ज़िन्दगी की इस जटिल खोज में हम इतने लीन होते हैं कि हमें अपने आस पास कुछ भी नहीं दीखता, सूरज सुबह के कितने बजे चढ़ा था आसमान पर सीढ़ी लगाकर, कितने बजे भूखा प्यासा थक कर, शावर लेने के लिए समुद्र में उतर गया। भोर होते ही चिड़ियों के झुण्ड का एक साथ उड़ना देखे कितने दिन हो गए हैं, हम में से कितनों को तो अब यह याद भी नहीं होगा, गन्ने को चूसते हुए भैंसे के पीछे दौड़ पड़ना और गिरना, उठना और फिर दौड़ना और जब तक भैंसा भागे दौड़ते रहना, लेकिन वही जब घूमके हमें दौड़ा दे, तो सर और पैर दोनों बराबर होकर एक साथ दौड़ने लग जाते, साँसे बाहर आकर धौंकनी बन जाती थी और मुह लट्टू बनकर चकरघिन्नी जैसा नाचने लगता था, और सब कुछ हो जाने के बाद पुल्हिया पर बैठकर बतकही और डूबते हुए सूरज को देखते हुए कहानियां बनाना, फिर मोर, भालू, शेर सबकी कहानियां सुनाना, कितने किस्से फेंके जाते थे, यह तो नहीं पता लेकिन रात को छत पर लेटते ही तारों से भरी एक छत लोरी गाकर सुना देती थी। अब तो तारों से भरी छत के भी लाले पड़ गए हैं।
अनेको ख्याल, अनेको सपने शहर के साथ साथ बदलने लगते हैं अपनी जगह, ठीक वैसे ही जैसे मन अभी भी वहीँ कहीं उस मनी प्लांट में अटका पड़ा है जिसे छोड़ आये थे पुराने शहर, क्या वह अब भी वैसे ही होगा? सूखा नहीं होगा न? लोग पानी दते होंगे? कितना अच्छा लगता था न? और न जाने क्या क्या, शहर बदलते हैं, लेकिन हम नहीं और ज़िन्दगी एडजस्ट करने में लग जाती है, उस पुरानी वाइन के बोतल की तरह जो १०० सालों से पड़े पड़े उक्ता गयी थी, लेकिन फ्रिज में घुसते ही ठंढाने के प्रयास में लग जाती है और फिर सारी उथल पुथल कुछ समय के लिए बंद होकर सुस्ताने लग जाता है। क्या पता नींद के साथ भी कुछ ऐसा ही हो।
- नीरज




