कुछ शब्द रह गए थे दरिया किनारे,
कुछ यादें अब भी बाबस्ता देखा करती हैं,
तेरा रास्ता,
और उग आता है दूबों का जंगल,
निर्जनता के झींगुरों की आवाज़ में,
अब भी यादें बिखरी पड़ी हैं,
जो रातरानी बनकर खनक पड़ती हैं,
रातों में,
और मैं रात भर,
देखा करता हूँ,
वह पतली सी लीख,
जिसके सहारे तुम चली गयी थी,
कभी न लौटने के लिए,
लेकिन कहाँ से लाऊं मैं वह मन,
जो रोक सके आँखों को जगने से,
और न देखे तुम्हारे सपने,
ना सुने तुम्हारी आहट,
और निकाल कर फेंक दे तुम्हारी सारी यादें,
और एक चिता बनाकर जला सके तुमको, तुम्हारी यादों को,
ख़ाक में बदलने के लिए,
लेकिन सुना है,
"खाक के धुएं यादों से लिपट कर रोज़ रोते हैं।"
- नीरज
कुछ यादें अब भी बाबस्ता देखा करती हैं,
तेरा रास्ता,
और उग आता है दूबों का जंगल,
निर्जनता के झींगुरों की आवाज़ में,
अब भी यादें बिखरी पड़ी हैं,
जो रातरानी बनकर खनक पड़ती हैं,
रातों में,
और मैं रात भर,
देखा करता हूँ,
वह पतली सी लीख,
जिसके सहारे तुम चली गयी थी,
कभी न लौटने के लिए,
लेकिन कहाँ से लाऊं मैं वह मन,
जो रोक सके आँखों को जगने से,
और न देखे तुम्हारे सपने,
ना सुने तुम्हारी आहट,
और निकाल कर फेंक दे तुम्हारी सारी यादें,
और एक चिता बनाकर जला सके तुमको, तुम्हारी यादों को,
ख़ाक में बदलने के लिए,
लेकिन सुना है,
"खाक के धुएं यादों से लिपट कर रोज़ रोते हैं।"
- नीरज
