8 दिसंबर 2014

छोले भठूरे

ज़रत निजामुद्दीन स्टेशन के ऊपर धूप चढ़ चुकी थी और कई झिर्रियों से निकलकर ना जाने किन शक्लों में तब्दील होने लगी थी. दिल्ली का मौसम बदल चुका है, या फिर यह कहूँ कि बदल रहा है तो गलत ना होगा, ऑटो से स्टेशन आते समय  लगने वाली ठण्ड से बचने के लिए जैकेट डाल लिया था और अपना पुराना धूप वाला चश्मा आज कई दिनों बाद निकाला था. कुछ चीज़ें पुरानी होकर भी उतनी ही नयी होती हैं जैसे आज अभी जाकर खरीदा हो, इस चश्मे के साथ भी मेरा कुछ ऐसा ही रिश्ता है, दिल्ली से जाने से पहले उसने दिलवाया था और मुझे देखकर बोली थी " चश्मे में तो तुम माशाल्लाह क्या लगते हो जी " मैंने हंसकर उसकी हथेली अपनी हथेली में बंद कर ली थी, यह सोचकर कि उसके और मेरे सपने की रेखाएं जल्दी से एक हो जाएँ. घर से निकलते हुए एक बारगी ख्याल आया कि इतना सज संवर क्यूँ रहा हूँ, लेकिन अपनी नयी उगाई मूँछें और आँखों पर लगे चश्मे को देखने के बाद मैं बड़ा ही अच्छा दिखा, सो निकल पड़ा अपने को तीन चार बार आईने में निहार कर, कभी कभी खुद के लिए भी अच्छा लगना आपको एक नये उर्जा से भर देता है. इतने दिनों में पहली बार आज निजामुद्दीन(दिल्ली लगातार रहते हुए चार साल हो गए) आया था, पहुँचा तो कोई ट्रेन आ चुकी थी, वही खड़े एक सरदार जी से पूछ लिया - " कौन सी ट्रेन आई है?"

छोटा सा जवाब "गरीब रथ"....... कुछ रुक कर सरदार ने कहा

"टैक्सी चाहिए?"

"जी नहीं शुक्रिया, बस ट्रेन के बारे में जानना था ."

समय से पहुँच गया, देर नहीं हुई और मन ही मन मुस्कराते हुए फ़ोन पर नंबर दबाने लगा कि सामने से आते हुए दिख गए सर. "सर..........सर!!!" दो बार चिल्लाया लेकिन शायद मेरे फ़ोन ने उनके फोन तक अपनी दस्तक पहुंचा दी थी और वह उसे ही देखने में मशरूफ थे, मैंने आगे बढ़कर उनके हाथ को पकड़ा तो उन्होंने सामने देखा, उन्होंने हाथ मिलाने के लिए हाथ बढाया था लेकिन मैं तब तक उनके पैर छूने के लिए झुक चूका था और उन्होंने उठा कर गले से लगा लिया. दिल्ली अचानक ही गर्म हो गयी थी और उसकी हवाएं अपनी सी लगने लगी थी. सामने वाले पीपल के पेड़ से अचानक ही कई पक्षी एक साथ उड़े थे, शायद परदेसी थे.

"मूंछे रख ली हैं तुमने?" - मेरी तरफ देखते ही अपने चिर परिचित अंदाज़ में उन्होंने कहा था.

"हाँ सर, कौन सा पैसा लगना है, घर की खेती है"

"चलो छोले भठूरे खायेंगे" - उन्होंने कहा और बगल के रेस्त्रा की ओर बढ़ने लगे.

"क्या सर, आप भी छोले भठूरे खाने हैं और रेस्त्रा में?" - कहते हुए मैंने उनकी तरफ देखा था.

"तुम साथ में हो ना, इसलिए सोचा शायद" और वो मेरी तरफ देख कर हंसने लगे थे.


हम दोनों स्टेशन से बाहर की तरफ चल दिए थे , छोले भठूरे वाले ठेले को खोजने. कुछ चीज़ें सजी हुई नहीं अच्छी लगतीं, उनका बिना परदे वाला रूप ही अच्छा लगता है. खाने के मामले में भी कुछ ऐसा ही है, अगर आपको किसी जगह को जानना हो तो उसके नुक्कड़ पर जाइए, और वहां की चाय पीजिये, फूटपाथ पर जाइए और लगे ठेलों पर बन रहे खाने को खाइए, सच मानिए उस शहर का असली स्वाद आपको इन नुक्कड़ों की चाय और फूटपाथ के खाने में ही मिलेगा, उस शहर के रेस्त्रा में आपको शहर की ख्श्बू नहीं मिलेगी, हाँ मिलेगी किसी दूर देश में ईजाद किये गए इत्र, नए कपड़ों में सजे वेटर, डिम लाइट्स और रूमानी माहौल, जो कि उस शहर का शायद कभी नहीं रहा होगा. वादे तो हज़ारों हैं लेकिन दिल्ली आपको चांदनी चौक और दरिया गंज में ही मिलेगी, बाकी तो शोर शराबे और चिल्ल पों हैं जो अपने आपको दिल्ली होने का दावा करते हैं.

हमें वो ठेला मिल गया था, और हमारे नथुनों में भठूरे की खुशबु ने बसेरा कर लिया था, कुछ खुशबुयें आप कभी अपने जेहन से नहीं निकाल पाते, समय के साथ वो आपका हिस्सा बन जाती हैं. "दो प्लेट लगाना भैया" - उन्होंने कहा था.

"और बताओ क्या चल रहा है, नौकरी का क्या हाल चाल है?"

"जैसा चल रहा था , वैसा ही है, ढेर सारे काम और रतजगा, ज़िन्दगी इसी का नाम है." - मैंने कहा और चुप हो गया.
"भाभी कैसी है? आने का बड़ा मन हो रहा था लेकिन नहीं आ पाया, आप तो जानते ही हैं." उनसे पूछा था मैंने और खुद के ही पूछे सवालों में उलझा हुआ महसूस करने लगा था. भाभी की तबीयत ख़राब है, अभी कुछ दिन पहले ही ऑपरेशन हुआ था, मैं जानता था लेकिन इंसानी रिवायतें पूरी करनी होती हैं, सब कुछ जानते हुए भी पूछना पड़ता है. लेकिन मुझ जैसे इनफॉर्मल इंसान के लिए यह हमेशा एक प्रश्न होता था कि सब कुछ जान कर भी हम वही सवाल क्यूँ दाग रहे होते हैं?

"पहले से ठीक है अभी." अपनी आदत के हिसाब से उनका छोटा सा सटीक उत्तर और मेरी तरफ देखते हुए उन्होंने भठूरे की प्लेट मेरी तरफ बढ़ा दी थी. " लो खाओ, मुंबई में तो पापड़ बना देते हैं, स्वाद ही नहीं मिलता."

"हाँ वहां सिर्फ पाव का स्वाद मिलता है." कहते हुए मैं जोर से हंसा. 

मेरे साथ वो भी हंसने लगे थे. दिल्ली की हवा में घुल रही सर्दी अब कम होने लगी थी, ऊपर डाला हुआ जैकेट अब आग फूंक रहा था. ऐसा नहीं था कि ठंढ कम हो गयी थी या फिर धूप ज्यादा लगने लगी थी, लेकिन अपनेपन और रिश्तों की आंच तपने लगी थी बड़ी तेजी से. हम यूँ ही इधर उधर की बातें करते रहे, भठूरे ख़तम करने के बाद उन्होंने चावल और छोले भी लिए हाफ प्लेट, मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा, " आपने भी तीखा खाना शुरू कर दिया है." 

"अरे नहीं, लाल मिर्च नहीं सही जाती."

"रहने दीजीये सर, सिर्फ तीन हरी मिर्च डाली थी चिकन में और आपने पूरा घर सिर पर उठा लिया था सू सू करके."
यादों के साए में मुंबई में बनाया चिकन अचानक ही उभर आया था, दिल्ली में कभी किचेन में घुसने ही नहीं दिया जाता था, और घुस जाता तो कई सारे तकरीरें एक साथ पढनी पड़ती थीं.

"कितने हुए भैया?" - उन्होंने ठेले वाले से पूछा था.


मेरे हाथ पर्स की तरफ बढे थे लेकिन उसके निकलने के पहले ही उनका हाथ मेरे हाथों पर था. मैंने अपना हाथ खुद ही पॉकेट से बहार निकल लिया, जानता था कि यहाँ कोई दलील काम नहीं करने वाली है.

"पचास रुपये"- ठेले वाले ने कहा था .

मैं उनकी तरफ देख कर हौले से मुस्कुराया था. "इसी छोले भठूरे का हम दो तीन सौ दे कर आते किसी रेस्त्रा में." - मैंने कहा था , "अरे हाँ, पनीर के छोटे छोटे टुकड़े भी थे भठूरे में, और स्वाद तो लाजवाब था ही."

उन्होंने कुछ भी नहीं  कहा. ऐसा अक्सर होता था, जब मैं कुछ ज्यादा ही एक्साइट होकर बकने लग जाता तो वो बात का रुख ही मोड़ देते, या फिर चुप चाप सुनते हुए मुस्कुराते थे. मुझे पता था इसलिए एक्साइटमेंट जैसे आया था वैसे ही चला भी गया. जब मैं चुप हो गया तब उन्होंने कहा आज फेसबुक पर स्टेटस अपडेट कर देना " Had a heavy breakfast for just Rs. 50 for two.”  और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए थे.

"चाय पीओगे?"- पूछा था उन्होंने.

लेकिन मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना ही चाय वाले से बोल चुके थे  दो चाय देना भैया

चाय पीने के बाद उन्होंने कहा, “तो क्या किया जाये?”

जो आपको सही लगे, वैसे भी आपको गुडगाव जाना था.

ठीक है फिर यहां से साकेत मेट्रो चलते हैं, वहां से मैं गुडगाव चला जाऊंगा, तुम अपने घर आ जाना.

ठीक है, अच्छा है.” – मैंने कहा था.

हमने ऑटो ले लिया था और साकेत की ओर बढ़ चले. "सारे शहर एक जैसे ही दिखते हैं, वही काली चिपकी सड़क, वैसे ही फ्लाइओवर्स और वैसी ही ट्रॅफिक, बदलाव का मतलब यह तो बिल्कुल भी नही होना चाहिए कि सारे एक दूसरे की कॉपी लगें, आज के समय में हमने नया क्या बनाया है भला, जो कुछ अलग हो, अगर कुछ पुराने स्थापत्य को छोड़ दिया जाए, तो आप किसी शहर को पहचान ही नही पाएँगे."- मैने खुद से ही बात करते हुए कहा था.

"लेकिन दिल्ली ज़्यादा सॉफ सुथरी और खूबसूरत है, इन सड़कों को देखो, मुंबई में ऐसी सड़कें दिखती हैं?"

मैं चुप हो गया था, बात उनकी सही थी. आप दुनिया के किसी भी शहर में रह लें, अगर आपने एक बार दिल्ली में अपना डेरा डाल लिया तो फिर यहीं के होकर रह जाते हैं, दिल्ली में ना जाने ऐसा कौन सा गोंद लगा हुआ है, जो इस तरह से चिपकता है कि फिर अलग ही नही होता. आपने यह खुद भी महसूस किया होगा, दिल्ली में अगर आप रह चुके हैं तो भले ही लाख भागदौड़ हो इस शहर में, लाख परेशानियाँ रही हों आपको यहाँ रहते हुए, लेकिन इन यादों को आपने कभी अपने से अलग होते हुए नही देखा होगा, वो एक जोंक सी लिपटी रहेंगी आपके साथ तब तक, जब तक आपका वज़ूद होगा. दिल्ली है ही कुछ ऐसी, अजीब सी, लेकिन बिल्कुल अपनी, दिल्ली में रहते हुए यह आपको पराई लग सकती है, लेकिन यहाँ से जाने के बाद इसकी यादें हमेशा कचोटती हैं. निज़ामुद्दीन के आगे निकलते हुए हम सेन्ट्रल रोड होते हुए हरकीरत राय मार्ग पर गये थे, सामने एक फैला हुआ लॉन अपनी हरियाली बिखेर रहा था, रविवार होने की वजह से सड़क थोड़ी खाली थी और मेरा ट्रांज़िस्टर बेबाक लगातार चला जा रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे सारी यादों का ठीकरा एक साथ समेट कर अपने सिर पर फोड़ लूँगा.

"और बाकी लोग कैसे हैं?" सर ने पूछा था. और मैं फिर से इस दुनिया में वापस चुका था, सामने का चिल्ड्रेन पार्क बड़ा अच्छा लग रहा था, कुछ लोग टहल रहे थे, सामने फुटपाथ पर एक लड़का और लड़की खड़े थे एक दूसरे की हथेलियाँ पकड़े हुए, गुजरने वालों की आखें लड़की की ही तरफ टिकी थी और उसने लड़के के हाथों को और ज़ोर से पकड़ लिया था, उनके पीछे एक भिखारी अपना कटोरा लिए हुए फटे चीथरे कपड़े पहने हुए बैठा था, और उसके बगल में एक नवजात बच्चा फटी हुई कपड़ों की बनाई गयी एक गठरी में चुपचाप सोया हुआ था, सामने से आते हुए हवलदार को देखते ही भिखारी ने बच्चे के कपड़े को और समेट दिया था, एक साथ कई रिपोर्टें ज़ेहन में गुज़र गयी, बत्ती हरी हो चुकी थी और ऑटो आगे बढ़ गया था, दिमाग़ में बच्चा, भिखारी, लड़की, हथेली और लड़का दौड़ लगा रहे थे

"और बाकी लोग कैसे हैं?" - सर ने फिर पूछा था. सामने के पेड़ की कई सारी पत्तियाँ हवा के आने पर अचानक ही गिर पड़ी, गोल गोल घुमावदार पत्तियाँ, जैसे हवा के साथ अठखेलियां करती हुईं, पानी की तरह बह गयीं, या फिर हवा इन पत्तियों की पानी की खोज पूरी करवाने के लिए यमुना की ओर लेके बह चली थी, रिश्ते अब कुछ ऐसे ही होते हैं, जैसे उनका होना सिर्फ़ इसलिए है, क्यूंकी कुछ स्वार्थ और कुछ ज़रूरतें बिना उन रिश्तों की गर्माहट के पूरी नही हो सकतीं, जैसे चूल्हा बिना कोयले के नही जल सकता, लेकिन कोयला हर बार चूल्हे के लिए जलता है, फिर उसके राख में तब्दील होते होते चूल्हा उसको भूल चुका होता है, क्यूंकी अब कोयला उसके लिए नही जल सकता और अगर वो जल नही सकता, तो फिर भला उसको याद रखने का क्या फायदा? रिश्तों के भी गणित अब कुछ ऐसे ही होते हैं जो रोज़ एक प्रमेय को प्रमाणित करने के लिए बनाए जाते हैं और "हेन्स प्रूव्ड" होते ही उनकी ज़रूरत ख़त्म हो जाती है, और वो सिर्फ़ एक मानक के अलावा कुछ नही रह जाते, जैसे नोट के सामने चिल्लर हमेशा फेंक दिया जाता है. अपने ही ख़यालों में गुम रहते हुए मैने कहा था "क्या फ़र्क़ पड़ता है सर अब किसी को? जब तक आप साथ होते हैं, आपकी ज़रूरत होती है, और आपकी ज़रूरत से कुछ रिश्ते अपने आप बन जाते हैं, या बना लिए जाते हैं, नही तो कौन पूछता है आज कल." 

"अगर ग़लती से कोई फोन कर लिया आपने तो उल्टा आप पर ही आरोप लग जाएँगे " गयी जनाब को हमारी याद" गोया जैसे उन्होने तो हमारी याद में ताजमहल बनवा दिया हो." -  मैने फिर कहा था. सर अब चुप हो गये थे, उन्हे पता था कि उन्होने किसी दुखती नस पर हाथ रख दिया है, और यह समझते ही झट से हाथ उपर उठा लिया. और दूसरी तरफ देखते हुए बोले थे, " दिल्ली सच में आज फिर अपनी सी लग रही है."

साकेत गया था, हमलोग ऑटो छोड़ चुके थे, सामने दिखाई देते कुतुबमीनार पर एक बदली घुमड़ रही थी, ऐसे जैसे अभी उसे लील जाएगी, लेकिन कुतुबमीनार वैसे ही खड़ा था जैसे कह रहा हो, "बहुत देखें है तुझ जैसी, चल परे हट."

"उसका ट्रांसफर अप्रूव हो गया है, फ़रवरी में दिल्ली वापस जाएगी." - मैने कहा था.

"फिर तो अब तुम मुंबई नही आओगे, आने का एक बहाना भी अब जाता रहा"- उन्होने मेरी तरफ देखते हुए पूछा था.

"नही सर, मुंबई आने का बहाना तो वह कभी थी ही नही." - कहते हुए मैं मुस्काया था.

"अच्छा क्या अभी भी छोटी छोटी बोतलें घर में इधर उधर रखी रहती हैं?" - और मैं ठठाकर हंसा था.

"आपको पता है, कोई भले ही हमें बिहारी या यूपी का भैया कहे, लेकिन रिश्तों का स्पार्क हम बनाकर रखते हैं, इतनी आसानी से नही ख़तम होने देते. यह शहरों की लाइटें नहीं हैं, जो फ्यूज़ होने पर बदल दी जाएँ." मैने उनकी आँखों में देखते हुए कहा था.

"चलो, कोई इंतज़ार कर रहा है, एम जी रोड स्टेशन पर, बस आज की रात भर हूँ, इसलिए तुम्हारे साथ नही रुक सकता. फिर मिलते हैं."

मैने झुक कर उनके पैर छुए थे और उन्होने हमेशा की तरह उठाकर गले से लगा लिया था, और कहा, "मुझे लगा था तुम बहाना बना दोगे, भला सनडे को भी कोई सुबह सुबह जागता है, और वो भी सिर्फ़ एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक छोड़ने के लिए. मैं होता तो नही आता."- और मंद मंद मुस्काये थे.

उनकी आदत अभी भी वैसी की वैसी ही है, टीज़ करने वाली, मैने एक शरारती मुक्का उनके पेट पर मारा और कहा, "जाइए कोई इंतज़ार कर रहा है." और वो तेज़ी से बढ़ते हुए मेट्रो की सीढ़ियों में खो गये.

दोपहर बढ़ चली थी और दिल्ली काले बादलों में लिपटी हुई लग रही थी, छोले भठूरे की कढ़ाई का तेल हर तरफ तैरने लगा था और अपनी दिल्ली फिर पीली होकर बेजान हो गयी थी.


- नीरज