26 अक्टूबर 2015

नींद

जकल देर रात तक नींद नहीं आती, मन ना जाने कहाँ कहाँ विचरता रहता है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये, कैसे इस मर्ज़ से छुटकारा मिले। ज्यादा दिन नहीं हुए हैं अभी जब यही बात मैं उसको समझाया करता था, की फेसबुक से दूर रहो, रात को मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया करो, लैपटॉप को तो अपने अगल बगल भी मत रखना, कहीं ऑफिस का जिन्न निकल आया तो इ मेल के जहर बुझे बाण फिर सोने न देंगे। एक बड़े शहर से दूसरे बड़े शहर में जाना कितना आसान होता है, हम कितनी आसानी से कह भी देते हैं, "आई जस्ट हैव शिफ्टेड हियर" और फिर हँसी के ठहाकों और ग्लासों की खनक में शाम को बीतते समय नहीं लगता, लेकिन अपने अंदर हम भी यह जानते हैं की हाँ छोड़ा है एक शहर, बल्कि यूँ कह लीजिये की एक पूरी ज़िन्दगी ही छोड़ आते हैं हम और नए शहर में हम ज़िन्दगी को फिर से जीने की कोशिश करते हैं, पोस्ट लैम्पों के काले खम्भों की तरह खड़े होते हैं हम और हमारी ज़िन्दगी ऊपर लटके लैंप की तरह बदलती रहती है, कभी फ्यूज हो जाने से, कभी ख़राब होने से या कभी फूट जाने से, लेकिन उसी लैंप की रौशनी में खम्भे को पता चलता है की वह लैंप के न जलने की स्थिति में नहीं देख पायेगा अपने अगल बगल, न ही वह देख पायेगा रात के अँधेरे में तारों पर लटकते हुए बैठे उल्लू को जो उसकी तरफ एक टक देखता हुआ रात गुज़ार देता है और खम्भा लजाकर अपनी कालिमा छुपाने में लग जाता है। हम भी कुछ ऐसा ही करते हैं, ज़िन्दगी बोस्किआना नहीं होती कि ऊपर वाले की रहमत हमेशा रहे, ज़िन्दगी लेकिन फिर कभी खत्म भी नहीं होती, अभी हम हैं, कल कोई और होगा, परसों कोई और और फिर ऐसे ही कहानी बढ़ती जाती है, साल दर साल, और इतना कि हम गिन भी नहीं सकते, लेकिन फिर भी लगे रहते हैं हम ज़िन्दगी की अनंत खोज में।  कब, कैसे, कहाँ? जहाँ भी, लेकिन कैसे शुरू हुई थी ज़िन्दगी, हर प्रश्न का एक उत्तर और हर उत्तर का एक प्रश्न और ज़िन्दगी जटिल से जटिल होती चली जाती है।

ज़िन्दगी की इस जटिल खोज में हम इतने लीन होते हैं कि हमें अपने आस पास कुछ भी नहीं दीखता, सूरज सुबह के कितने बजे चढ़ा था आसमान पर सीढ़ी लगाकर, कितने बजे भूखा प्यासा थक कर, शावर लेने के लिए समुद्र में उतर गया। भोर होते ही चिड़ियों के झुण्ड का एक साथ उड़ना देखे कितने दिन हो गए हैं, हम में से कितनों को तो अब यह याद भी नहीं होगा, गन्ने को चूसते हुए भैंसे के पीछे दौड़ पड़ना और गिरना, उठना और फिर दौड़ना और जब तक भैंसा भागे दौड़ते रहना, लेकिन वही जब घूमके हमें दौड़ा दे, तो सर और पैर दोनों बराबर होकर एक साथ दौड़ने लग जाते, साँसे बाहर आकर धौंकनी बन जाती थी और मुह लट्टू बनकर चकरघिन्नी जैसा नाचने लगता था, और सब कुछ हो जाने के बाद पुल्हिया पर बैठकर बतकही और डूबते हुए सूरज को देखते हुए कहानियां बनाना, फिर मोर, भालू, शेर सबकी कहानियां सुनाना, कितने किस्से फेंके जाते थे, यह तो नहीं पता लेकिन रात को छत पर लेटते ही तारों से भरी एक छत लोरी गाकर सुना देती थी। अब तो तारों से भरी छत के भी लाले पड़ गए हैं।

अनेको ख्याल, अनेको सपने शहर के साथ साथ बदलने लगते हैं अपनी जगह, ठीक वैसे ही जैसे मन अभी भी वहीँ कहीं उस मनी प्लांट में अटका पड़ा है जिसे छोड़ आये थे पुराने शहर, क्या वह अब भी वैसे ही होगा? सूखा नहीं होगा न? लोग पानी दते होंगे? कितना अच्छा लगता था न? और न जाने क्या क्या, शहर बदलते हैं, लेकिन हम नहीं और ज़िन्दगी एडजस्ट करने में लग जाती है, उस पुरानी वाइन के बोतल की तरह जो १०० सालों से पड़े पड़े उक्ता गयी थी, लेकिन फ्रिज में घुसते ही ठंढाने के प्रयास में लग जाती है और फिर सारी उथल पुथल कुछ समय के लिए बंद होकर सुस्ताने लग जाता है।  क्या पता नींद के साथ भी कुछ ऐसा ही हो।

- नीरज

प्रेम के शब्द



दिल करता है,
कि चलो निकल चलें,
दूर कहीं दूर,
जहाँ ये मानवीय दैत्य न हों,
और सच पूछो तो कोई न हो,
सिर्फ मैं और तुम,
मैं इसलिए, कि ला सकूँ मैं वह सब,
जो मैं तुमसे बाँट सकूँ,
तुम इसलिए, कि तुम उनमे घोल सको,
प्रेम का रंग।
मैं यह नहीं कहता,
कि यह पलायन नहीं है,
लेकिन प्रेम में कोई पलायन नहीं होता,
नहीं होता है द्वन्द अहम् का,
प्रेम का कोई इतिहास और भूगोल भी नहीं होता,
कि इस पर किये जा सकें विचारों के प्रयोग,
काटा, और बांटा जा सके इसे अपनी सुविधानुसार,
और फिर इसे लामबंद कर,
मुहर लगाई जा सके किसी वाद की।
यह सत्य है,
और सत्य का कोई आयाम नहीं होता,
यह परिपक्व नहीं होता,
यह बनाता है अपना एक छोटा सा संसार,
और समेट लेता है सबकुछ अपने अंदर,
फिर भी बाकी रह जाता है बहुत कुछ समेटने को,
और रेत के ढूहों पर भी यह खोज लेता है खुशियां।
तो चलो,
चलें प्रेम के गाँव में,
कुछ रुमानियत समेटने,
कुछ संवेदनाओं को फिर से जागृत करने,
कि अब बचा नहीं है, यहाँ कुछ भी,
जिस पर लिख सकें हम,
शब्द,
प्रेम के।
- नीरज

25 अक्टूबर 2015

ठप्पा



मुझे नहीं पता, तुम्हारा नाम, पता,
क्या करते हो,
कहाँ रहते हो,
लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं,
कि तुम मुझे रोक लोगे,
रोक लोगे मेरी पारखी निगाहों को,
जो तुमको किसी भी तरह, चाहे जैसे,
खोज कर लगा देगी तुम पर एक ठप्पा,
ऐसा ठप्पा जो मेरे अनुकूल हो।

क्या हुआ जो मैं तुमसे मिला नहीं,
क्या हुआ अगर हमने कभी,
एक दूसरे को देखकर हंसा नहीं,
 क्या हुआ अगर हमने कभी कोशिश भी न की हो,
एक दूसरे को समझने की,
जरुरत भी क्या है भाई ?
सदियों से यही तो होता आ रहा है,
अपने अनुकूल, अपने हिसाब से,
उन सबको बदल देने की,
जो आपके मिज़ाज के नहीं हैं,
और जिन्हे बदल सकते हो आप,
क्यूंकि उनका प्रतिरोध आपके कानों पर हरकत भी पैदा नहीं करता,
और जो हरकत भी नहीं कर सकता,
उसे अपने मंसूबों में पिरोना,
कितना आसान होता है न ?
कुछ दबी जुबानें बगाहे अगर सुनाई भी देती हैं,
तो क्या?
पढ़े लिखों की दुनिया में,
उन्हें दंगाई करार देने मे,
भला वक़्त ही कितना लगता है ?
तो आप जो भी हैं,
इस मुगालते में न रहे,
कि मैंने आपको रंगा नहीं है,
अरे हुज़ूर, यह तो हमारी आदत है,
हम भला आदत से कहीं बाज़ आते हैं?


- नीरज 

21 अक्टूबर 2015

कहानियां


हानियों पर विश्वास है?
उसने पूछा था मेरी तरफ देखते हुए,
और फिर आगे बढ़ गया,
मैं सोच रहा था,
बचपन से लेकर आज तक कहानियाँ ही तो पढ़ी हैं,
कभी राम की, कभी सीता की,
रहीम की, यीशु की, परियों की, एंजेल्स की, सिंदबाद की,
अलिफ लैला की,
और उन कहानियों में हम इतने लीन होते थे कि,
हमारे खेल भी वैसे ही हुआ करते थे,
शमशीर-ए-सुलेमानी कोई भी खपच्ची बन जाया करती थी,
और झाड़ू की सींक मुड़कर धनुष,
सफ़ेद चदार ओढ़कर यीशु बन जाते थे,
तो उसी सफ़ेद चद्दर को लटकाकर पेड़ के नीचे बैठ कर गुरु नानक,
शोएब कभी राम बन जाता तो सोफ़िया सीता,
मुझे तो सिंदबाद बनने में बड़ा मजा आता था,
औए सोफ़िया मेरी बेगम झट से बन जाती थी,
रेखा को कुछ भी बना दो, उसे कोई गुरेज नहीं था,
और धर्मेन्द्र ?
वह तो रावण और असुर ही बनता था,
शैतान भी वही बनता था,
जाने उसे क्या मजा आता था?
और हँसते हुए कहता था,
शैतान जब मरता है तो यही सोचता हूँ,
कि वह राम और सिंदबाद भी हो सकता था,
अगर होता तो मरता क्यों?
और हम सब ठठा कर हंस देते थे,
और बोलते थे,
बुद्धू, चल अभी रावण बन जा,
राम की लड़ाई शुरू हो गयी है,
और वह झट से बैट उठा के मुद्रा में आ जाता था।

ठठाकर हंस रहा था मैं उन सबको याद करके,
और उसको जोर से चिल्लाकर बोला था,
"हाँ, है न कहानियों पर विश्वास, तुम कौन सी कहानी सुनाओगे?"
और उसने घूम कर कहा था,
"नहीं कोई कहानी नहीं सुनाऊंगा, मैंने पूछा था कि क्या उन कहानियों में मज़हब भी था?"
और वह चलता चला गया,
उसके शब्द गूंजते रहे, एक प्रश्न मैंने भी लगा दिया उसके वाक़्य में,
और बुदबुदाता हुआ बोल पड़ा,
"हाँ जाति पात भी नहीं थी। "

हंसी काफूर हो चुकी थी,
क्या आप हंस रहे हैं?

- नीरज

पैबंद

             

तुम्हारे हाथों में मेरा हाथ ऐसे कांप रहा था,
जैसे करंट के हज़ारों झटके एक साथ लगे हों,
पसीने से लबरेज़ मेरे चेहरे पे उगी दो आँखों में,
कुछ सपने थे, तुम्हारे, मेरे.... हमारे,
और तुमने मेरे हाथों को होले से दबा दिया था,
और बंद कर ली थी अपनी हथेलियों में,
मेरे कंपकंपाते पंजे को,
और तुम्हारे होंठों पर उभरी मुस्कान ने,
पूरी कायनात का रंग हरा कर दिया था,
मुझे पता है, इसे गुलाबी होना चाहिए था,
लेकिन तुम्हे गुलाबी रंग पसंद नहीं हैं ना,
मेरी आँखें भी अब तुम्हारी आँखों से ही रंगों को देखती थीं।

आज कई सालों के बाद जब फिर याद करता हूँ वो दिन,
तो फिर हर तरफ हरियाली बिखर गयी है।

और मैं यादों के समंदर में गोते लगा रहा हूँ,
कितना आसान था उस दिन मुठ्ठियों में बंद हो जाना,
लेकिन प्रेम की राह इतनी आसान कहाँ थी,
अभी तो झेलने थे वीहडों की शुष्क हवाएं,
परम्पराओं के किस्से,
रुढियों की जंजीरें,
सपनों के अंदर बने कितने सपनों से लड़ना था,
यह तो हम जान भी ना पाये थे,
और प्रेम फड़फड़ाकर फटने लगा था,
कितने टांके, कितने पैबंद हमने लगाये थे,
और सच कहूँ तो तुमने,
हमेशा एक सुई लेकर बैठ जाती फटे हुए प्रेम को टाँकने,
और आंसूं की नदी में ज्वार आ जाता था,
समाज का समुद्र तब भी सूखा ही रहता था,
और हमारा प्रेम उस रेतीले समुद्र में फड़फड़ाता, लड़खड़ाता किसी तरह खड़ा रहा।

आज फिर मेरे हाथों में तुम्हारा हाथ है,
शादी के जोड़े में तुम मुस्कुराते हुए मुझे देखती हो,
और मेरी मुठ्ठियाँ तुम्हारे पंजे को होल से दबा देती हैं,
पूरा समाज आज भी खड़ा है,
रंग बिरंगे कपड़ों में, रौशनी में नहाया हुआ,
उसका हाथ आज भी उठा है,
लेकिन भंगिमाएं बदल गयी हैं,
न जाने कैसे रेत का वह समुद्र लहरा रहा है,
मीठे जल से भरा हुआ,
और बस यही सोच पाता हूँ कि,
किसी न किसी को तो सिलना ही पड़ता है पैबंद,
नहीं तो रेत में भी हरियाली कहाँ से ज़िंदा रहती?

- नीरज 

17 अक्टूबर 2015

बिक गए हो तुम

तुम्हारे हाथ में जो है,
वह किसी के हाथ में नहीं,
तुम सिर्फ रच ही नहीं सकते,
बना सकते हो एक पूरा समाज,
लेकिन अफ़सोस तुम्हारे हाथों में खून लगा है,
अपना ही खून, उन मासूमों का खून ,
जिनको तुमने अपनी कलम से रौंद डाला है ,
सच कहूँ तो अब तुम्हारी कोई हैसियत ही नहीं बची ,
अपने आपको तुमने उस बाजार में नीलाम कर दिया है,
जहाँ अब तुम्हारी बोली भी नहीं लगती।

अब तो गिद्ध नहीं दिखते,
लेकिन जानते हो तुम एक पूरी गिद्धों की टोली बना रहे हो,
आकाश को आज एक बार फिर ध्यान से देखना ,
दिन के पूरे उजाले में,
मुझे पता है, अरसे हो गए तुम्हे इस नीले आसमान को देखे हुए,
तुमने जब भी देखा सिर्फ काले आसमान को देखा ,
वह भी अमावस वाली
और उल्लुओं की आवाज़ों को समझ बैठे इंसान की आवाज़,
दोष तुम्हारा नहीं है, यहतो तुम्हारा पेशा है,
तुमने उसी का खाया है,
अपने खयाली पुलाओं में,
झूठ की चाशनी तो हमेशा ही घोलते रहे हो,
आज जहर घोल रहे हो, दोष तुम्हारा नहीं है,
मुझे पता है, एक रात अमावस की काली रौशनी में लिखते हुए,
चुभ गयी थी कलम की निब,
तुम बिलबिला उठे थे,
दुसरे दिन हर अखबार की सुर्ख़ियों पर लटका था इंसान,
चमगादड़ की तरह उल्टा,
क्यूंकि तुमने सिर्फ रात ही देखी थी,
और चमगादड़ों को इंसान समझकर,
काले खून की स्याही से कागज़ों को भर दिया था,
लेकिन अब ऐसा नहीं होता,
जानते हो क्यों?

क्यूंकि लोग तुम्हे पहचान गए हैं,
और तुम्हारे लिखे कागज़ अब रद्दी के भाव भी नहीं बिकते,
फिर भी तुम जाने किस गफलत में हो,
अगर निकल सकते हो तो निकल जाओ,
इतिहास का डंका पीटने से अब कुछ नहीं होने वाला,
क्यूंकि इतिहास सिर्फ तुम्हारी जागीर नहीं है।

और हाँ दिन के उजाले में ठीक से चलना,
चीलें तुम्हे अब भी खोज रही हैं,
और चमगादड़ों के काले खून वाली स्याही अब भी गीली है,
तुम तो रात के भी नहीं रहे।

- नीरज

25 मई 2015

एक अदद सी कहानी

भी कभी जी करता है कि मैं भी एक कहानी लिख ही मारूं, कविता लिखते लिखते अब जी उकताने लगा है। अब तो कहानियों को खरीदार भी मिलने लगे हैं (किरदार भले ना मिलें), क्या पता  किसी को पसंद आ जाये, या फिर हमारी कहानी इतनी फाडू हो कि जैसे बाज झपट्टा मारकर अपने शिकार को ले उड़ता है वैसा ही कुछ यहाँ भी हों और हमारी कहानी की किताब की प्रतियां पालक झपकते ही बिक जाएं।  हाय हाय हाय, क्या मस्त खयाली पुलाव है, पका बेटा पका, अच्छा देख लेना कि पुलाव में गाजर, मटर, प्याज सब ठीक ठाक पड़े हों, नहीं तो कोई नहीं खायेगा और तेरा यह खयाली पुलाव ख्यालों में ही दम तोड़ देगा।
उफ़ , बस यही नहीं भाता हमें, इतने मस्त सपने में भी किचन कहीं ना कहीं से शामिल हो जाता है, साला ऐसा लगता है कि जिस दिन हम पैदा हुए थे, मम्मी उस दिन भी किचन में कुछ चटपटा और स्वादिष्ट खाना पका रही थीं, और ये उस खाने का ही असर है, जो हमारे नथुनों के रास्ते दिमाग में चढ़ गया, और हाँ, इतना चढ़ा कि हमें हॉस्पिटल जाना भी गवारा नहीं हुआ, घर ही में टपक पड़े।  खैर यह बहस थोड़ा हम परे रख देते हैं इस समय, इस पर फिर कभी बात करेंगे, अभी बात हो रही थी हमारी कहानी की, और कहानी ही क्यों उसके संग्रह के छपवाने की भी बात, लेकिन हम आदमी जरा हट के हैं, कहानी कैसे लिखेंगे और अगर लिखेंगे भी तो हट के वाली, समस्या बस केवल इतनी हो जाती है कि कहानी में बहुत कुछ लिखना पड़ता है, एक छोटी सी बात को भी बताने के लिए बड़ी सी भूमिका बांधनी पड़ती है और बस वहीँ हमारे प्रसंग का सत्यानाश हो जाता है, कविता में कहीं भी कोई बनावटीपन नहीं होता, जो भी कहना हो लिखना हो, सीधे सपाट शब्दों में कह डालो, कहीं से भी किसी तरह की कोई भूमिका लिखने की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन मुझे अब यकीन हो गया है कि दुनिया बनावटी को ही ऊपर उठाती है, अच्छा चलो आप ही बताओ, कवियों को कितने लोग जानते हैं, लेकिन लेखकों को ? तो कुल मिलाकर कहानी यह है कि भाई अब हमें लिखनी है "एक अदद सी कहानी", बस समस्या यह है कि वह मिल ही नहीं रही, खोजने को तो हम खोज लेंगे, थोड़ा समय लग रहा है जरूर , लेकिन अगर भगवान ने उसे हमसे लिखवाने के लिए योजना बना ली है तो कहाँ जाएगी वो, और वैसे भगवान भी क्या करेंगे जब हमने खुद ही ठान लिया है , तो कहानी जी, आप जहां कहीं भी अपनी कॉफ़ी की चुस्की ले रही हों ,सब कुछ छोड़ छाड़ के हमारे पास चले आइये, बहुत ही व्यग्र और व्याकुल हैं हम आपको लिखने के लिए।

पता नहीं नींद में किससे बातें कर रहा था इतनी सारी एक कहानी लिखने की जब झटके से ट्रेन के रुक जाने से नींद खुल गयी, और खिड़की के उस पार सूर्य अपने पूरे उफान पर दौड़ रहा था, धूप की इस मार से चिड़ियाँ भी पेड़ों को छोड़कर नहीं निकल पा रहीं थी, लेकिन खेतों में किसान पूरे मन से लगा हुआ था, हर खेत में कटाई चल रही थी, धुप के तेज़ होने के बावजूद भी उनका काम बंद नहीं हुआ था, और मेरे मष्तिष्क में सपने की वो बात घूम गयी कि कहानी मैं तुम्हे ढूंढ ही लूँगा, तुम भले कहीं भी बैठी ले रही हो अपनी कॉफ़ी की चुस्की, लेकिन असल कहानी तो मेरे आस पास बिखरी हुई थी और उसके पास एयर कंडीशन की  ठंढी हवा में बैठकर कॉफ़ी पीने का न तो समय है और न पैसे, वह तो बस बनाता है, भोगने वाला तो कोई और है।  ट्रेन चल चुकी थी और खेत ओझल होने लगे थे, शहरों ने अपना सुरसा मुह खोल दिया था।

- नीरज


22 मई 2015

दिल्ली मैं फिर लौटूंगा

रात के १२ बजे  जब स्टेशन पहुंचा, तो खचाखच भरा हुआ था, २४ घंटे की थका देने वाली यात्रा के बाद मैं अब यह सोच रहा था कि इस भीड़ को पार कर स्टेशन से बाहर निकल पाउँगा कि नहीं? अपने ऊपर खीझ रहा था "इसीलिए कभी त्योहारों के समय बाहर नहीं निकलना चाहिए, लो अब भुगतो , अरे भुगतने को तो हम भुगत बाद में भी लेंगे, प्रश्न यह है कि अभी बाहर कैसे निकलेंगे? अरे प्रश्न गया भांड में, तुम चले ही क्यों इस समय , अगर एक दो दिन बाद आ जाते तो क्या कुछ बिगड़ जाता?"
"नीरज चुप कर, बाहर निकलने के लिए जगह बना पहले, फ़ालतू की बक झक बाद में कर लेना, यह तो खुद के ही साथ ही करनी है न?":
"हाँ वो तो है, लेकिन इस भीड़ में बाहर निकलेंगे कैसे? अगर सरसो गिरा दिया जाय ऊपर से तो अक्को नीचे नहीं गिरने वाला, जाने कहाँ से यह जन सैलाब उमड़ पड़ता है छुट्टियों का सीजन आते ही?"
अपने आप से मन ही मन लड़ता मैं किसी तरह पुरानी दिल्ली स्टेशन से बाहर निकला धक्का मुक्की करते हुए, दिल्ली मैं कोई पहली बार नहीं आया था, लेकिन इस बार का बाकी हर दफे से अलग था, सब कुछ छोड़ के, लुट पिट के मैं आया था दिल्ली, एक नयी ज़िन्दगी की शुरुआत करने, कुछ नया करने, अपने ज़िन्दगी के पन्नों को एक नयी स्याही से रंगने के इर्रादे से आया था।

५ नवंबर, २०१० , यहीं से शुरू होती है मेरी दिल्ली की कहानी, एक ऐसी कहानी जो अगर सच कहूँ तो एक तिलिस्म जैसी लगती है अब, दिल्ली एक एकलौता ऐसा शहर है मेरी ज़िन्दगी में जहाँ मैंने कोई दुःख नहीं देखे, रोया हूँ, लेकिन ख़ुशी के आंसूं और हंसा तो हमेशा ही मन भर के इस शहर में, दिल्ली अब ऐसी लगती है, जैसे मेरे शरीर का एक हिस्सा हो गयी हो, जैसे किसी ने गोदने की तरह गोद दिया हो दिल्ली को मुझमे और अब वह मुझमे हर जगह दिखती है, मेरे साथ हंसती है, रोती है, खाती है, घूमती है  और न जाने क्या क्या , मेरे सांसों के साथ दिल्ली जब साँस लेती है , तो दिल की धड़कनों के साथ धमनियों में धकेले जाते हुए खून के कतरे भी एक बार चुपके से दिल्ली को गले लगा लेता है और मैं बदहवास सा खुद को आईने में देखता हुआ केवल इतना ही कह पाता हूँ "फिर लौटूंगा मैं, फिर लौटूंगा। "

हाँ, दिल्ली प्रवास अब खत्म होने को है और मैं यहाँ बैठा बस यही सोच रहा हूँ कि "अरे इतनी जल्दी कैसे, अभी कल ही की तो बात है, जब उस भीड़ को चीरते हुए जैसे तैसे हम स्ट्रीट लाइट की उस रौशनी वाली दिल्ली में पहुंचे थे , जैसे हमने उसको कभी नहीं देखा था। "
स्टेशन से बहार जब निकला तो यकायक लगा की अरे कहाँ आ गए हम, यह दिल्ली ही है ना? और दिल्ली ने हौले से हमारे(दिल्ली आने से पहले हम "मैं" की जगह "हम" का ही प्रयोग होता था) कानों में कहा था कि हाँ मैं ही हूँ दिल्ली, हम तो अकबका के इधर उधर देखने लगे थे, किसी को न पाकर ऑटो लेने  बढ़ गए, लेकिन "दिल्ली" - दिल्ली ने उस दिन से ही हमें अपना लिया, हम से मैं पर कब आ गया पता ही नहीं चला। दिल्ली आपको अपना बना लेती है, आप इसे अपना बनाये या न बनाएं, यही दिल्ली की खासियत है और देखते देखते कब चार साल बीत गए पता ही चला, बस कुछ दिन और फिर दिल्ली को रोज़ याद करूँगा और उसकी यादों का तकिया रोज़ मेरी बाहों में सांसें भरेगा।  लेकिन यह भी एक सच है कि मैं अपने अंतर्मन में बसी उस दिल्ली से हर बार रोज़ यही कहूँगा कि "मैं फिर लौटूंगा, मैं फिर लौटूंगा।"

- नीरज 

19 मई 2015

तेरे समक्ष


हाल ही में इंदु जी के प्रथम काव्य संग्रह "तेरे समक्ष" का लोकार्पण हिंदी के प्रख्यात आलोचक और कवि नामवर सिंह जी ने किया। तेरे समक्ष के लोकार्पण समारोह में  चाहकर भी नहीं जा पाया जिसका दुःख हमेशा रहेगा, लेकिन किताब को अपने से ज्यादा दिन दूर नहीं रख पाया और इंदु जी से ही उनके प्रथम काव्य संग्रह की एक हस्ताक्षरित कॉपी प्राप्त हुई, जिसके लिए मैं उनका हमेशा एहसानमंद रहूँगा।

हाल फिलहाल प्रकाशित कई काव्य संग्रह को पढ़ने के पश्चात "तेरे समक्ष" को पढ़ना गर्मी में ठंडी का एहसास दिलाने जैसी भावना पैदा करता है।  मदन कश्यप जी के शब्दों का अगर सहारा लूँ तो कवयित्री ने पुस्तक के शीर्षक को भी बड़ा ही रोचक और भाषायी बनाया है, जैसे तेरे समक्ष, न तो तुम्हारे सामने , न तुम्हारे साथ अपितु समक्ष, एक नयापन , एक अनूठा प्रयोग। पुस्तक को खोलते ही उनकी उस कविता पर नजर पड़ी जिससे अगर सच कहूँ तो मैंने उनकी पहचान से 
ही जोड़ दिया था , उनकी इस कविता को मैंने तब पढ़ा था , जब उनसे पहली मुलाकात हुई थी, उनके बारे में नेट पर खोजते हुए जब उनके ब्लॉग पर गया तो सबसे पहले इसी कविता ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया, और सबसे अद्भुत यह कि नामवर सिंह जी ने भी लोकार्पण के वक़्त इसी कविता को चुना, वैसे कहते हैं कि कविता एक कवि का परिचय होती है, जिससे मेरी सहमति कभी नहीं मिली, और इंदु जी हमेशा ही मेरे इस ख्याल को सत्य साबित कर देती हैं, उनकी कविता और उनका व्यक्तित्व उनके जीवन के दो पहलू हैं, जब वह कविता लिख रही होती हैं तो एक अलग ही दुनिया में होती हैं जहाँ वह रिश्तों का एक नया अर्थ तलाशती हैं, औरत होने के नुस्खे सिखाती हैं, रूढ़ियों को अलग अलग पत्थरों पर कसकर परख रही होती हैं, तो वहीँ छुईमुई ना होकर कैक्टस होना पसंद करती हैं. 

नहीं होना चाहती
मैं पौधा छुईमुई का
कि कोई भी बंद कर दे
मुझे मेरे वजूद में, 

जब भी यह लाइन पढता हूँ तो इंदु जी का खिलखिलाता हुआ चेहरा समक्ष प्रस्तुत हो जाता है, और साथ ही सोच भी कि क्या यह लाइनें इंदु जी ने ही लिखी हैं, "आखिर इतने गहरे उतर कर लिखना आसान तो होता नहीं और न ही आसान होता है वजूद के पिंजरे में बंद हो जाना। " और जैसे ही यह सोच आती है सब कुछ स्वच्छ जल की तरह साफ़ होता चला जाता है, कि वह जो कहती हैं वही जीती भी हैं, उनकी कविता उनके जीवन का एक अलग विम्ब है, जिसका प्रतिविम्ब वह कहीं से भी नहीं हैं। इंदु जी से अगर पहचान की बात करूँ तो मैं उन्हें बहुत दिनों से तो नहीं जानता लेकिन जितने दिनों से भी जानता हूँ, इतना जरूर कहूँगा कि उनकी कविता एक पूरे अलग भूगोल की रचना करती है, जिसका नेतृत्व वह बड़ी ही सहजता से करती हैं।  उनकी कविताओं में क्लिष्ट शब्दों का बाहुल्य न होना भी इसका द्योतक है कि  कविताएं उनके आस पास ही पैदा होती हैं और वह उनमे कुछ ऐसे घुलती हैं कि जब वह यह कहती हैं कि "हो जाना चाहती हूँ/ कैक्टस की तरह/ कि सख्त चुभते/ कैक्टस पर भी/ खिलते हैं कोमल फूल " तो एक पल को यकीन नहीं होता कि कवियत्री ने इन शब्दों को कब खोजा होगा, कब ये शब्द उग आये होंगे उनके जेहन में? इसका उत्तर भी उनकी एक कविता में स्वतः ही मिल जाता है 

"गर्म तंदूर या सुर्ख अंगारों पर
बनाए जाते हैं
स्वादिष्ट टिक्के
औरत की खूबसूरती का
राज़ भी यही
सेंकती है खुद को हर दिन
तपती है जलती है
और हो जाती है सुर्ख
अपनी तपिश में खुद को पकाकर
करती है पेश
समाज को
एक सभ्य सम्पूर्ण औरत
कि सभी को पसंद आती है
ख़ामोश…. सुर्ख….. दमकती औरत !"

इंदु जी की यही खासियत उन्हें आज की तमाम कवियों की जमात से अलग खड़ा कर देती है, जहाँ वह अपना एक अलग संसार बनाती बिगाड़ती रहती हैं। बड़े ही सधे और सपाट शब्दों में वह अपनी बात कह जाती हैं, जो सोचने पर मजबूर तो करती ही है, साथ ही संग्रह के अन्य कविताओं को पढ़ने के लिए उत्साहित भी करती है। कविताओं का एक जखीरा कहूँगा मैं उनके इस संग्रह को, जिसमे उन्होंने एक औरत के जीवन के विभिन्न अंगों को समाहित करने का सफल प्रयास किया है।  केदार नाथ सिंह उनकी कविता "क्या लिखूं" की सादगी पर जहाँ मुग्ध होते हैं, वहीं मदन कश्यप जी भी उनके सपाट संवाद को आज की कविता में एक नया प्रयोग कहते हैं।  दूरदर्शन पर गत रविवार को नामवर सिंह जी और मदन कशयप जी ने "तेरे समक्ष" पर विस्तृत चर्चा की। कुल मिलाकर "तेरे समक्ष"  आज के समय में कविता का एक नया रूप प्रस्तुत तो करती ही है, साथ ही साथ आज की औरत और उसको लेकर चलने वाली चर्चाओं पर एक नए तरीके से सोचने पर विवश भी करती है.

- नीरज