25 मई 2014

कनेर


ज कनेर को बंद कर लिया,
हमेशा के लिए यादों के बुद्धू बक्से में,
याद है तुम्हारा कनेर को मुठ्ठी में बंद करके सो जाना,
और कहना ,
यह कनेर कहाँ,
यह तो तुम्हारी यादें हैं,
जो तुम्हारे ना होने पर बंद कर लेती हूँ अपनी मुठ्ठी में,
कि कहीं तुम छूट ना जाओ,
और मैं लपककर कस लेता था तुम्हें.
आज कनेर फिर खिला है,
झरने को आमादा,
लेकिन अब मुठ्ठी में बंद करने को तुम नहीं हो,
कहाँ से लाऊं तुम्हे,
डायरी के फडफडाते पन्नो से तुम्हारा पता पूछा,
और वक़्त की बर्फ पिघलकर,
पीली पड़ गयी.

- नीरज

बाज़ार

पानी बढ़ता जा रहा था,
और सब कुछ डूब रहा था,
पेड़, मकान, पशु, मनुष्य,
और वह ऊपर से गुजरते हुए,
नज़ारे देख रहा था,
नुकसान का हिसाब लगता हुआ,
वह नए बाज़ार की 
आधारशिला
तैयार करने में लगा था.

- नीरज

इंसान

स भीड़ भरी सड़क पर,
मैं देखता रहा, चलता रहा,
किनारों पर, 
अहातों पर, 
रेस्त्रा पर,
फूटपाथ पर,
चिलचिलाती उस गर्मी में,
मैं इंसान ढूंढता रहा.

- नीरज

जल, जंगल और ज़मीन

संथाल परगना के छोटे से इस गाँव में गाड़ियों की आमद बढ़ गयी है, नया उद्योग लगेगा सिनथू....कहते हुए उसने सिनथू की आँखों में झाँका, वह एकटक उसे ही देख रहा था जैसे कुछ समझना चाह रहा हो, फिर उठते हुए बोला, "साहब और कितने पेड़ काटोगे, कितने पक्षी और मारोगे, जंगल बटूर कर छोटा हो गया है, कितने लोहे और गाड़ोगे, कितने घर और जलेंगे साहेब." और उठकर उस पगडण्डी पर चलते हुए खो गया जो कहाँ जाती थी उसे नहीं पता था, लेकिन जंगल और जमीन चीख रहे थे, पानी रो रहा था.

- नीरज

20 मई 2014

डायरी

अब उस डायरी को 
बुकशेल्फ में,
सबसे नीचे वाले,
ड्रावर के कोने में,
रख दिया है,

काश तुम्हारी 
यादें भी,
ऐसे ही कहीं रख पाता,
जहाँ नज़रें
जाने से इनकार कर देती.

- नीरज

18 मई 2014

अतिक्रमण


ह कुछ अलग था, पहले से बिलकुल अलग,
जीने के नज़रिए में आमूल चूल परिवर्तन आ चुके थे,
सुबह सुबह लोटा लेकर संडास के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी,
बल्कि नलके में पानी आता था,
और गुसलखाना अब घर में ही बन गया था,
पूरा घर तब्दील हो गया था यन्त्र में,
जैसे घर नहीं, मशीन बन गया हो,
इस उम्र में मुझे अब यह ऐसा ही लगता था,
लेकिन बदलाव तो आना ही है,
आकर ही रहेगा, और मैं अपने आप को समझा लिया करता था,
समय के साथ मैं भी बदलाव का शिकार हो गया,
और मुझे अब यह कुछ नया नहीं लगता था,
यह मुझमे शामिल हो गया था,
गाँव की ठंढी हवा रास नहीं आती थी,
कुछ ही दिन में बोरियत होने लगती थी,
चौराहे पर चाय की दूकान की वह महफिलें अब सुनी लगने लगीं थीं,
और चौरसिया का पान फीका,
रात को खाने के बाद छत से दीखता तारों से भरा आसमान खाली लगता था,
और किनारे पर लगी चारपाई पर,
मैं मैट्रेस का स्पंजी सुख खोजने लगा था,
रात बीत जाती थी करवटों में,
गाँव से भागने की जल्दी होती थी,
और शहर पहुंचकर ही राहत मिलती थी,
देखते देखते समय पंख लगाकर उड़ गया,
५० से ८० साल कब हो गए पता ही ना चला,
लेकिन अब बदलाव की जरुरत फिर से थी,
यंत्रों की नहीं, प्रकृति का सानिध्य चाहिए था,
गाँव जाने की इच्छा जोर मारने लगी,
किसी तरह फिर वहीँ पहुंचा,
जहाँ चौरसिया का पान,
और चौराहे की बकर में उम्र के पचास साल बीते थे,
लेकिन घर अब ढह चूका था,
एक बूढी जर्जर ईमारत आखिर कब तक अकेली रहती,
और छज्जों पे उग आये पीपल के पेंड मुह चिढ़ा रहे थे,
टूटे घर के सामने अपना कद छोटा लगने लगा था,
उस दिन टूटी चारपाई पर भी भरपूर नींद आयी,
लेकिन सुबह फिर वही ढह चूका घर,
और खंडहरों के निशानों ने वापस शहर भेज दिया,
अब शहर खाने को दौड़ता था,
और बदलाव मुझे अतिक्रमण लगने लगे थे,
अतिक्रमण, मेरे सपनों पर, मेरे बचपन पर,
पचास साल के जीवन पर,
जिन्हें यंत्रों से बांधने की जिद यहाँ ले आई थी,
एक नए बदलाव में ढलने के लिए,
लेकिन आज उस अतिक्रमण ने मेरे पूरे जीवन को अमर बेल की तरह ढँक लिया है,
और यह अतिक्रमण अभी भी बदस्तूर जारी है,
बस फिर एक बार बदलना चाहता हूँ, सोना चाहता हूँ,
तारों से भरे आसमान के नीचे अपनी उसी पुरानी छत पर,
और उसी मिटटी में सिमट जाना चाहता हूँ,
जो अब गाहे बगाहे मेरे शरीर से कभी कभी फिर से महक जाया करती है.

- नीरज

एक बुजुर्गवार के शब्दों में जो तीस साल पहले दिल्ली आये थे, यहाँ के बदलते परिवेश में वह कुछ यूँ शामिल हुए कि भागती दौड़ती जिंदगी के तीस साल कब यंत्रवत गुजर गए पता ही नहीं चला, जब जीवन में फिर से बदलाव के बुलबुले फूटने शुरू हुए तो शहरी अतिक्रमण इस हद तक हावी हो चूका था कि वह वापस जाना चाहकर भी नहीं जा सके. आजकल रोज़ रात वह छत से आसमान को निहारते रहते हैं इस आस में कि क्या पता कब आसमान तारों से भर जाए और वह अपने अतिक्रमण से आज़ाद से हो सकें.

16 मई 2014

लोकतंत्र


ब शब्द, वाक्य, बयान, सब पीछे रह गए हैं, रह गया है एक सन्नाटा, हाँ यह सन्नाटा ही तो है, जो सुनामी की तरह पल प्रति पल बढ़ता ही जा रहा है, ऊँची होती जा रही हैं उसकी लहरें, गहरे धंसती जा रही हैं उसकी जड़ें, रोक सको तो रोक लो, और मेरी कातर ध्वनि गूंज उठती है, कराह उठती है मेरी सांसें, और सनसनाते सन्नाटे में दूर तक पसरती चली जाती है मेरी आवाज़, अब कोई नहीं आता मेरी तरफ, न कोई विचारधारा, न कोई वाद, संवाद के तार भी अब ख़त्म होते हुए दिखने लगे हैं, चे, मार्क्स, लेनिन के शब्द अब सजाये जाने लगे हैं मेरे मकबरे पर, मुझे जिन्दा ही मार दिया गया है, मैं दबता जा रहा हूँ, दबता जा रहा हूँ, मेरी सांस अब घुटने लगी है, शरीर जवाब देने लगा है, आँखें काले अंधेरों में रौशनी के विष्फोट से चुंधियांने लगी हैं, और मैं सिमटता जा रहा हूँ, मौत के आगोश में, इस आस में अपनी सांसों को थामे हुए, कि "लोकतंत्र" इतनी आसानी से नहीं मर सकता।
- नीरज

15 मई 2014

बचपन















क मद्धिम सा दिया जल रहा था,
दक्षिण वाले ताखे पर रखा हुआ,
जिसके नीचे नाना जी सोये हुए थे,
कोठरी और दक्षिण वाले ताखे के बीच,
आँगन था,
और ऊपर आकाश से पहले,
टेढ़वा आम की शाखाएं दिखती थी,
जिनके बीच से झिलमिलाता था,
हमारे बचपन का तारों से भरा,
साफ़ और इमानदार आसमान।


2)
हम कलकत्ते से गाँव आ गए थे,
खुशियाँ काफूर हो जाती थी,
घर पहुँचने के दो चार दिन बाद ही,
और जीवन फिर वैसा ही हो जाता था,
जैसे मेढ़ों की दहलीजों से बंधे खेत,
और छुट्टियाँ बीत जाती थी,
बड़कवा(उच्च) और छोटकवा(नीच) का भेद तलाशने में।

3)
वह हमारे यहाँ काम करती थी,
बारिन की बिटिया थी,
पूरे घर के बिखरे हुए बर्तन खोज खोज के वही धुलती थी,
बड़ी हो रही थी, कुछ निगाहें उसमे हमेशा कुछ न कुछ,
खोजा करती थी,
लेकिन वह हमारे घर को छोड़कर कहीं और जाती भी तो न थी,
फिर एक दिन सुबह सुबह, आनन् फानन में
घर के लोग उसे अस्पताल ले गए,
मैंने माँ से बहुत पूछा क्या हुआ,
माँ ने कहा था वो पेट से है,
अस्पताल से आने के बाद, उसकी शादी हो गयी,
लेकिन मैं उसका पेट ही देख रहा था,
मुझ जैसा ही तो था,
लेकिन भैया कई दिनों तक घर में न थे।

4)
हमारे बड़े से घर के बगल में उसकी छोटी सी झोपडी थी,
वह हमेशा द्वार पर ही बैठा रहता था,
बाँस की खपच्चियों से अकेले ही खेला करता था,
मैं छत से उसे रोज देखता था,
हमारी नज़रें मिलती,
और हम मुस्कुरा देते थे,
बाकी लड़कों की तरह वह हमारे साथ नहीं खेलता था,
बस दूर से हमें देखता था, खेलते हुए,
माँ ने बोला था वो नीच है,
लेकिन मैं चुपके से उसके पास चला जाया करता था,
और बाँट आता था उसके हिस्से का बचपन,
जो हमेशा उसकी झोपडी के द्वार पर,
बैठा रहता था, अकेला।

5)
आज कोई मेहमान आये हुए थे,
लेकिन ये कैसे मेहमान,
उन्हें पानी भी न पिलाया गया,
मैं दौड़ के बाहर गया,
नाना जी थे,
माँ उनसे मिली,
और वो फिर चले गए,
लेकिन मैं सोचता ही रह गया,
माँ ने बताया,
बेटी के यहाँ पानी भी नहीं पीते हैं,
क्या बेटियां अछूत होती हैं?
---------------------------------------------------------बचपन(1)

- नीरज

10 मई 2014

फिर गुमशुदा


सुनो, आज फिर याद कर रहा हूँ तुम्हें,
और तुम भागती जा रही हो,
पीछे छोडती अपने क़दमों के निशान,
जो गायब हो जाते हैं,
उस गुमशुदा शहर के दरवाज़े पर जाके,
उडती हुई धुल,
और झुलसाती हुई गर्मी में,
तुम्हारे निशानों को कुरेदता,
मैं फिर देता हूँ तुम्हे आवाज़,
जो शहर के अन्दर बने गुमशुदा मकानों से टकराकर
वापस मेरे ही पास आकर खड़े हो जाते हैं,
और मैं देखता रहता हूँ, इस सोच में कि,
सूरज को ढलने दो,
जला लेने दो मुझे जी भर,
की जब मैं उस गुमशुदा शहर में पहुंचू,
तो मेरा रंग भी उस शहर की ही तरह काला हो चूका हो,
और मैं भी गुम हो सकूँ उसकी दीवारों में उस जैसे ही,
और तुम चांदनी बनकर चमका करो मुझ पर भी,
गुमशुदा हो चुके उस शहर की तरह,
फिर याद कर रहा हूँ तुम्हे,
आज चांदनी बादलों में गुम हो गयी है,
और मेरा कालापन अब बारिश में धुलने लगा है,
एक बार फर चमक जाओ,
कि मुझसे बहती राख अब फिर से जलना नहीं चाहती.
मैं गुम होना चाहता हूँ, तुम्हारी ही तरह,
बहते हुए बादलों के उस पार अब भी उसी गुमशुदा शहर के सामने खड़े हुए,
इस इंतज़ार में की सूरज फिर निकलेगा, फिर जलूँगा मैं,
और शामिल हो सकूँगा गुमशुदगी के उस शहर में,
जहाँ तुम्हारी चांदनी तुम्हारे पैरों के निशानों में भीगते हुए चमक उठती है.

- नीरज

फोटो साभार:  Sandeep Godkhindi