17 अक्टूबर 2015

बिक गए हो तुम

तुम्हारे हाथ में जो है,
वह किसी के हाथ में नहीं,
तुम सिर्फ रच ही नहीं सकते,
बना सकते हो एक पूरा समाज,
लेकिन अफ़सोस तुम्हारे हाथों में खून लगा है,
अपना ही खून, उन मासूमों का खून ,
जिनको तुमने अपनी कलम से रौंद डाला है ,
सच कहूँ तो अब तुम्हारी कोई हैसियत ही नहीं बची ,
अपने आपको तुमने उस बाजार में नीलाम कर दिया है,
जहाँ अब तुम्हारी बोली भी नहीं लगती।

अब तो गिद्ध नहीं दिखते,
लेकिन जानते हो तुम एक पूरी गिद्धों की टोली बना रहे हो,
आकाश को आज एक बार फिर ध्यान से देखना ,
दिन के पूरे उजाले में,
मुझे पता है, अरसे हो गए तुम्हे इस नीले आसमान को देखे हुए,
तुमने जब भी देखा सिर्फ काले आसमान को देखा ,
वह भी अमावस वाली
और उल्लुओं की आवाज़ों को समझ बैठे इंसान की आवाज़,
दोष तुम्हारा नहीं है, यहतो तुम्हारा पेशा है,
तुमने उसी का खाया है,
अपने खयाली पुलाओं में,
झूठ की चाशनी तो हमेशा ही घोलते रहे हो,
आज जहर घोल रहे हो, दोष तुम्हारा नहीं है,
मुझे पता है, एक रात अमावस की काली रौशनी में लिखते हुए,
चुभ गयी थी कलम की निब,
तुम बिलबिला उठे थे,
दुसरे दिन हर अखबार की सुर्ख़ियों पर लटका था इंसान,
चमगादड़ की तरह उल्टा,
क्यूंकि तुमने सिर्फ रात ही देखी थी,
और चमगादड़ों को इंसान समझकर,
काले खून की स्याही से कागज़ों को भर दिया था,
लेकिन अब ऐसा नहीं होता,
जानते हो क्यों?

क्यूंकि लोग तुम्हे पहचान गए हैं,
और तुम्हारे लिखे कागज़ अब रद्दी के भाव भी नहीं बिकते,
फिर भी तुम जाने किस गफलत में हो,
अगर निकल सकते हो तो निकल जाओ,
इतिहास का डंका पीटने से अब कुछ नहीं होने वाला,
क्यूंकि इतिहास सिर्फ तुम्हारी जागीर नहीं है।

और हाँ दिन के उजाले में ठीक से चलना,
चीलें तुम्हे अब भी खोज रही हैं,
और चमगादड़ों के काले खून वाली स्याही अब भी गीली है,
तुम तो रात के भी नहीं रहे।

- नीरज

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