9 मार्च 2014

बक बक, कुछ ऐसा भी

बस इतनी सी कहानी है मेरी, एक प्रेयसी जो मुझसे दूर है, एक घर जिसे छूटे सालों गुजर गए, कुछ दोस्त जो अब अपनी दुनिया में सिमट चुके हैं. समय के पहिये चलते रहते हैं, कौन रोक सका है इन्हें, फिर मैं क्या चीज़ हूँ? लेकिन कुछ तो है जो जीने को कहता रहता है, शायद कोई आग? आग ही कह लीजिये, जब तक जलती है, जलाती है, मारती है लेकिन ज़िन्दगी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा भी वही बनती है, तो शायद यह आग ही है जो सीने में धधक रही है और जीने को उकसाती रहती है. किसी ने कभी कहा था कि जीवन पानी का बुलबुला है, मुझे भी लगता है यह बुलबुला ही है, लेकिन वो नहीं जो बनते ही भद्द से फूट जाये, लेकिन वह बुलबुला जो ऊपर उठता जाता है, उठता जाता है, आकाश की तरफ और फूटता तब है, जब हवा का दबाव उसे चारो तरफ से घेर लेता है, सांसें रोकना चाहता है वो, रोकता भी है और वहीँ वह फूटता है, इसलिए नहीं कि टना उसकी नियति है बल्कि इसलिए क्यूंकि उसकी आग शुन्य हो जाती है, उसकी रुकी हुई साँस एक शुन्य का क्षितिज बनती है, और शून्य फिर जीने कहाँ देता है.
चार बजने वाले है, दोपहर कितनी तेजी से गुजर गया पता भी ना चला, वैसे ही जैसे दिन, महीने, साल कितनी तेजी से गुजर गए, बचपन कब फिसला और जवानी की दहलीज ने अपने पांव कब पसार के लम्बे कर लिए, पता भी नहीं चला, और बीता हुआ समय यादों के जंगल का एक हिस्सा बन गया, ऐसा हिस्सा जो जब तब दावानल बन जाता है, और उसकी राख उड़ उड़ कर हर तरफ फ़ैल जाती है, फिर बारिश का पानी भी नहीं धुल पता उन्हें, जंगल के पत्ते उस राख में ऐसे लिपटे रहते है जैसे जन्म-जन्मान्तर का रिश्ता हो, शायद है भी ऐसा, नहीं तो दावानल, राख और जंगल जैसे शब्दों की उत्पत्ति ही कहाँ से होती. कहाँ से इस छोटे से दिमाग में इतने ख्याल उपजते, इतने रहस्यों का निर्माण कहाँ से होता, समय इतनी गुलातियाँ अहन से लगाता और बंदर की तरह उछल उछल कर पल भर में ओझल कैसे हो जाता?
एक कहानी लिखने का मन हो रहा है, लेकिन क्या लिखूं, इतनी कहानियां तो बिखरी पड़ी है, फिर भला मेरी कहानी कुछ खास होगी क्या? क्या पता हो भी सकती है, जंगल वाली लड़की क्या पता अपनी कहानी छोड़कर मेरी कहानी में आकर बस जाए, इग्लू में रह रहे हिम मानव क्या पता , रेतों पे स्केट करते हुए भरी गर्मी में फर वाले कपडे पहने हुए बर्फ उड़ाते मेरी कहानी के कुएं का पानी पीने चले आयें, उससे भी कुछ ना हो तो क्या पता सबरी की कुटिया के जूठे बैर ही मांग लें, द्रोपदी के बर्तन का एक चावल ही ले लें और खाते रहे फिर सालों साल, और वो लड़की एकटक देखती रहे मुझे प्रेम भाव में और मैं समझ बैठूं कि यह उसके प्रणय निवेदन का तरीका है, फिर क्या पता निकल आये मेरी भी कहानी में कुछ दैत्य, कुछ लोग, और एक भरा पूरा समाज, विश्व, और मैं उन सामाजिक यातनाओं में हो रहे प्रणय के इस निवेदन में पीट दिया जाऊं, और अस्पताल की एक टूटी चारपाई पर बंद आँखों से सखी सैयां गाने को बुदबुदाता रहूँ, और मेरी भी कहानी को बुकर और ऑस्कर मिल जाए, सपने अछे हैं लेकिन कहानी अभी भी नदारद है, बोलने से कहानी नहीं बनती सिर्फ बच्चे सोते हैं, क्यूंकि उन कहानियों के सिर और पांव नहीं होते, मेरे बचपन के थे शायद? क्या पता?

- नीरज

चित्र साभार: के डी सिंह चौहान 

9 टिप्‍पणियां:

  1. aapki baton mein ek ehsas hai..ek khwab hai...aur bahut sara pyar hai..bahut badiya likha h aapne...
    mere blog par bhi aapka swagat hai.
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

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  2. i am seriously surprised at hw well u write..... loved this simple yet effective post......

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  3. Thanks Ankita for these appreciating and wonderful words. Thank you.

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  4. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .बधाई

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  5. बचपन की कहानियां अपने आस-पास इतनी बिखरी मिलती हैं कि शब्द कम पड़ जाए.
    बहुत सुंदर अहसास.

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