27 अप्रैल 2014

दौर


यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब शेर शिकार करता था,
आज शिकार बना बैठा है,
बुझती आँखों में, कुछ शोले अभी भी हैं,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब बारिश से प्यास बुझती थी,
तपती धरती की,
अब धरती प्यासी है,
और ओलों में जलती बारिश है,
खाक में सुलगती आग, खामोश है,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
अनजाने से रिश्तों में, अपनापन खोजते,
पनपती चिंगारी को आग बनाते,
क्रांति के शोले जलते थे, उबलते थे,
ख्वाबों में बुदबुदाते मंत्र जीवन बनते थे,
वह दौर भी था,
यह दौर भी है.
- नीरज

चित्र: गूगल से साभार( एम् ऍफ़ हुसैन की "रैप ऑफ़ इंडिया")

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 03/05/2014 को "मेरी गुड़िया" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1601 पर.

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  2. विचारणीय..... समय के चलता, बदलता कितना कुछ .....

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    1. समय के रूप अनेक, हार्दिक आभार मोनिका जी!!

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  3. यह दौर भी है, वह दौर भी था। यही जीवन है।

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  4. वक्त वक्त की बात है गिला भी क्या , शिकवा भी क्या सुन्दर रचना

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  5. जब शेर शिकार करता था,
    आज शिकार बना बैठा है,

    शायद शेर को सवा शेर मिल गया

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