1/12/2014
वक़्त बीतता जाता था, और पानी की रिसती बूँदें टप टप टपकती ही रहती थी, जाने कहाँ से आ रही थी,
और उसके माथे से फिसलते हुए,
उसके होठों से लिपटती बूँदें,
शाम अब भी शाम ही थी, या जहर.… या कहीं लगी हुई आग की लपट..... जो भी थी, मेरे अंदर एनाकोंडा अपनी नाक और भवें सिकोरता हुआ लम्बी लम्बी फ़ुफ़कारें मार रहा था, बात यह नहीं थी कि मैं उसे जानता था, यह भी नहीं कि वह सुन्दर थी, तो.... तो क्या, क्या एक सुन्दर लड़की को देखकर अच्छे ख्यालों का पुलिंदा गुच्छे नहीं बना सकता, या की नहीं कर सकता वह प्रेम का कातर निवेदन, मैंने कुछ भी नहीं किया, चुप चाप खड़ा रहा, उसे देखते हुए, बरसात झमा झम होती रही और मैं उसको देखता रहा, जाने कब तक?
उसके होठों से लिपटती बूँदें,
शाम अब भी शाम ही थी, या जहर.… या कहीं लगी हुई आग की लपट..... जो भी थी, मेरे अंदर एनाकोंडा अपनी नाक और भवें सिकोरता हुआ लम्बी लम्बी फ़ुफ़कारें मार रहा था, बात यह नहीं थी कि मैं उसे जानता था, यह भी नहीं कि वह सुन्दर थी, तो.... तो क्या, क्या एक सुन्दर लड़की को देखकर अच्छे ख्यालों का पुलिंदा गुच्छे नहीं बना सकता, या की नहीं कर सकता वह प्रेम का कातर निवेदन, मैंने कुछ भी नहीं किया, चुप चाप खड़ा रहा, उसे देखते हुए, बरसात झमा झम होती रही और मैं उसको देखता रहा, जाने कब तक?
यह कहानी बरसात की उस शाम की है.………………
22/1/2016
उसकी आँखें मुझमे न जाने क्या ढूंढा करती थीं? आज तक नहीं समझ पाया और अब समझना भी नहीं चाहता, शायद समय के साथ साथ बहुत सारी चीज़ें ऐसे होती हैं जिनके लिए जिज्ञासा स्वतः ख़त्म हो जाती हैं। उसकी आँखें भी कुछ ऐसी ही जिज्ञासा थी, जिसे उसने कभी भी मेरे अंदर शांत नहीं होने दिया, जाने क्या बात थी उसकी आँखों में, एक अजीब सा खिंचाव, एक सम्मोहन, कुछ जाना पहचाना सा डर या फिर कुछ और? पता नहीं, है न कुछ अजीब सा? लेकिन बहुत कुछ था उन आँखों में जिसे उसने मुझ पर कभी भी उजागर नहीं होने दिया, चाहे वह हमारी पहली मुलाकात हो, हाँ वही........... बरसात की वह शाम, एक सुन्दर लड़की और एक लड़का जिसे हर लड़की में अपनी प्रेमिका ही दिखती थी, हर लड़की से प्रणय निवेदन करने को आतुर, चाहे कुछ भी हो जाये, लेकिन उस लड़की में कुछ अलग था, दुनिया से कुछ अलग, एक अजीब सा सम्मोहन था उसमे कि वह उसे देखकर भी , बहुत कुछ बोलना चाहकर भी, नहीं बोल पाया था कुछ।
बरसात की उस शाम को वह बस उसे देखता रहा, बारिश होती रही, वह भीगता रहा, लेकिन जैसे कोई असर ही नहीं, ऐसा भी नहीं था कि वह उसकी आँखों में आँखें डाल दे और पूछ ले कि कौन ही तुम रूपवती? क्या नाम है तुम्हारा? कहाँ से आयी हो?
टीनएज में सब कुछ फैंटसी ही लगता है और उन फैंटसी से ही निकलते हैं शब्द और इमेजिनेशन तो न जाने कहाँ कहाँ उड़ा ले जाती है, उसकी आँखों में देखता हुआ मैं भी यही सोचता रहा, परियों के देश में चला गया, ता थैया ता थैया गाना भी गा लिया और सिंदबाद के साथ समुद्रों के ऊपर उड़ भी आया, यह सब कुछ उसकी आँखों में देखते हुए ही हुआ था, न मेरी पलकें झपकीं और न उसकी, लेकिन फिर भी ऐसा लगता था जैसे वह मुझे देख ही नहीं रही है, या मेरे वहां आ जाने से उसको कोई फ़र्क़ ही न पड़ा हो, बारिश का लगातार बढ़ता जाना भी उस पर जैसे कोई असर नहीं डाल रहा था, समय कब कैसे बीता पता ही नहीं चला, और अचानक ही वह उठकर मेरी तरफ बढ़ी, सारी कायनात में अचानक सरगोशी हो गयी, पूरी कि पूरी दुनिया अचानक ही ज़िंदा हो गयी और बारिश की छींटों ने उठा कर इस दुनिया में ला पटका और सारा का सारा ता थैया, परियों का परीलोक सिंदबाद का समुद्र मिनटों में बारिश के पानी में बह गया, रह गयी काली होती शाम और बस स्टॉप। और बस स्टॉप पर खड़ी एक लड़की और मैं...हाँ वही लड़की जिसे मैं घंटों से देखे जा रहा था और वह अब मेरी तरफ बढ़ रही थी, धड़कनें धाड़ धाड़ करके बज रहीं थीं और ऐसा लगता था जैसे अभी सीने को फाड़कर दिल बाहर निकल आएगा, गला सूख कर कांटा हुआ जा रह था और ऊपर से यह हवा, इसे भी अभी ही तेज होना था, ठंढ भी लग रही थी, मतलब वही सब कुछ हो रहा था जिसे नहीं होना चाहिए था, उसकी आँखें मुझ पर टिकी हुईं थीं और मेरी उस पर और हर पल वह मेरे नजदीक पहुँचती जा रही थी, और सड़क और मौसम सब अचानक से अकेले होते जा रहे थे, नितांत अकेले ....और मैं बेसहाय.
बरसात की उस शाम को वह बस उसे देखता रहा, बारिश होती रही, वह भीगता रहा, लेकिन जैसे कोई असर ही नहीं, ऐसा भी नहीं था कि वह उसकी आँखों में आँखें डाल दे और पूछ ले कि कौन ही तुम रूपवती? क्या नाम है तुम्हारा? कहाँ से आयी हो?
टीनएज में सब कुछ फैंटसी ही लगता है और उन फैंटसी से ही निकलते हैं शब्द और इमेजिनेशन तो न जाने कहाँ कहाँ उड़ा ले जाती है, उसकी आँखों में देखता हुआ मैं भी यही सोचता रहा, परियों के देश में चला गया, ता थैया ता थैया गाना भी गा लिया और सिंदबाद के साथ समुद्रों के ऊपर उड़ भी आया, यह सब कुछ उसकी आँखों में देखते हुए ही हुआ था, न मेरी पलकें झपकीं और न उसकी, लेकिन फिर भी ऐसा लगता था जैसे वह मुझे देख ही नहीं रही है, या मेरे वहां आ जाने से उसको कोई फ़र्क़ ही न पड़ा हो, बारिश का लगातार बढ़ता जाना भी उस पर जैसे कोई असर नहीं डाल रहा था, समय कब कैसे बीता पता ही नहीं चला, और अचानक ही वह उठकर मेरी तरफ बढ़ी, सारी कायनात में अचानक सरगोशी हो गयी, पूरी कि पूरी दुनिया अचानक ही ज़िंदा हो गयी और बारिश की छींटों ने उठा कर इस दुनिया में ला पटका और सारा का सारा ता थैया, परियों का परीलोक सिंदबाद का समुद्र मिनटों में बारिश के पानी में बह गया, रह गयी काली होती शाम और बस स्टॉप। और बस स्टॉप पर खड़ी एक लड़की और मैं...हाँ वही लड़की जिसे मैं घंटों से देखे जा रहा था और वह अब मेरी तरफ बढ़ रही थी, धड़कनें धाड़ धाड़ करके बज रहीं थीं और ऐसा लगता था जैसे अभी सीने को फाड़कर दिल बाहर निकल आएगा, गला सूख कर कांटा हुआ जा रह था और ऊपर से यह हवा, इसे भी अभी ही तेज होना था, ठंढ भी लग रही थी, मतलब वही सब कुछ हो रहा था जिसे नहीं होना चाहिए था, उसकी आँखें मुझ पर टिकी हुईं थीं और मेरी उस पर और हर पल वह मेरे नजदीक पहुँचती जा रही थी, और सड़क और मौसम सब अचानक से अकेले होते जा रहे थे, नितांत अकेले ....और मैं बेसहाय.
- नीरज
© Niraj Pal
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