20 नवंबर 2012

अंधे...

उसकी कुर्सी के बगल में एक छड़ी थी,
पैरों में जूते साफ स्वच्छ थे, आँखों का चस्मा जॉन अब्राहम जैसा था,
और हाथ ब्रेल की बूंदों पर टपटपा  रहे थे, सारे उत्तर तो उसकी जुबान पर थे,
सब बस उसे ही देख रहे थे और वह शून्य में, लेकिन कोई देख न सका उसका देखना,
फिर जब वह उठा, तो चारो तरफ सन्नाटा था, वह गोल गोल कुछ देर घूमता रहा,
फिर अपनी छड़ी की आँखों से देखता हुआ सीढियों के रास्ते गुम हो गया,
और सारे अंधे बस उसे देखते ही रहे।

- नीरज

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