28 दिसंबर 2011

क्यूंकि सृजन शूल से उत्पन्न होता है....


कभी कभी सोचता हूँ....
कि क्या ये सब मैं ही करता हूँ...
बड़ी बड़ी डींगे हांकते हांकते क्या मैं ये सब भी कर जाता हूँ...
अब यह न पूछ बैठना की मैं कौन सी बातें कर रहा हूँ...
बस लिख रहा हूँ....क्युंकी सृजन शूल से उत्पन्न होता है और...
मैं सृजन के लिए शूल बनाने की तैयारी में जुटा हूँ...
लिखते लिखते जब रुक जाती है मेरी उँगलियाँ ....
तो चाय खोजने लग जाता हूँ...
उससे भी जब रहा नहीं जाता...
सिगरेट के दो कश भी लगा लेता हूँ....
सुना नहीं है....बड़े से बड़ा सृजनकर्ता पीता है....
अरे!!! सिगरेट .....................तभी तो भाव आते हैं....
जैसे भाव इनके गिरवी हैं......
भाई इसीलिए तो कहता हूँ कि...
सृजन शूल से उत्पन्न होता है और...
मैं सृजन के लिए शूल बनाने की तैयारी में जुटा हूँ...
कुछ फोटुएं टटोलता हूँ....उनमे से अपने जरुरत के भाव पैदा कर लेता हूँ...
कुछ रचनाकारों को पढता हूँ....और फिर..
सच कहूँ....लिखने कि बड़ी ही तीव्र चाह होती है....
और लिखने लगता हूँ...आड़ा तिरछा...सतही अच्छा जैसा भी हूँ...
लिख डालता हूँ....क्युंकी मुझे सिर्फ लिखना होता है...
लिखने के लिए....न कि अपने लिए....
मुझे फर्क पड़ता है लेकिन....जब मेरी रचना कि आलोचना कि जाती है...
जब मुझे सीधे आसमान से ताड़ पड़ लाकर पटक दिया जाता है..
तब मुझे शूल का आभाष होता है....लेकिन तब सृजन नहीं होता...
क्युंकी सृजन के लिए तो शूल बनाना पड़ता है....
और मैं सृजन के लिए शूल तलाश रहा हूँ....

(हरिवंश राय "बच्चन" जी की "सृजन शूल से उत्पन्न होता है" से पैदा हुए भावों की अवारापन रचना....) अब यह रचना है या नहीं इससे मेरा कोई सरोकार नहीं है...मेरे अन्दर कचोट रहे थे कुछ ऐसे भाव जो कागजों को रंगे बिना मानने वाले न थे......लेकिन सच कहूँ तो मुझे ताड़ की भी नहीं बल्कि कठोर धरातल चाहिये....जहा गिरने पर शायद मुझे मेरा शूल मिल जाये....

21 दिसंबर 2011

वक़्त की चादर


कितनी महीन सी होती है न वक़्त की चादर...
अभी कल की ही तो बात है...
जब तुम्हारे आलिंगन में डूबा हुआ सारा जहाँ घूम कर आ गया था..
पार्क की चारदीवारी से सटे हुए गुलमोहर ने भी,
हमारी उपस्थिति दर्ज कर ली थी...
याद है वो गार्ड जो हमें देखते ही मुह फेर लिया करता था...
अपने कानों और आँखों पे अपने हाथों को ले जाकर न जाने किन आकृतियों को बनाकर,
शून्य में नमस्कार किया करता था...
पर हमें कहाँ खबर होती थी इन बातों की,
हम तो डूब जाते थे अपनी ही बातों में.....
जो न जाने कितनी होती थी...
कि शाम ढलने के बाद भी ख़तम न होकर...
देर रात तक फ़ोन पर भी हुआ करती थी....
फिर वक़्त ने हलकी सी अंगड़ाई क्या ली...
हम कहाँ से कहाँ आ गए....एक छोर से दूसरे छोर तक न जाने कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया...
फिर भी ये बातें अभी कल ही की तो लगती हैं...
एक झीनी सी चादर की तरह...
जिनके आर पर सब कुछ साफ साफ दिखता है....

-नीरज