27 अक्टूबर 2013

कीपैड की सिम्फनी

दिवाली आने को है, छुट्टियों के लिए महीनों पहले अर्जी डाल रखी थी, लेकिन इस मुए नए प्रोजेक्ट को अभी ही आना था, छुट्टी गयी और दे गयी आँखों में आंसूं, मुठ्ठियों में भरी रेत को पॉकेट के अन्दर बंद हाथों से मसलते रहे, समंदर की लहरें घुमड़ रही हैं, ज्वार आने वाला है, हवा की नमी थोड़ी सी बढ़ गयी है  और मौसम बदलने लगा है। समंदर की लहरें तेज़ होने लगी हैं और दूर दिखाई देता एक जहाज लंगर डालने वाला है, फ़ोन पर मम्मी की आवाज़ भर्रायी हुई थी, और कमरे में रखे बुक शेल्फ की किताबें जलती हुई लगने लगी हैं, लैपटॉप पर एक्सेल के खानों में सिर्फ डॉलर्स दिखाई देते हैं, और बंद आँखों में भाई के साथ पटाखे फोड़ते हुए उल्लासित चेहरा मिटने लगा है, रेत सिमटती जा रही है, किनारे डराने लगे हैं, एक लहर जोर से टकराती है किनारे पड़े पत्थरों से, और पानी के कण बिखरते हुए चेहरे से आ टकराते हैं, सब कुछ बिखरा हुआ, और रात के चार बजे की एक कॉल, दिन उदास, सूरज सिर पर चमकता हुआ गिर जाता है, कुछ आहें निकलती हैं, कुछ सवाल और फिर कीपैड की टप टप में सब कुछ गुम हो जाता है।
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सन्नाटे चमकते हैं, उनमे से कोई प्रकाश रह रह कर बाहर निकलता है। सन्नाटे का भी कोलाहल देखो, अटर पटर करते ही रहते हैं जैसे जीवन अब इन सन्नाटों की ही देन हों, एक अँधेरे से निकलकर दूसरे अँधेरे में प्रवेश करने का माध्यम, अँधेरे के कणों को कभी मटरगश्ती करते हुए सुनने का भी मन करता है और वो आकर ऐसे चिपक जाते हैं, जैसे अब छोड़ने का नाम ही नहीं लेंगे, सच भी है, अब स्टेटस कॉल रातों में ही तो होती है, हमारी रातें, उनका दिन, उनके दिन जीने को अभिशप्त हैं हम और हमारी रातें????????
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क्वेश्चन मार्क्स? ढेर सारे और ढेरों सवाल.................
अभी अभी एक मेल आई है, हैण्ड ओवर ले लिया है? ट्रांजीशन शुरू कर दो, शेयर द स्टेटस बाई इवनिंग,
एक ट्रांजीशन ख़तम, दूसरा शुरू, ढेरों डिटेल्स, ढेरों डाक्यूमेंट्स, बिलिंग, रिसोर्स प्लानिंग, फ्लो चार्ट्स, रिक्वायरमेंट्स वगैरह वगैरह, सब कुछ बदल गया है अब, ज़िन्दगी भी एक प्रोजेक्ट हो गयी है अब जिसकी बिलिंग नहीं होती, जिसमे रिक्वायरमेंट्स दिन ब दिन ख़तम होते जा रहे हैं, ट्रांजीशन की प्रक्रिया रह ही नहीं गयी है, बस एक सवाल कौंधता रहता है, "कल्चरल सेंसिटाईज़ेशन"..........???????
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परदे से छन कर सूरज कमरे में बिखरने लगा है, परदे पर बने निशानों की शक्ल में, पापा की तस्वीर के ठीक नीचे जाकर खत्म हो जाता है उसका वर्चस्व और उसके बिखरे हुए प्रकाश के कणों में तस्वीर चमक उठती है, पापा का फ़ोन जो अभी कल ही आया था, गूंजने लगता है " देख लो समझ बूझ से काम लेना, दिवाली के बाद आ जाना, कोई बात नहीं, नौकरी थोड़े ही छोड़ दोगे।" पाँच साल हो गए दिवाली में सबके साथ, पापा ने भी मन मार के ही कहा होगा, पता है, कुछ भावनाओं के उभरने से पहले ही उन्होंने फ़ोन काट दिया होगा, जेब की रेत छनने लगी है, मुठ्ठियों में कैद वक़्त छूटने लगा है, प्रकाश में डूबा हुआ कमरा अब डराने लगा है, कीपैड की आवाज़ अभी भी गूंज रही है अभिशप्त रातों में और मजबूर दिन के घंटों में बंद आँखें खुल जाना चाहती हैं, सूरज से दो चार होने के लिए, लेकिन शाम फिर आएगी, कमरे का अँधेरा फिर आएगा और कृत्रिम रोशनी से डूबे ऑफिसों में बंधी ज़िन्दगी उसी ढर्रे पर चलती रहेगी कीपैड की सिम्फनी से वशीभूत।


-नीरज

18 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन शहीद जतिन नाथ दास और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.कितना अच्छा लिखते हैं ,नीरज जी.घर से दूर रहने की कसक को बहुत खूबसूरती से उकेरा है,शब्दों में.
    दीपावली की शुभकामनाएँ.
    नई पोस्ट : दीप एक : रंग अनेक

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    1. हार्दिक आभार राजीव जी। आपको भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  3. एक निवेदन
    कृपया निम्नानुसार कमेंट बॉक्स मे से वर्ड वैरिफिकेशन को हटा लें।

    इससे आपके पाठकों को कमेन्ट देते समय असुविधा नहीं होगी।

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    अधिक जानकारी के लिए कृपया निम्न वीडियो देखें-

    http://www.youtube.com/watch?v=VPb9XTuompc

    धन्यवाद!

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    1. हार्दिक आभार विभा जी, आपके निर्देशानुसार वर्ड वेरिफिकेशन हटा लिया है। धन्यवाद।

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  4. shayad aap kisi BPO/KPO jaisi jagah par kaam karte hain .. darasal padhte samay apne ki ek mitr ki yaad aa gai jo BPO mein hai aur uski bhi kuchh yahi kissa kahani hai. aapki lekhan shaili badiya hai.

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  5. लाजवाब लेखन !
    मैने उसी क्षणिक आवेग में कल लिखा :)
    रात और मैं

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  6. Nossa!!! lindas expressão de muito valor, muito obrigado, muitas felicidades Niraj

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