वीकेंड आते आते बहुत कुछ बदल जाता है, ५ दिनों की लगातार भागमभाग अपने अंदर बहुत कुछ अस्थिर कर देती है और एक एक करके कई सारी नयी पुरानी यादें मनस पटल पर अपनी पूरी व्यग्रता के साथ चस्पा हो जाती हैं। मन एकांत ढूंढता है, सच है लेकिन एकांत कम अस्थिर नहीं होता, घर के उस एकांत कोने में बैठे बैठे चाहे जितनी चाय और कॉफी खत्म ही जाये, मन वस्तुतः वहाँ नहीं होता, वह तो अनवरत विचरता ही रहता है. और उस विचरण में नया तो नहीं पता लेकिन पुरानी तसवीरें अचानक ही जीवंत हो जाती हैं, और यादों के दरवाज़े धाड़ धाड़ करके बजने लगते हैं, एक अजीब सी स्थिति होती है, जो समझ में नहीं आती लेकिन यात्रा का एक पूरा काल यादों के बड़े परदे पर चलने लगता है. इसमें ड्रामा, एडवेंचर, कॉमेडी और एक्शन सब कुछ होता है, और उनके खत्म होने तक आँखों के कोने मोतियों से भीग जाते हैं.
कभी कभी सोचता हूँ कि जीवन एक यात्रा ही तो है, और क्या है भला यह? एक ऐसी यात्रा जो अंतिम साँस के साथ ही ख़त्म होगी, इस यात्रा में भी पड़ाव आते हैं, पड़ाव पर मिलती हैं खुशियां, कभी ग़म भी अपनी अचमन में बांध लेता है कुछ पल, नए चेहरे, लोग, जगह, रिश्ते - नाते और क्या क्या नहीं है इस यात्रा में, इस यात्रा में बंधी होती है अनेकों यात्राएं जो रह रह कर शुरू हो जाती हैं लेकिन ख़त्म नहीं होतीं, ख़त्म होती है तो साँस और जीवन के इस अंत से हम हमेशा भागते रहते हैं, विवश होकर ही सही लेकिन इस यात्रा को जारी रखते हैं, आगे न बढ़ पाने का भय और उस भय से जीतने का प्रयास हमेशा चलता रहता है, लेकिन मंज़िल तो अपना पता ढूंढ़ ही लेती है, और उसके आगोश में जाते ही सारी यात्राएं थम जाती हैं, रह जाता है एक सन्नाटा, जिसको महसूसने के लिए हम कभी तैयार नहीं होते, न होना चाहते हैं.
क्या ऐसा ही कुछ सन्नाटा घर के उस कोने में बैठे महसूस नहीं होती? कॉफी के मग के ठीक पास शीशे के छोटे से पारदर्शी मर्तबान में हरा भरा लकी बम्बू, अपनी जड़ों को ताल में टिकाये कॉफी के ख़त्म होने का इंतज़ार करता रहता है इस आस में कि कॉफ़ी के ख़त्म होने के साथ ही निगाहें उसकी तरफ जरूर जाएंगी, उसे कॉफ़ी से हमेशा चिढ होती होगी लेकिन इन सबके बावजूद वह चुपचाप कॉफ़ी को सूंघता रहता है, ऐसा नहीं है कि निगाहें वहाँ नहीं जाती हैं लेकिन यह उसकी यात्रा है, कॉफी के मग की खुशबु, टेबल का ग्लास, खिड़की से छनकर आती धूप और परदे को धकेलकर अंदर आने वाली हवा, यह सब उसकी यात्रा के साथी हैं, और वह शायद इन सबमे ही खुश रहता है, शायद न भी हो, हमें क्या पता? हमें तो उसका हरापन अच्छा लगता है, कितना लकी है यह तो आज तक नहीं जान पाया , लेकिन हवा से हिलते समय वह कई सारी पुरानी यादें ताज़ा करता है, हाँ गर्मी के समय गॉव की वह रात, जिसमे हवा के साथ बांस का झूमना हमेशा डराता था मुझे, लेकिन शहर पहुँचते ही उतना याद भी आता था, समय के साथ साथ वे बांस भी न रहे और न रही वह हवा और वह घर, क्या पता खंडहरों के बीच उसके कुछ बीज आज भी कहीं जिन्दा हों, क्या पता उन खंडहरों में फिर कोई जीवन सांस लें और फिर से खड़ा हो जाये वहाँ एक फलता वह फूलता बड़ा सा घर, जिसके हर कोने में आवाज़ हो, ज़िन्दगी हो, प्रेम हो, दुःख हो, तृष्णा हो और हो बचपन कि वह लड़ाइयां, जहाँ कितना भी सही होने पर पापा से मार तो पड़नी ही थी, कोई शर्मिंदगी नहीं, ढीठता से कहते थे, अरे खा लूँगा आज मैं मार लेकिन बेट्टा आज तो तुम्हे बिना मारे न जायेंगे, और अगर यह बात उनके कानों तक पहुँच जाये तो दो डंडा और बढ़ जाता था, लेकिन दुसरे दिन आँखों में आँखें डाल कर यह कहने पर कि "देखला" ....सारा दर्द छू मंतर हो जाता था. ऐसे ना जाने कितने गाँव हम सबके अंदर अभी भी साँस लेते रहते हैं, और फिर गाँव ही क्यों, यादों कि यह यात्रा सिर्फ गाॉवों भर से थोड़े ही बनती है, इसमें ना जाने कितने शहर होंगे, बचपन का पहला प्यार होगा, वह पहली शहर की यात्रा, कॉलेज का पहला दिन, मम्मी पापा के साथ पहली छुट्टियां, पहला विदेश जाने का खुश और न जाने कितना कुछ. यादों का यह बक्सा हमेशा बजता ही रहता है, चाभी देने भर की देर है और यात्रा का रंगमंच तैयार हो जाता है, उसके पात्र, निर्देशक सब दो मिनट में रेडी और सेट तो पूरी दुनिया ही होती है, कहीं भी डेरा डाल दिया.
सोच रहा हूँ कि क्या शाम हो गयी है? क्या एक दिन और ढल जाने को है इस यात्रा का .....क्या रात आज पूर्णिमा की है या फिर अमावस के अँधेरे में ही करनी होगी यात्रा, पर्दा एकबारगी जोर से उड़ पड़ता है और समुद्र से उठकर आती हवा अपने आगोश में ले लेती है, पल भर के लिए ही सही घर के इस एकांत कोने में भी ज़िन्दगी साँस लेने लगती है.
- नीरज
कभी कभी सोचता हूँ कि जीवन एक यात्रा ही तो है, और क्या है भला यह? एक ऐसी यात्रा जो अंतिम साँस के साथ ही ख़त्म होगी, इस यात्रा में भी पड़ाव आते हैं, पड़ाव पर मिलती हैं खुशियां, कभी ग़म भी अपनी अचमन में बांध लेता है कुछ पल, नए चेहरे, लोग, जगह, रिश्ते - नाते और क्या क्या नहीं है इस यात्रा में, इस यात्रा में बंधी होती है अनेकों यात्राएं जो रह रह कर शुरू हो जाती हैं लेकिन ख़त्म नहीं होतीं, ख़त्म होती है तो साँस और जीवन के इस अंत से हम हमेशा भागते रहते हैं, विवश होकर ही सही लेकिन इस यात्रा को जारी रखते हैं, आगे न बढ़ पाने का भय और उस भय से जीतने का प्रयास हमेशा चलता रहता है, लेकिन मंज़िल तो अपना पता ढूंढ़ ही लेती है, और उसके आगोश में जाते ही सारी यात्राएं थम जाती हैं, रह जाता है एक सन्नाटा, जिसको महसूसने के लिए हम कभी तैयार नहीं होते, न होना चाहते हैं.
क्या ऐसा ही कुछ सन्नाटा घर के उस कोने में बैठे महसूस नहीं होती? कॉफी के मग के ठीक पास शीशे के छोटे से पारदर्शी मर्तबान में हरा भरा लकी बम्बू, अपनी जड़ों को ताल में टिकाये कॉफी के ख़त्म होने का इंतज़ार करता रहता है इस आस में कि कॉफ़ी के ख़त्म होने के साथ ही निगाहें उसकी तरफ जरूर जाएंगी, उसे कॉफ़ी से हमेशा चिढ होती होगी लेकिन इन सबके बावजूद वह चुपचाप कॉफ़ी को सूंघता रहता है, ऐसा नहीं है कि निगाहें वहाँ नहीं जाती हैं लेकिन यह उसकी यात्रा है, कॉफी के मग की खुशबु, टेबल का ग्लास, खिड़की से छनकर आती धूप और परदे को धकेलकर अंदर आने वाली हवा, यह सब उसकी यात्रा के साथी हैं, और वह शायद इन सबमे ही खुश रहता है, शायद न भी हो, हमें क्या पता? हमें तो उसका हरापन अच्छा लगता है, कितना लकी है यह तो आज तक नहीं जान पाया , लेकिन हवा से हिलते समय वह कई सारी पुरानी यादें ताज़ा करता है, हाँ गर्मी के समय गॉव की वह रात, जिसमे हवा के साथ बांस का झूमना हमेशा डराता था मुझे, लेकिन शहर पहुँचते ही उतना याद भी आता था, समय के साथ साथ वे बांस भी न रहे और न रही वह हवा और वह घर, क्या पता खंडहरों के बीच उसके कुछ बीज आज भी कहीं जिन्दा हों, क्या पता उन खंडहरों में फिर कोई जीवन सांस लें और फिर से खड़ा हो जाये वहाँ एक फलता वह फूलता बड़ा सा घर, जिसके हर कोने में आवाज़ हो, ज़िन्दगी हो, प्रेम हो, दुःख हो, तृष्णा हो और हो बचपन कि वह लड़ाइयां, जहाँ कितना भी सही होने पर पापा से मार तो पड़नी ही थी, कोई शर्मिंदगी नहीं, ढीठता से कहते थे, अरे खा लूँगा आज मैं मार लेकिन बेट्टा आज तो तुम्हे बिना मारे न जायेंगे, और अगर यह बात उनके कानों तक पहुँच जाये तो दो डंडा और बढ़ जाता था, लेकिन दुसरे दिन आँखों में आँखें डाल कर यह कहने पर कि "देखला" ....सारा दर्द छू मंतर हो जाता था. ऐसे ना जाने कितने गाँव हम सबके अंदर अभी भी साँस लेते रहते हैं, और फिर गाँव ही क्यों, यादों कि यह यात्रा सिर्फ गाॉवों भर से थोड़े ही बनती है, इसमें ना जाने कितने शहर होंगे, बचपन का पहला प्यार होगा, वह पहली शहर की यात्रा, कॉलेज का पहला दिन, मम्मी पापा के साथ पहली छुट्टियां, पहला विदेश जाने का खुश और न जाने कितना कुछ. यादों का यह बक्सा हमेशा बजता ही रहता है, चाभी देने भर की देर है और यात्रा का रंगमंच तैयार हो जाता है, उसके पात्र, निर्देशक सब दो मिनट में रेडी और सेट तो पूरी दुनिया ही होती है, कहीं भी डेरा डाल दिया.
सोच रहा हूँ कि क्या शाम हो गयी है? क्या एक दिन और ढल जाने को है इस यात्रा का .....क्या रात आज पूर्णिमा की है या फिर अमावस के अँधेरे में ही करनी होगी यात्रा, पर्दा एकबारगी जोर से उड़ पड़ता है और समुद्र से उठकर आती हवा अपने आगोश में ले लेती है, पल भर के लिए ही सही घर के इस एकांत कोने में भी ज़िन्दगी साँस लेने लगती है.
- नीरज

