यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब शेर शिकार करता था,
आज शिकार बना बैठा है,
बुझती आँखों में, कुछ शोले अभी भी हैं,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब बारिश से प्यास बुझती थी,
तपती धरती की,
अब धरती प्यासी है,
और ओलों में जलती बारिश है,
खाक में सुलगती आग, खामोश है,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
अनजाने से रिश्तों में, अपनापन खोजते,
पनपती चिंगारी को आग बनाते,
क्रांति के शोले जलते थे, उबलते थे,
ख्वाबों में बुदबुदाते मंत्र जीवन बनते थे,
वह दौर भी था,
यह दौर भी है.
वह दौर भी था,
जब शेर शिकार करता था,
आज शिकार बना बैठा है,
बुझती आँखों में, कुछ शोले अभी भी हैं,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब बारिश से प्यास बुझती थी,
तपती धरती की,
अब धरती प्यासी है,
और ओलों में जलती बारिश है,
खाक में सुलगती आग, खामोश है,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
अनजाने से रिश्तों में, अपनापन खोजते,
पनपती चिंगारी को आग बनाते,
क्रांति के शोले जलते थे, उबलते थे,
ख्वाबों में बुदबुदाते मंत्र जीवन बनते थे,
वह दौर भी था,
यह दौर भी है.
- नीरज
चित्र: गूगल से साभार( एम् ऍफ़ हुसैन की "रैप ऑफ़ इंडिया")


