बस चल चुकी थी, घड़ी मे सुई आठ बज के पंद्रह मिनट होने का ऐलान कर चुकी है। ऑफिस के कैंपस से बाहर निकलते ही सड़क का शोर बढ़ गया, अगल बगल बैठे लोगों के हाथों मे मोबाइल फोन चमकने लगा था, कोई चेहरे की किताब पर था तो कोई संदेश भेजने वाले ऐप पर, कोई फोन पर बात कर रहा था, किसी को घर पहुंचने से पहले सब्ज़ी लेनी थी तो किसी को कुछ जरूरत के सामान, घर सबको पहुंचना है, आगे सड़क का ट्रेफिक रुका हुआ था, गाड़ियों की लंबी कतारों के बीच सड़क की चौड़ाई ने अपने घुटने टेक दिए थे। मुझे याद आया कि मेरे मोबाइल का इंटरनेट डाटा खत्म हो चुका है, उफ्फ यह भी एक मुसीबत ही है, किसने क्या लिखा होगा, क्या कहा होगा? व्हाट्सऐप पर कुछ मैसेज़स आए होंगे, कैसे पढूं? फिर कुछ सोचते हुए कहता हूँ, चलो इंतज़ार कर लेंगे आज वह भी, बस एक दिन ही तो है बिलिंग साइकिल के..... डाटा फिर भर जाएगा। मन मानने लगता है, उसे भी मनाने के लिए थोड़ी जगह देनी पड़ती है, जिससे दाएं बाएं करके वह अपने मन की बात कर ले, नहीं तो बेमतलब का शोर मचाता रहेगा, इसी मतलब बेमतलब के बीच ज़िन्दगी घूमती रहती है, लेकिन सोचता हूँ कि हमारा दायरा कितना छोटा हो गया है, देखने मे बड़ा लेकिन सच मे क्या यह है उतना बड़ा? हज़ारों दोस्त, कई सभ्यताएं और उनके अनुभव को बांटते हुए भी हम अकेले ही हैं, और जब वही अपने से पहले की पीढ़ी को देखता हूँ तो जलन होती है, बहुत कुछ ना होते हुए भी वह अकेले नहीं थे।
खैर, इन सारी सोचों को थोड़ा धकेलते हुए बैग से किंडल निकाल लेता हूँ, बम शंकर टन गनेश चमक उठता है और तरियानी छपरा के किस्से, उसका इतिहास, बुजुर्गों की कहानियां, उनकी उम्र, माओवाद के पीछे की राजनीति, अस्पताल बनाने की कवायद, डॉक्टर साहब का झोला और बेकार हो चुके अस्पताल के आगे उनकी टेबल........ किताब रख देता हूँ, और गावों के किस्से कहानियाँ घूमने लगते हैं, गाँव का खंडहर होता घर, बचपन मे खेत जोतने के बाद उसे बराबर करने के लिए लकड़ी के बड़े से टुकड़े के नीचे आ जाना, अम्मा का चिल्लाना, आम के पेड़ों पर लखनी के लखना खेलते हुए, खो खो, कबड्डी, सेकंता (गेंद को जोर से खींच कर मारना) वगैरह वगैरह.... सड़क के शोर के बीच का एकांत अचानक से ही खतम हो जाता है, गाँव के क्षितिज पर सूरज के ठीक उगने से पहले की लालिमा आँखों के सामने चमकने लगती है, सब कुछ हरा भरा हो जाता है, हाथों मे मोबाइल की जगह डंडे और काली सड़कों की जगह सफेद चमकती पगडंडी ले लेती है, सरसो के खेत, अरहर के पौधे, मटर का होरहा, गन्ने की मिठास, गुड़ बनाने से ठीक पहले उतार लिया गया राब और उसका शर्बत.... सब कुछ गड्ड मड्ड होकर सामने आया जाता है, आगे लाल बत्ती है, ट्रेफिक जादा है, और लाइन दूर तक, हमारी बस किसी फ्लाई ओवर के ऊपर खड़ी है, और फ्लाई ओवर के नीचे दोनों तरफ कतार मे खड़े लैंपपोस्ट रोशनी की लालटेन लिए खड़े हैं, दूर तक रोशनी का तांता लगा हुआ है, अंदर का फ़ोटोग्राफ़र कैमरे के लिए कसक उठता है। बस आगे बढ़ती है, टोल है, टोल के आगे लम्बा जाम, और सड़क के दोनों तरफ छोटे छोटे तंबू खींचें रहने वाले कुछ लोग, गंदे, मैले कुचैले बच्चे..... उनके मुह पर लगे खाने के दाग अभी तक नहीं छूटे हैं, शायद उसके स्वाद को लंबे समय तक महसूस करने के लिए, फिर ना जाने कब मिले, मेरे अंदर का फ़ोटोग्राफ़र कसक कर चुप हो जाता है, फोटो के बाहर की दुनिया और उनके दुख फ़ोटोग्राफ़र कहाँ देख पाता है, हाँ कुछ फोटूओं पर लाखों रुपए कमाकर फिर से दुनियावी भीड़ का हिस्सा जरूर बन जाता है। मेरा स्टॉप आने वाला है, बस उन सबको छोड़कर आगे बढ़ चुकी है, तंबुओं की जगह बड़ी बड़ी इमारतों ने ले ली है, रोशनी की चमक अकेली पड़ने लगी है, वह सड़कों पर फैलकर बिखर जाती है, घरों की रोशनी पर्दों मे सिमटकर काली पड़ जाती है। मैं उतर चुका हूं, फोन बजने लगता है, सोचों के बाहर की दुनिया अपना साम्राज्य फैला चुकी है। मुंबई जस की तस रोज़ की तरह एक और रात के जवान होने का इरादा लिए आगे बढ़ने लगती है, मेरे घर का दरवाज़ा खुलने वाला है, आज क्या बनेगा?