यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब शेर शिकार करता था,
आज शिकार बना बैठा है,
बुझती आँखों में, कुछ शोले अभी भी हैं,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब बारिश से प्यास बुझती थी,
तपती धरती की,
अब धरती प्यासी है,
और ओलों में जलती बारिश है,
खाक में सुलगती आग, खामोश है,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
अनजाने से रिश्तों में, अपनापन खोजते,
पनपती चिंगारी को आग बनाते,
क्रांति के शोले जलते थे, उबलते थे,
ख्वाबों में बुदबुदाते मंत्र जीवन बनते थे,
वह दौर भी था,
यह दौर भी है.
वह दौर भी था,
जब शेर शिकार करता था,
आज शिकार बना बैठा है,
बुझती आँखों में, कुछ शोले अभी भी हैं,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
जब बारिश से प्यास बुझती थी,
तपती धरती की,
अब धरती प्यासी है,
और ओलों में जलती बारिश है,
खाक में सुलगती आग, खामोश है,
चिंगारी की तलाश में.
यह दौर भी है,
वह दौर भी था,
अनजाने से रिश्तों में, अपनापन खोजते,
पनपती चिंगारी को आग बनाते,
क्रांति के शोले जलते थे, उबलते थे,
ख्वाबों में बुदबुदाते मंत्र जीवन बनते थे,
वह दौर भी था,
यह दौर भी है.
- नीरज
चित्र: गूगल से साभार( एम् ऍफ़ हुसैन की "रैप ऑफ़ इंडिया")

बहुत सुंदर.
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार राजीव भाई.
हटाएंबहुत सुंदर प्रस्तुति.
जवाब देंहटाएंइस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 03/05/2014 को "मेरी गुड़िया" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1601 पर.
हार्दिक आभार राजीव जी,,,
हटाएंसुंदर रचना.
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार राकेश जी!!!
हटाएंविचारणीय..... समय के चलता, बदलता कितना कुछ .....
जवाब देंहटाएंसमय के रूप अनेक, हार्दिक आभार मोनिका जी!!
हटाएंयह दौर भी है, वह दौर भी था। यही जीवन है।
जवाब देंहटाएंआभार आशाजी...जींवन भी एक पहेली ही है.
हटाएंवक्त वक्त की बात है गिला भी क्या , शिकवा भी क्या सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार.
हटाएंजब शेर शिकार करता था,
जवाब देंहटाएंआज शिकार बना बैठा है,
शायद शेर को सवा शेर मिल गया
शायद कुछ ऐसा ही :)
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