....क्या रात आज पूर्णिमा की है या फिर अमावस के अँधेरे में ही करनी होगी यात्रा, पर्दा एकबारगी जोर से उड़ पड़ता है और समुद्र से उठकर आती हवा अपने आगोश में ले लेती है, पल भर के लिए ही सही घर के इस एकांत कोने में भी ज़िन्दगी साँस लेने लगती है.

- नीरज  

22 जनवरी 2016

बरसात की वह शाम

1/12/2014 
क़्त बीतता जाता था, और पानी की रिसती बूँदें टप टप टपकती ही रहती थी, जाने कहाँ से आ रही थी, 
और उसके माथे से फिसलते हुए,
उसके होठों से लिपटती बूँदें,
शाम अब भी शाम ही थी, या जहर.… या कहीं लगी हुई आग की लपट..... जो भी थी, मेरे अंदर एनाकोंडा अपनी नाक और भवें सिकोरता हुआ लम्बी लम्बी फ़ुफ़कारें मार रहा था, बात यह नहीं थी कि मैं उसे जानता था, यह भी नहीं कि वह सुन्दर थी, तो.... तो क्या, क्या एक सुन्दर लड़की को देखकर अच्छे ख्यालों का पुलिंदा गुच्छे नहीं बना सकता, या की नहीं कर सकता वह प्रेम का कातर निवेदन, मैंने कुछ भी नहीं किया, चुप चाप खड़ा रहा, उसे देखते हुए, बरसात झमा झम होती रही और मैं उसको देखता रहा, जाने कब तक?
यह कहानी बरसात की उस शाम की है.………………
22/1/2016
सकी आँखें मुझमे न जाने क्या ढूंढा करती थीं? आज तक नहीं समझ पाया और अब समझना भी नहीं चाहता, शायद समय के साथ साथ बहुत सारी चीज़ें ऐसे होती हैं जिनके लिए जिज्ञासा स्वतः ख़त्म हो जाती हैं। उसकी आँखें भी कुछ ऐसी ही जिज्ञासा थी, जिसे उसने कभी भी मेरे अंदर शांत नहीं होने दिया, जाने क्या बात थी उसकी आँखों में, एक अजीब सा खिंचाव, एक सम्मोहन, कुछ जाना पहचाना सा डर या फिर कुछ और? पता नहीं, है न कुछ अजीब सा? लेकिन बहुत कुछ था उन आँखों में जिसे उसने मुझ पर कभी भी उजागर नहीं होने दिया, चाहे वह हमारी पहली मुलाकात हो, हाँ वही........... बरसात की वह शाम, एक सुन्दर लड़की और एक लड़का जिसे हर लड़की में अपनी प्रेमिका ही दिखती थी, हर लड़की से प्रणय निवेदन करने को आतुर, चाहे कुछ भी हो जाये, लेकिन उस लड़की में कुछ अलग था, दुनिया से कुछ अलग, एक अजीब सा सम्मोहन था उसमे कि वह उसे देखकर भी , बहुत कुछ बोलना चाहकर भी, नहीं बोल पाया था कुछ।
बरसात की उस शाम को वह बस उसे देखता रहा, बारिश होती रही, वह भीगता रहा, लेकिन जैसे कोई असर ही नहीं, ऐसा भी नहीं था कि वह उसकी आँखों में आँखें डाल दे और पूछ ले कि कौन ही तुम रूपवती? क्या नाम है तुम्हारा? कहाँ से आयी हो?
टीनएज में सब कुछ फैंटसी ही लगता है और उन फैंटसी से ही निकलते हैं शब्द और इमेजिनेशन तो न जाने कहाँ कहाँ उड़ा ले जाती है, उसकी आँखों में देखता हुआ मैं भी यही सोचता रहा, परियों के देश में चला गया, ता थैया ता थैया गाना भी गा लिया और सिंदबाद के साथ समुद्रों के ऊपर उड़ भी आया, यह सब कुछ उसकी आँखों में देखते हुए ही हुआ था, न मेरी पलकें झपकीं और न उसकी, लेकिन फिर भी ऐसा लगता था जैसे वह मुझे देख ही नहीं रही है, या मेरे वहां आ जाने से उसको कोई फ़र्क़ ही न पड़ा हो, बारिश का लगातार बढ़ता जाना भी उस पर जैसे कोई असर नहीं डाल रहा था, समय कब कैसे बीता पता ही नहीं चला, और अचानक ही वह उठकर मेरी तरफ बढ़ी, सारी कायनात में अचानक सरगोशी हो गयी, पूरी कि पूरी दुनिया अचानक ही ज़िंदा हो गयी और बारिश की छींटों ने उठा कर इस दुनिया में ला पटका और सारा का सारा ता थैया, परियों का परीलोक सिंदबाद का समुद्र मिनटों में बारिश के पानी में बह गया, रह गयी काली होती शाम और बस स्टॉप। और बस स्टॉप पर खड़ी एक लड़की और मैं...हाँ वही लड़की जिसे मैं घंटों से देखे जा रहा था और वह अब मेरी तरफ बढ़ रही थी, धड़कनें धाड़ धाड़ करके बज रहीं थीं और ऐसा लगता था जैसे अभी सीने को फाड़कर दिल बाहर निकल आएगा, गला सूख कर कांटा हुआ जा रह था और ऊपर से यह हवा, इसे भी अभी ही तेज होना था, ठंढ भी लग रही थी, मतलब वही सब कुछ हो रहा था जिसे नहीं होना चाहिए था, उसकी आँखें मुझ पर टिकी हुईं थीं और मेरी उस पर और हर पल वह मेरे नजदीक पहुँचती जा रही थी, और सड़क और मौसम सब अचानक से अकेले होते जा रहे थे, नितांत अकेले ....और मैं बेसहाय.
- नीरज
© Niraj Pal