27 अप्रैल 2014

दौर


ह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब शेर शिकार करता था,
आज शिकार बना बैठा है,
बुझती आँखों में, कुछ शोले अभी भी हैं,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब बारिश से प्यास बुझती थी,
तपती धरती की,
अब धरती प्यासी है,
और ओलों में जलती बारिश है,
खाक में सुलगती आग, खामोश है,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
अनजाने से रिश्तों में, अपनापन खोजते,
पनपती चिंगारी को आग बनाते,
क्रांति के शोले जलते थे, उबलते थे,
ख्वाबों में बुदबुदाते मंत्र जीवन बनते थे,
वह दौर भी था,
यह दौर भी है.
- नीरज

चित्र: गूगल से साभार( एम् ऍफ़ हुसैन की "रैप ऑफ़ इंडिया")

23 अप्रैल 2014

अशआर

दर्द अब मंजर है,
बहते वक़्त में किरदार ना पूछ,
अब महफिलें लगती हैं लाशों पर,
मुझसे मुफलिसी का हाल ना पूछ,
कितने खंजर चुभे हैं बदन पे,
अब एक एक का हिसाब ना पूछ,
बेगैरत हैं सांसें भी अब,
रूह में खुदा बसता भी है या नहीं,
ऐ ज़िन्दगी ये सवाल ना पूछ.

- नीरज

9 अप्रैल 2014

भाप सी उड़ती यादें


र से कुछ दूर चलने पर भी,
वह नहीं मिला, न ही उसकी कोई यादें थी वहाँ,
सपाट फैला हुआ,
धूल फांकता लैंडस्केप,
कुछ बनने की तैयारी हो रही है यहाँ शायद?
और बचपन के बाग़,
बूढ़ा बरगद, नदारद,
और साथ में अचानक ही कई यादें फाख्ता,
क्या होगा इनका,
इन यादों का,
इस धरती का,
बगल का तालाब,
अरे वह भी नदारद,
हर तरफ धूल और मिट्टी,
और पैसे की कजरी आँधी,
और धूल का एक बवंडर मुझे भिगोता हुआ चला गया,
गरम कुछ ऐसा जैसे जलती कॉफ़ी जलाते हुए छलक जाए,
मेरी यादें उड़ चुकी थी,
और सामने पसरा हुआ था,
विकसित होता संसार, जलती हड्डियां, मरते किसान,
और और और........भाप सी उड़ती यादें।

- नीरज