शायद थम सा गया हूँ मैं,
मेरे सपने, मेरी हक़ीक़त,
अपने जामे उतारकर,
किसी अदृश्य खूंटी पर टंग गये हैं,
आँखों में उठने वाले सैलाब,
भर कर बहने लगे हैं,
और बचा है अगर कुछ
तो
उथली जमीन,
उसके दलदल मेरे पैरों
को हमेशा
बांधे रहते हैं,
और दूर
पहाडों की उस बर्फ
पर,
अपने हर्फ़
टांगने की मेरी हर कोशिश
जाया हो जाती है,
चाय की वह कप
अब ठंडी होकर
कड़वी हो जाती है,
जिसे अपने गर्म
होने का फख्र हुआ करता था,
लैम्पपोस्ट की रोशनी की तरह
रात बिखरने लगती है
और सपने टूट कर,
आसमान में बिखर जाते हैं,
मैं बस वह खूँटी तलाशता हूँ
कि,
अपने जामे उतार सकूँ।
मेरे सपने, मेरी हक़ीक़त,
अपने जामे उतारकर,
किसी अदृश्य खूंटी पर टंग गये हैं,
आँखों में उठने वाले सैलाब,
भर कर बहने लगे हैं,
और बचा है अगर कुछ
तो
उथली जमीन,
उसके दलदल मेरे पैरों
को हमेशा
बांधे रहते हैं,
और दूर
पहाडों की उस बर्फ
पर,
अपने हर्फ़
टांगने की मेरी हर कोशिश
जाया हो जाती है,
चाय की वह कप
अब ठंडी होकर
कड़वी हो जाती है,
जिसे अपने गर्म
होने का फख्र हुआ करता था,
लैम्पपोस्ट की रोशनी की तरह
रात बिखरने लगती है
और सपने टूट कर,
आसमान में बिखर जाते हैं,
मैं बस वह खूँटी तलाशता हूँ
कि,
अपने जामे उतार सकूँ।
- नीरज

सुन्दर।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार :)
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