21 अक्टूबर 2015

कहानियां


कहानियों पर विश्वास है?
उसने पूछा था मेरी तरफ देखते हुए,
और फिर आगे बढ़ गया,
मैं सोच रहा था,
बचपन से लेकर आज तक कहानियाँ ही तो पढ़ी हैं,
कभी राम की, कभी सीता की,
रहीम की, यीशु की, परियों की, एंजेल्स की, सिंदबाद की,
अलिफ लैला की,
और उन कहानियों में हम इतने लीन होते थे कि,
हमारे खेल भी वैसे ही हुआ करते थे,
शमशीर-ए-सुलेमानी कोई भी खपच्ची बन जाया करती थी,
और झाड़ू की सींक मुड़कर धनुष,
सफ़ेद चदार ओढ़कर यीशु बन जाते थे,
तो उसी सफ़ेद चद्दर को लटकाकर पेड़ के नीचे बैठ कर गुरु नानक,
शोएब कभी राम बन जाता तो सोफ़िया सीता,
मुझे तो सिंदबाद बनने में बड़ा मजा आता था,
औए सोफ़िया मेरी बेगम झट से बन जाती थी,
रेखा को कुछ भी बना दो, उसे कोई गुरेज नहीं था,
और धर्मेन्द्र ?
वह तो रावण और असुर ही बनता था,
शैतान भी वही बनता था,
जाने उसे क्या मजा आता था?
और हँसते हुए कहता था,
शैतान जब मरता है तो यही सोचता हूँ,
कि वह राम और सिंदबाद भी हो सकता था,
अगर होता तो मरता क्यों?
और हम सब ठठा कर हंस देते थे,
और बोलते थे,
बुद्धू, चल अभी रावण बन जा,
राम की लड़ाई शुरू हो गयी है,
और वह झट से बैट उठा के मुद्रा में आ जाता था।

ठठाकर हंस रहा था मैं उन सबको याद करके,
और उसको जोर से चिल्लाकर बोला था,
"हाँ, है न कहानियों पर विश्वास, तुम कौन सी कहानी सुनाओगे?"
और उसने घूम कर कहा था,
"नहीं कोई कहानी नहीं सुनाऊंगा, मैंने पूछा था कि क्या उन कहानियों में मज़हब भी था?"
और वह चलता चला गया,
उसके शब्द गूंजते रहे, एक प्रश्न मैंने भी लगा दिया उसके वाक़्य में,
और बुदबुदाता हुआ बोल पड़ा,
"हाँ जाति पात भी नहीं थी। "

हंसी काफूर हो चुकी थी,
क्या आप हंस रहे हैं?

- नीरज

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