9 फ़रवरी 2014

बदलाव

बदलाव कितना आसान होता है,
चुटकी में बदल जाता है सब कुछ,
ढूंढने से भी नहीं मिलते फिर खंडहर,
यादें उड़ती रहती हैं,
बिखरे हुए पत्तों के साथ,
धुएं में फाख्ता यादें भी विचित्र होती हैं,
जैसे सुखा हुआ कमल कीचड में,
फिर किसी को नहीं दिखता,
और समय लरजता हुआ,
निकल जाता है,
यादों को समेटे हुए,
सांय सांय सन्नाटे छोड़ते हुए.

- नीरज