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7 जनवरी 2017

डेड लाइन

घर के बाहर पहाडों पर सूरज चमकने लगा था, कबूतर अपनी उड़ान वाली गस्त पर जा चुके थे, बाहर सड़कों पर चिल्ल पों बढ़ गयी थी और काले टायर जलने लगे थे। वहीं पास का समुद्र लहराकर रोशनी को अपनी गिरफ्त में बांधने की तैयारी कर चुका है, उसे पता है लहरें चमक कर सफेद हो जाएंगी और रोशनी उनके भीतर की काली परत पर अपने छाप छोड़ती हुई शाम तक डेरा जमा के रखेगी, पास की इमारतें अपने अक्स को पानी मे खोजने की असफल कोशिश मे लग चुकी हैं और शहर अपनी यात्रा पर निकल चुका है। यह शहर अवसाद का शहर है, सपनों को खुद मे भर कर जीने की नाकाम कोशिश करते रहने का शहर है, ऐसा नहीं है कि जीवन अवसाद है, लेकिन इसी अवसाद के नमक से सफलताएं जन्म लेती हैं। लोकल एक और अंतहीन यात्रा पर निकल चुकी है, उसकी मंजिलें वही हैं, रोज़ की तरह वह लोहे से चिंगारी का तेल पेरेगी और रात होते होते थक कर किसी यार्ड मे सो जाएगी, उसे पता है उसका सोना कोई नहीं देखेगा, लेकिन झिलमिलाती बल्ब की रोशनी में वह फिर से नहाकर तैयार होती है, उसकी मंजिलें कइयों को नए रास्ते से रूबरू कराती हैं, मंज़िलों के बांटने की यह कला वह अपने जन्म से ही सीख लेती है। कुछ मंजिलें मिलती हैं और कुछ काल के मुह मे अपना सिर डालकर दम तोड़ देती हैं, आज चाय वाली बात पर पता चला रोज़ 18 से 20 मंज़िलों की कहानी शहर के लोहे वाली लाइनों पर खत्म हो जाती हैं, उनकी पहचान अखबार के पन्नों तक नहीं पहुंचती और ना ही टीवी के चमकते हुए रंगों के भीतर मुखौटे पहने खबर नवीसों के पास। मंज़िलों की यह लड़ाई सतत् जारी रहेगी, उन्हे रोकना ख़ुद से खुद को मिटाना होता है।

खैर, शनिवार अपनी धमक के साथ आ चुका है, कल का दिन बहुत अच्छा नहीं गया, ऑफिस का कुछ काम बचा हुआ है, गलती मेरी ही है, चाहता तो पहले से लगकर खतम कर सकता था, लेकिन हम सब इंतज़ार करते हैं डेड लाइन का, यह डेड लाइन कभी सीधी होकर खतम हो जाती है तो कभी आपके अंदर ना जाने कहाँ कहाँ जाकर उलझनों की रेलम पेल लगा देती हैं, लेकिन एक ऑफिस की यही कहानी है, वह सुबह से शुरू होकर शाम तक ऐसे कईयों डेड लाइन से लड़कर थककर सो जाती है, फिर से एक नयी डेड लाइन से लड़ने के लिए। कल ट्रेफिक बहुत था, दो घंटे मे घर पहुंचा, साढ़े 9 घंटे की नौकरी और चार घंटे बस के अंदर उस घर से आने जाने मे जो हम सब का एक बनावटी मकान होता है, जहां हम रहते है, तैयार होते हैं, रोज़ एक नयी लड़ाई लड़ने के लिए। कॉर्पोरेट सिर्फ एक ही फलसफे पर काम करता है, "Survival of the fittest".... आप के अंदर की आग जितनी जलती रहेगी आप उतने दिन तक जीएंगे, लड़ाई लड़ेंगे, डेड लाइन का पीछा करेंगे और जिस दिन भी यह आग थोड़ी कम हुयी, आपके बगल से कोई आगे निकलता हुआ आपको लडाई से बाहर कर देगा, लड़ाई के इस मौत की कोई आवाज़ नहीं होती और ना ही इस शहादत को कोई चक्र मिलता है, लड़ो या मरो, और कोई चारा नहीं है आपके पास। इस लड़ाई से लड़ने के लिए तैयार होने के बहुत सारे बहाने हैं। मसलन आपने कितना करज़ा लिया हुआ है, कौन कौन सी ई एम आई हर महीने आपके खाते से रूपयों को निकाल ले जाती है, यह होम लोन है, आईफोन के सपने को सच करने की कवायद है या फिर भेड़ चाल की इस नयी दुनिया में अपने स्टेटस का दिखावा करने की जुगत। जो भी हो, करज़े की इस दौड़ मे हर कोई शामिल है किसी ना किसी तरह, हम सब कर्जदार हैं, देश कर्जदार, उसके नागरिक कर्जदार और यह करज़ा सुरसा के मुह की तरह रोज़ फैलता जाता है, कहते हैं कुछ तो होना चाहिए इल्म कि मौत क्या है, तो यह करज़ा रोज़ दौड़ने का इल्म है, जहां रुके सब ख़तम। अनुभवों की इस रेजगारी मे रोज़ कुछ ना कुछ शामिल होता है, दिन बढ़ रहा है, काम बहुत है और छुट्टी बड़ी तेज़ी से भागती है।


6 जनवरी 2017

बम शंकर टन गनेश


बस चल चुकी थी, घड़ी मे सुई आठ बज के पंद्रह मिनट होने का ऐलान कर चुकी है। ऑफिस के कैंपस से बाहर निकलते ही सड़क का शोर बढ़ गया, अगल बगल बैठे लोगों के हाथों मे मोबाइल फोन चमकने लगा था, कोई चेहरे की किताब पर था तो कोई संदेश भेजने वाले ऐप पर, कोई फोन पर बात कर रहा था, किसी को घर पहुंचने से पहले सब्ज़ी लेनी थी तो किसी को कुछ जरूरत के सामान, घर सबको पहुंचना है, आगे सड़क का ट्रेफिक रुका हुआ था, गाड़ियों की लंबी कतारों के बीच सड़क की चौड़ाई ने अपने घुटने टेक दिए थे। मुझे याद आया कि मेरे मोबाइल का इंटरनेट डाटा खत्म हो चुका है, उफ्फ यह भी एक मुसीबत ही है, किसने क्या लिखा होगा, क्या कहा होगा? व्हाट्सऐप पर कुछ मैसेज़स आए होंगे, कैसे पढूं? फिर कुछ सोचते हुए कहता हूँ, चलो इंतज़ार कर लेंगे आज वह भी, बस एक दिन ही तो है बिलिंग साइकिल के..... डाटा फिर भर जाएगा। मन मानने लगता है, उसे भी मनाने के लिए थोड़ी जगह देनी पड़ती है, जिससे दाएं बाएं करके वह अपने मन की बात कर ले, नहीं तो बेमतलब का शोर मचाता रहेगा, इसी मतलब बेमतलब के बीच ज़िन्दगी घूमती रहती है, लेकिन सोचता हूँ कि हमारा दायरा कितना छोटा हो गया है, देखने मे बड़ा लेकिन सच मे क्या यह है उतना बड़ा? हज़ारों दोस्त, कई सभ्यताएं और उनके अनुभव को बांटते हुए भी हम अकेले ही हैं, और जब वही अपने से पहले की पीढ़ी को देखता हूँ तो जलन होती है, बहुत कुछ ना होते हुए भी वह अकेले नहीं थे। 

खैर, इन सारी सोचों को थोड़ा धकेलते हुए बैग से किंडल निकाल लेता हूँ, बम शंकर टन गनेश चमक उठता है और तरियानी छपरा के किस्से, उसका इतिहास, बुजुर्गों की कहानियां, उनकी उम्र, माओवाद के पीछे की राजनीति, अस्पताल बनाने की कवायद, डॉक्टर साहब का झोला और बेकार हो चुके अस्पताल के आगे उनकी टेबल........ किताब रख देता हूँ, और गावों के किस्से कहानियाँ घूमने लगते हैं, गाँव का खंडहर होता घर, बचपन मे खेत जोतने के बाद उसे बराबर करने के लिए लकड़ी के बड़े से टुकड़े के नीचे आ जाना, अम्मा का चिल्लाना, आम के पेड़ों पर लखनी के लखना खेलते हुए, खो खो, कबड्डी, सेकंता (गेंद को जोर से खींच कर मारना) वगैरह वगैरह.... सड़क के शोर के बीच का एकांत अचानक से ही खतम हो जाता है, गाँव के क्षितिज पर सूरज के ठीक उगने से पहले की लालिमा आँखों के सामने चमकने लगती है, सब कुछ हरा भरा हो जाता है, हाथों मे मोबाइल की जगह डंडे और काली सड़कों की जगह सफेद चमकती पगडंडी ले लेती है, सरसो के खेत, अरहर के पौधे, मटर का होरहा, गन्ने की मिठास, गुड़ बनाने से ठीक पहले उतार लिया गया राब और उसका शर्बत.... सब कुछ गड्ड मड्ड होकर सामने आया जाता है, आगे लाल बत्ती है, ट्रेफिक जादा है, और लाइन दूर तक, हमारी बस किसी फ्लाई ओवर के ऊपर खड़ी है, और फ्लाई ओवर के नीचे दोनों तरफ कतार मे खड़े लैंपपोस्ट रोशनी की लालटेन लिए खड़े हैं, दूर तक रोशनी का तांता लगा हुआ है, अंदर का फ़ोटोग्राफ़र कैमरे के लिए कसक उठता है। बस आगे बढ़ती है, टोल है, टोल के आगे लम्बा जाम, और सड़क के दोनों तरफ छोटे छोटे तंबू खींचें रहने वाले कुछ लोग, गंदे, मैले कुचैले बच्चे..... उनके मुह पर लगे खाने के दाग अभी तक नहीं छूटे हैं, शायद उसके स्वाद को लंबे समय तक महसूस करने के लिए, फिर ना जाने कब मिले, मेरे अंदर का फ़ोटोग्राफ़र कसक कर चुप हो जाता है, फोटो के बाहर की दुनिया और उनके दुख फ़ोटोग्राफ़र कहाँ देख पाता है, हाँ कुछ फोटूओं पर लाखों रुपए कमाकर फिर से दुनियावी भीड़ का हिस्सा जरूर बन जाता है। मेरा स्टॉप आने वाला है, बस उन सबको छोड़कर आगे बढ़ चुकी है, तंबुओं की जगह बड़ी बड़ी इमारतों ने ले ली है, रोशनी की चमक अकेली पड़ने लगी है, वह सड़कों पर फैलकर बिखर जाती है, घरों की रोशनी पर्दों मे सिमटकर काली पड़ जाती है। मैं उतर चुका हूं, फोन बजने लगता है, सोचों के बाहर की दुनिया अपना साम्राज्य फैला चुकी है। मुंबई जस की तस रोज़ की तरह एक और रात के जवान होने का इरादा लिए आगे बढ़ने लगती है, मेरे घर का दरवाज़ा खुलने वाला है, आज क्या बनेगा?

मुंबई डायरी #1

रात के ढाई बज चुके हैं, घड़ी की सुई फिर भी नहीं थमती है, सड़कें लैंपपोस्ट की रोशनी मे नहायी हुयी हैं, पीली रोशनी का आतंक सड़कों को अपने मोहपाश मे जकड़ चुका है। सड़कें फिर भी काली हैं, जैसे रोशनी को चिढ़ा रही हों कि मोह भले चाहे जितना हो, अंतः और सतह जस के तस रहते हैं। उपर आसमान का कालापन बढ़ जाता है, चाय की चुस्की मन मे चल रहे झंझावातों को थोड़ा सा शूकून देती है। चेहरे की किताब पर एक टिप्पणी आती है। मतलब मैं अकेला नहीं जगा हुआ हूँ, लेकिन कुछ देर मे ही यह खुशी टूटने लगती है, बड़े होने का दायित्व हिलोरे लेने लगता है, अमल अभी तक जगा है? पूछता हूँ, फिर रहा नहीं जाता, फ़ोन कर लेता हूँ, इधर उधर की बातों को करते हुए उसे सोने की हिदायत देता हूं, फोन रख देता हूं। सड़क की उदासी बढ़ने लगती है, कैब वाला भी एक किनारे चाय पी रहा होता है। सामने दो बाइक हैं, उन पर दो लड़के, अपनी नौकरी की तैयारी मे हैं, उनका नाम पूछता हूँ फिर भूल जाता हूँ। ऑस्ट्रेलिया की शिफ्ट है उनकी, रात के समय से कल दोपहर तक नौकरी से उनकी मार काट चलती रहेगी, दूसरे की भाषा में गिट्ट पिट्ट करते हुए वह अपना पेट पाल लेते हैं। सामने कैब वाला हंसते हुए मेरी तरफ देखता है, सोचता हूँ कि 200 स्क्वेयर फीट मे छह लोग कैसे रह लेते हैं, एक कमरा और एक रसोईघर, साझा बाथरूम...... फिर अपने आपको देखता हूँ और ऊपर आसमान को देखते हुए भगवान का शुक्र बजाता हूं। आप भले ही उसे मानें ना मानें, उसके अस्तित्व को नकार दें लेकिन कुछ तो है कि कभी ना कभी आप उसे याद कर ही लेते हैं। सोचता हूँ कल अगरबत्ती जला दूँगा, बहुत दिन हो गया है जलाए। चाय खत्म होने वाली है, आखिरी घूँट ग्लास मे दिखाई दे रही है, वह अपने अस्तित्व को लेकर बेखबर है, और कोई उसे पीने के लिए भारत का हर कोना अपने कैमरे के साथ किसी ट्रक पर बैठ कर घूमना चाहता है, पीना चाहता है हर स्वाद की चाय.... और बतियाना चाहता है अपने पीठ पर टंगे बैग से, हाथों मे लटके कैमरे से एक लंबी बातचीत.... उन सपनों के ठौर नहीं होते, उनकी बातें होती हैं.... बिना ठौर के भी ज़िन्दगी खूबसूरत लगती है, है ना? चाय खत्म हो चुकी है, घर की तरफ बढ़ जाता हूँ, नींद नहीं आती आजकल, लेकिन आँखों के सपने बहुत चमकने लगे हैं, ऊपर एक तारा आसमान से झांकता है, शायद ध्रुव तारा है और टिमटिमाते हुए कुछ कहना चाहता है, मुझे सुनने का दिल नहीं करता और अपनी नज़रें उससे हटा लेता हूँ, गुस्सा हो तो होता रहे। 

मन के किसी कोने मे पहाड़ के बीच एक नदी बहती हुई दिखती है, पत्थरों के बीच एक आवाज़ गूंजती रहती है, वहीं कहीं मैं भी हूँ, और एक पीला सा फूल पत्थरों के बीच खिला हुआ है, अस्तित्व की इस लड़ाई मे वह पत्थरों से जीत गया है, मैं खुश हो जाता हूँ कि कहीं से पत्नी की आवाज़ आती है, "नदी के बीच, पत्थरों मे रहने के लिए शादी की थी क्या?" मन के द्वार बंद होने लगते है, वह सब कुछ चुंबक की तरह खींच रहे हैं, लेकिन कुछ नहीं कर सकता मैं, सारे नज़ारे खो चुके हैं, मैं घर पहुंच चुका हूं, एक रात फिर ढल जाएगी और कुछ देर मे आसमान फिर उजास किरणों से नहाते हुए सफेद हो जाएगा..... रात का ढलना जारी है।