भारत माता की जय मैं क्यूँ बोलूँ? मुझे क्यूँ खड़ा होना है राष्ट्र गान के बजते ही? उच्चतम न्यायालय का यह आदेश तानाशाही है भला राष्ट्र गान को सिनेमा हालों मे बजाना क्यूँ अनिवार्य किया गया है, हम सिनेमा देखने जाते हैं या खड़े होने? गाय हमारी माता क्यूँ है? हम क्यूँ माने गाय हमारी माता है? सीमा पर खड़ा जवान अगर मरता है तो उसे मरने और मारने के पैसे मिलते है, मिलते हैं कि नहीं?
सवालों की एक लंबी फेहरिस्त है जो इन दिनों आम है, सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हर जगह आपको ऐसे सवालों और उनके पक्ष विपक्ष के ऊपर चर्चा करते हुए लोग मिल जाएंगे, एक और विडियो है जहाँ सेना के जवानों के लिए होटल, सिनेमा हॉल, स्कूल, कॉलेज मे लोग खड़े होकर ताली बजाते हैं, बैकग्राउंड मे जन गण मन का इंस्ट्रूमेंटल बजता है और मेरे जैसे कुछ लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। हम यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या बदला है देश के इन सत्तर सालों में? लेकिन इन सबके बीच यह सोचना हम भूल जाते हैं कि हम कितने बदले हैं, हमारी लालसायें, चाहतें और कुछ करने या ना करने के वजूहात मे कितने बदलाव आए हैं? फिर अचानक ही तेज बहादुर यादव नाम का एक शख्स जो कि सेना की एक टुकड़ी मे जो बर्फ से घिरे पहाडों मे कहीं रोज मौत से आइस पाइस खेलती है के कुछ सच लेके सवाल कर बैठता है? उसे वहां होने से कोई ग़म नहीं है, ना ही वह मरने से डरता है, वह बस मांगता है अपने अधिकार, अच्छा खाने की उस देश से जहां की जनता के टैक्स का एक बड़ा भाग रक्षा विभाग को हर साल दे दिया जाता है, रातों रात लोग उसके बनाये विडियो को शेयर करना शुरू कर देते हैं, उन्हे लगता है यही बदलाव है, लेकिन उसके सवाल अब भी कोई नहीं करता, नहीं मांगता ऐसे जवाब जो वह अपनी रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी मे मांगता है, कोई धरना प्रदर्शन नहीं होता, विडियो शेयर हो चुका है, उसके फॉलोअर की संख्या बढ़ती जाती है, और सेना के बड़े अधिकारियों की नींदे इसलिए उड़ जाती हैं कि उनकी पोल खोलने की हिमाकत इस यादव ने कर कैसे दी? क्या उसे ट्रेनिंग के समय यह नहीं बताया गया था कि जो तुम्हारे अधिकारी बोलें वही अंतिम सत्य, जो खिलाएं वही खाना.... फिर इतनी बड़ी हिम्मत उसमे कैसे आया गयी?
अब लोगों के धड़े बदलने लगे, कुछ लोग उसे झूठा तो कुछ सही करार देने लगे, सबके अपने अपने तर्क, और बंद ए सी के घरों, कारों, ऑफिसेज और सोशल मीडिया मे लोगों का देश प्रेम अचानक ही हिलोरे मारने लगा, चर्चा के बाज़ार गरम होने लगे, लेकिन यादव का सच व्यवस्था से हारने लगा। उसकी बीवी, बच्चे उसकी खबर से मरहूम हो गए, सेना का एक धड़ा जो कि अब तक एम सी, बी सी कहते हुए उसके साथ खड़ा था, अचानक ही दूरी बना लेता है, उसके साथ क्या हो रहा है, पूछने वालों की संख्या में गिरावट आ गयी है, भला राष्ट्रीय चिंता का विषय वह थोड़े ही है, लेकिन प्रश्नों को लेकर सवाल खड़ा करने की हिमाकत उसकी ही है। कुछ दिन मे लोग यादव को भूल जाएंगे, सेना के जवान वही जली रोटी, हल्दी और पानी की दाल और काली चाय पीकर हमारे सीमा पर मरते रहेंगे, हमारे सवाल फिर वही हो जाएंगे, गाय, राष्ट्र गान, मेरी सुविधा से खिलवाड़ वगैरह वगैरह.......कारण का कारक कुछ दिन मे खत्म हो जाता है, व्यवस्था उसे गूंगी और बहरी बनाकर बाहर कर देती है। खैर आप चिंता ना करें, चाय गरम हो गयी होगी, टोस्टर से ब्रेड निकल चुका होगा, कॉफी पीने वालों की कॉफी ब्रू हो चुकी होगी, जल्दी जाइए ठंडी हो जाएगी। उधर अधिकारी के परिवार वाले के यहाँ सेना कोई जवान सब्ज़ी ला चुका होगा, कपड़े धुलने अभी बाकी होंगे, साहब गश्त पर निकल चुके हैं, रसोई का एक जवान उनके खाने की तैयारी मे लग चुका है, आज दोपहर के खाने मे बोटी है। अरे! आप अभी तक यहीं हैं, जाइए जनाब क्यूँ अपनी नौकरी पर वजाहत लाना चाहते हैं।

बिल्कुल वाजिब प्रश्न उठाया है आपने.
जवाब देंहटाएंHardik abhar Rajeev Ji!
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