25 अक्टूबर 2015

ठप्पा



मुझे नहीं पता, तुम्हारा नाम, पता,
क्या करते हो,
कहाँ रहते हो,
लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं,
कि तुम मुझे रोक लोगे,
रोक लोगे मेरी पारखी निगाहों को,
जो तुमको किसी भी तरह, चाहे जैसे,
खोज कर लगा देगी तुम पर एक ठप्पा,
ऐसा ठप्पा जो मेरे अनुकूल हो।

क्या हुआ जो मैं तुमसे मिला नहीं,
क्या हुआ अगर हमने कभी,
एक दूसरे को देखकर हंसा नहीं,
 क्या हुआ अगर हमने कभी कोशिश भी न की हो,
एक दूसरे को समझने की,
जरुरत भी क्या है भाई ?
सदियों से यही तो होता आ रहा है,
अपने अनुकूल, अपने हिसाब से,
उन सबको बदल देने की,
जो आपके मिज़ाज के नहीं हैं,
और जिन्हे बदल सकते हो आप,
क्यूंकि उनका प्रतिरोध आपके कानों पर हरकत भी पैदा नहीं करता,
और जो हरकत भी नहीं कर सकता,
उसे अपने मंसूबों में पिरोना,
कितना आसान होता है न ?
कुछ दबी जुबानें बगाहे अगर सुनाई भी देती हैं,
तो क्या?
पढ़े लिखों की दुनिया में,
उन्हें दंगाई करार देने मे,
भला वक़्त ही कितना लगता है ?
तो आप जो भी हैं,
इस मुगालते में न रहे,
कि मैंने आपको रंगा नहीं है,
अरे हुज़ूर, यह तो हमारी आदत है,
हम भला आदत से कहीं बाज़ आते हैं?


- नीरज 

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