29 दिसंबर 2016

मैं तैनू फ़िर मिलांगी

अमृता के लिए इमरोज़ की कविता--
"अब ये घोसला घर चालीस साल का हो चुका है
तुम भी अब उड़ने की तैयारी में हो,
इस घोसला घर का तिनका-तिनका,
जैसे तुम्हारे आने पर सदा,
तुम्हारा स्वागत करता था,
वैसे ही इस उड़ान को,
इस जाने को भी,
इस घर का तिनका-तिनका
तुम्हें अलविदा कहेगा।"
— इमरोज़
यह आखिरी कविता थी इमरोज़ की जो उन्होने अमृता के लिए लिखी थी, और तब लिखी थी जब अमृता अपने आखिरी दिनों मे थी, बिस्तर से उठना भी नहीं होता था। यूं तो इमरोज़ को पुनर्जन्म मे कोई भरोसा नहीं था लेकिन अमृता बार बार कहती थीं कि मैं तुम्हें फिर मिलूंगी। अपनी आखिरी कविता में इमरोज़ को वह कहती हैं,
मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे ? किस तरह पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते
इक रह्स्म्यी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी।
एक कलम पकड़ती थी तो दूसरा ब्रश का जादूगर, अमृता कुछ ना कुछ लिखती रहतीं थीं और कई बार वह अपनी उँगलियों से साहिर का नाम इमरोज़ की पीठ पर लिख देती थी। सोचता हूँ कभी कभी इमरोज़ जितना बेचारा इंसान कौन होगा? जिसके साथ जीवन के 41 बसंत बिता दिए बिना शादी किए वह उसी की पीठ पर किसी और का नाम लिखती है और कहती भी है कि अगर मुझे साहिर मिल गया होता तो तू ना मिलता। इमरोज़ हंस कर कह दिया करते कि मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ अदा करते हुए ढूँढ़ लेता। मुहब्बत की मिसाल थे दोनों, कहते हैं कि कभी इमरोज़ और अमृता मे कभी कोई तकरार भी नहीं हुई और ना ही कभी दोनों ने एक दूसरे को मुहब्बत का इज़हार किया। यह मोहब्बत सारी खुदाई से ऊपर है.... अगर इन दोनों को पढें तो ज़िन्दगी एक चिठ्ठी लगने लगती है, मुहब्बत का खत जहां मुहब्बत का ज़िक्र नहीं। मुंबई आने पर चंडी भैया के साथ एक प्रोग्राम मे जाना हुआ था, वह अमृता और इमरोज़ पर ही था। इसे आप मेरा कबूलनामा मानें या फिर जो भी लेकिन इमरोज़ से वह मेरी पहली मुलाकात थी उनके इस दुनिया से कूच करने के बाद, अमृता को गाहे बगाहे पढ़ा था लेकिन इस नज़र से नहीं.... तब से लेकर आज तक मैंने किसी ना किसी तरह दोनों को पढ़ने की कोशिश की, उस दिन के बाद मैंने अमृता की कोई तस्वीर नहीं देखी.... इमरोज़ के शब्दों से देखा है उन्हे... सोचता हूँ कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है... या कोई किसी पर ऐसे कैसे मर सकता है.... इमरोज़ कहते हैं..
"अमृता जब भी खुश होती-
मेरी छोटी-छोटी बातों पर
तो वो कहती-
वे रब तेरा भला करे।
और मैं जवाब में कहता हूँ-
मेरा भला तो
कर भी दिया रब ने
तेरी सूरत में
आकर..."
और जो इमरोज़ पुनर्जन्म को नहीं मानते था वह अमृता के जाने को भी नहीं स्वीकार पाए।
"उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं" - कहते हुए एक दिन इमरोज़ भी चले गए और पीछे छोड़ गए मोहब्बत के किस्से।
अमृता और इमरोज़ आज खयालों मे कैसे आए नहीं जानता....लेकिन कुछ थोड़ा बहुत जो जान पाया वह यहां है।


- नीरज 

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