21 अक्टूबर 2015

पैबंद

             

तुम्हारे हाथों में मेरा हाथ ऐसे कांप रहा था,
जैसे करंट के हज़ारों झटके एक साथ लगे हों,
पसीने से लबरेज़ मेरे चेहरे पे उगी दो आँखों में,
कुछ सपने थे, तुम्हारे, मेरे.... हमारे,
और तुमने मेरे हाथों को होले से दबा दिया था,
और बंद कर ली थी अपनी हथेलियों में,
मेरे कंपकंपाते पंजे को,
और तुम्हारे होंठों पर उभरी मुस्कान ने,
पूरी कायनात का रंग हरा कर दिया था,
मुझे पता है, इसे गुलाबी होना चाहिए था,
लेकिन तुम्हे गुलाबी रंग पसंद नहीं हैं ना,
मेरी आँखें भी अब तुम्हारी आँखों से ही रंगों को देखती थीं।

आज कई सालों के बाद जब फिर याद करता हूँ वो दिन,
तो फिर हर तरफ हरियाली बिखर गयी है।

और मैं यादों के समंदर में गोते लगा रहा हूँ,
कितना आसान था उस दिन मुठ्ठियों में बंद हो जाना,
लेकिन प्रेम की राह इतनी आसान कहाँ थी,
अभी तो झेलने थे वीहडों की शुष्क हवाएं,
परम्पराओं के किस्से,
रुढियों की जंजीरें,
सपनों के अंदर बने कितने सपनों से लड़ना था,
यह तो हम जान भी ना पाये थे,
और प्रेम फड़फड़ाकर फटने लगा था,
कितने टांके, कितने पैबंद हमने लगाये थे,
और सच कहूँ तो तुमने,
हमेशा एक सुई लेकर बैठ जाती फटे हुए प्रेम को टाँकने,
और आंसूं की नदी में ज्वार आ जाता था,
समाज का समुद्र तब भी सूखा ही रहता था,
और हमारा प्रेम उस रेतीले समुद्र में फड़फड़ाता, लड़खड़ाता किसी तरह खड़ा रहा।

आज फिर मेरे हाथों में तुम्हारा हाथ है,
शादी के जोड़े में तुम मुस्कुराते हुए मुझे देखती हो,
और मेरी मुठ्ठियाँ तुम्हारे पंजे को होल से दबा देती हैं,
पूरा समाज आज भी खड़ा है,
रंग बिरंगे कपड़ों में, रौशनी में नहाया हुआ,
उसका हाथ आज भी उठा है,
लेकिन भंगिमाएं बदल गयी हैं,
न जाने कैसे रेत का वह समुद्र लहरा रहा है,
मीठे जल से भरा हुआ,
और बस यही सोच पाता हूँ कि,
किसी न किसी को तो सिलना ही पड़ता है पैबंद,
नहीं तो रेत में भी हरियाली कहाँ से ज़िंदा रहती?

- नीरज 

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