29 नवंबर 2012
22 नवंबर 2012
21 नवंबर 2012
कसाब.....
अल सुबह एक खबर ने अनेकों भारतियों को राहत दे दी,
चला गया वह, अब दोजख में गया या जन्नत ये नहीं जानता हूँ,
और सच पूछिए तो न ही जानने की ऐसी कोई इच्छा शेष है,
कहीं ख़ुशी है तो कहीं दुःख भी, ख़ुशी इस बात की है कि चलो,
अब दिल पर सांप नहीं लोटेंगे और न ही होंगी गहमागहमी बहसों की,
बस इस एक खबर ने पिछले चार सालों से चली आ रही बहस को अचानक ही एक विराम दे दिया।
लेकिन वास्तविकता में क्या ये बहस बंद हो गयी है?
क्या इस एक कसाब के मर जाने से या लटक जाने से और कसाब पैदा न होंगे?
क्या कसाब सचमुच मर गया है? या फिर कहीं न कहीं हमारे दिलों में आज भी ज़िन्दा है?
शाम ढलते सूरज को देखते समय बार बार कसाब ज़िन्दा था मेरे ख्यालों में,
मरने के बाद उसे दफनाना भी हमें ही है, क्यूंकि उसके देश ने उसके शव को लेने से मना कर दिया है,
क्या विडम्बना है? या सच पूछिए मेरा प्रश्न आज यह है कि क्या यही जिहाद है?
क्या वाकई कसाब खुदा के पास पहुँच चुका है, और जन्नत की अप्सराओं के साथ चाय की चुस्कियां ले रहा है?
क्या उसके आकाओं में से कोई भी यह बात सरेआम कबूल कर सकता है?
अगर हाँ तो आज से मैं भी एक जिहादी हूँ।
(दो)
पाकिस्तान के पंजाब के फरीदकोट की दो बूढी आँखों में आज आंसूं थे,
जो गिरना तो चाहते थे, लेकिन न जाने आँखों से निकलकर आँखों में ही कहीं विलीन हो जाते थे,
धडकनें चल रही है और लब्जों में कुछ दुआएं, जिन्हें होठों से निकलने की आज़ादी पर खुदा के पहरे हैं,
लेकिन फरकते होठों और आँखों की तंगी सब कुछ कहे देती है,
अभी कुछ बरस ही तो बीतें हैं, जब ईद के दिन छोटे ने नए कपड़ों की ज़िद की थी,
घर के पैबन्दों में सीलन थी और जेबों में निठल्ले सिक्के भी न छनछनाते थे,
और छोटे की जिद कभी पूरी ही न हो सकी।
जब एक दिन छोटे ने नमाज़ अता की और कहा जा रहा हूँ खुदा के पास,
उसके बताये रास्ते की पैरवी करने, भला कौन बाप करता मना,
कुछ पैसे भी दिए उसने और कहा कि अगर मेरी गैरमौजूदगी में कभी जरुरत पड़े तो अल्लाह के बन्दों को याद करना,
कभी कमी न होगी, ये जिहाद है, जहाँ में सिर्फ अमन होगा,
फिर कई लाशों के ऊपर चलते हुए अख़बारों में छपी तसवीरें जब आयीं, तो अल्लाह का कोई भी बन्दा न आया,
घर में फिर से वही सीलन थी, जेबों का निठल्लापन और पेट में भूख,
लेकिन अमन ने साथ छोड़ दिया था, अब तो हूक सी उठती थी सीने में हर वक़्त,
पहले मुफलिसी में भी शांति थी, लेकिन अब मुफलिसी तो थी ही,
मजलिसों में भी कहीं उसका नाम न था, दुआओं में ही केवल था वह,
लेकिन होठों पर वह अंजान था, घर से उसकी पहचान तक गायब कर दी गयी थी,
और आज तो वही गायब हो गया, जिहादी था अल्लाह के पास गया होगा,
लेकिन मयस्सर न हुई इत्मिनान से छै गज़ ज़मीन भी,
और सर्द सी बूदें आँखों से गिरकर खौफ के समंदर में गायब हो गयीं।
-नीरज
20 नवंबर 2012
अंधे...
उसकी कुर्सी के बगल में एक छड़ी थी,
पैरों में जूते साफ स्वच्छ थे, आँखों का चस्मा जॉन अब्राहम जैसा था,
और हाथ ब्रेल की बूंदों पर टपटपा रहे थे, सारे उत्तर तो उसकी जुबान पर थे,
सब बस उसे ही देख रहे थे और वह शून्य में, लेकिन कोई देख न सका उसका देखना,
फिर जब वह उठा, तो चारो तरफ सन्नाटा था, वह गोल गोल कुछ देर घूमता रहा,
फिर अपनी छड़ी की आँखों से देखता हुआ सीढियों के रास्ते गुम हो गया,
और सारे अंधे बस उसे देखते ही रहे।
- नीरज
पैरों में जूते साफ स्वच्छ थे, आँखों का चस्मा जॉन अब्राहम जैसा था,
और हाथ ब्रेल की बूंदों पर टपटपा रहे थे, सारे उत्तर तो उसकी जुबान पर थे,
सब बस उसे ही देख रहे थे और वह शून्य में, लेकिन कोई देख न सका उसका देखना,
फिर जब वह उठा, तो चारो तरफ सन्नाटा था, वह गोल गोल कुछ देर घूमता रहा,
फिर अपनी छड़ी की आँखों से देखता हुआ सीढियों के रास्ते गुम हो गया,
और सारे अंधे बस उसे देखते ही रहे।
- नीरज
17 जून 2012
मेरी चिता
तुम्हारे शब्द आज भी वैसे ही हैं,
जैसे अभी अभी मेरे कानों में घोल दिए गए हों,
तुम कभी गए ही नहीं मुझसे दूर,
किसी न किसी बहाने हमेशा ही मेरे पास रहे,
अगर कोई कहता है कि तुम चले गए,
वो तो वो सबसे बड़ा सच्चा झूठा है,
जिसने अफवाह फैलाई है तुम्हारे जाने की,
मुझसे दूर, इतना दूर जहाँ मेरी सोच भी नहीं जा सकती,
तुम्हारी चिता में आग देने मैं नहीं आया,
और दे भी नहीं सकता था, भैया के होते हुए,
और तुम मिल गए पंचतत्व में,
विलीन हो गए इस हवा में रख बन कर,
मैं जाकर महसूस भी नहीं कर पाया तुम्हारे जाने के एहसास को.
लेकिन सच तो यही है कि तुम कभी गए ही नहीं,
गया मैं और तुम कभी नहीं आये मेरी चिता को अग्नि देने,
आज भी वहीँ बैठा हूँ तुम्हारे स्नेहिल एहसास को ,
जो एक बाप के अलावा इस दुनिया में कोई और नहीं दे सकता.
-नीरज
(अपने एक मित्र के भावों को कविता का रूप में ढाला है, वैसे अपने पिता के स्नेहिल और गर्म हाथों के बिना जीवन कि सोच मिथ्या ही लगती है.)
जैसे अभी अभी मेरे कानों में घोल दिए गए हों,
तुम कभी गए ही नहीं मुझसे दूर,
किसी न किसी बहाने हमेशा ही मेरे पास रहे,
अगर कोई कहता है कि तुम चले गए,
वो तो वो सबसे बड़ा सच्चा झूठा है,
जिसने अफवाह फैलाई है तुम्हारे जाने की,
मुझसे दूर, इतना दूर जहाँ मेरी सोच भी नहीं जा सकती,
तुम्हारी चिता में आग देने मैं नहीं आया,
और दे भी नहीं सकता था, भैया के होते हुए,
और तुम मिल गए पंचतत्व में,
विलीन हो गए इस हवा में रख बन कर,
मैं जाकर महसूस भी नहीं कर पाया तुम्हारे जाने के एहसास को.
लेकिन सच तो यही है कि तुम कभी गए ही नहीं,
गया मैं और तुम कभी नहीं आये मेरी चिता को अग्नि देने,
आज भी वहीँ बैठा हूँ तुम्हारे स्नेहिल एहसास को ,
जो एक बाप के अलावा इस दुनिया में कोई और नहीं दे सकता.
-नीरज
(अपने एक मित्र के भावों को कविता का रूप में ढाला है, वैसे अपने पिता के स्नेहिल और गर्म हाथों के बिना जीवन कि सोच मिथ्या ही लगती है.)
21 फ़रवरी 2012
स्मृतियाँ

स्मृतियाँ........एक अबूझ पहेली सी नहीं लगतीं...
जाने कहाँ से कब निकलकर छा जाती हैं मन मानस पर..
और फिर न चाहते हुए भी हम विचर आते हैं उन वादियों में...
जो हम जी चुके होते हैं और दबा देते हैं उन्हें धूल भरी किसी किताब की तरह...
कोने में पड़ी हुई..अनमनी सी लेकिन चुम्बकीय....
स्मृतियाँ अपनी चाय सेंक ही लेतीं हैं आपके विचारों के पतीले पर...
और सब कुछ एक चलचित्र की भांति दौड़ने लगता है....
झकझोरता सा..जैसे पानी का मग किसी ने दे मारा हो चेहरे पर...
और हम अवाक् से सोचते रह जाते हैं कि भला क्यूँ...
जीवन की भागम-भाग भागम-भाग, लेकिन स्मृतियाँ अपनी ही दौड़ लगाती हैं...
आहिस्ता आहिस्ता...और फिर सरपट दौड़ने लगती हैं....
एक पल में सब कुछ बदल जाता है...
आम कि अमिया...अम्मा की लाड़ , बचपन का प्यार...
मार धाड़, छोटी छोटी लड़ाईयाँ और उनमे छुपा बेइंतहा स्नेह...
किसी का होना और फिर अचानक उसका न होना...
सब कुछ एक झीनी सी चादर के उस पर साफ साफ दिखता है....
लेकिन स्मृतियों के सैलाब में बहना इतना आसान भी नहीं होता...
हवा का झोंका बदला और घुमड़ जाती हैं आँधियों की तल्ख़ अँधेरी हवाएं...
और हम बस सोचने के सिवा कुछ नहीं कर पाते....कुछ भी नहीं...
-नीरज
15 जनवरी 2012
पानी ने सांकल लगा दी
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