घर के बाहर पहाडों पर सूरज चमकने लगा था, कबूतर अपनी उड़ान वाली गस्त पर जा चुके थे, बाहर सड़कों पर चिल्ल पों बढ़ गयी थी और काले टायर जलने लगे थे। वहीं पास का समुद्र लहराकर रोशनी को अपनी गिरफ्त में बांधने की तैयारी कर चुका है, उसे पता है लहरें चमक कर सफेद हो जाएंगी और रोशनी उनके भीतर की काली परत पर अपने छाप छोड़ती हुई शाम तक डेरा जमा के रखेगी, पास की इमारतें अपने अक्स को पानी मे खोजने की असफल कोशिश मे लग चुकी हैं और शहर अपनी यात्रा पर निकल चुका है। यह शहर अवसाद का शहर है, सपनों को खुद मे भर कर जीने की नाकाम कोशिश करते रहने का शहर है, ऐसा नहीं है कि जीवन अवसाद है, लेकिन इसी अवसाद के नमक से सफलताएं जन्म लेती हैं। लोकल एक और अंतहीन यात्रा पर निकल चुकी है, उसकी मंजिलें वही हैं, रोज़ की तरह वह लोहे से चिंगारी का तेल पेरेगी और रात होते होते थक कर किसी यार्ड मे सो जाएगी, उसे पता है उसका सोना कोई नहीं देखेगा, लेकिन झिलमिलाती बल्ब की रोशनी में वह फिर से नहाकर तैयार होती है, उसकी मंजिलें कइयों को नए रास्ते से रूबरू कराती हैं, मंज़िलों के बांटने की यह कला वह अपने जन्म से ही सीख लेती है। कुछ मंजिलें मिलती हैं और कुछ काल के मुह मे अपना सिर डालकर दम तोड़ देती हैं, आज चाय वाली बात पर पता चला रोज़ 18 से 20 मंज़िलों की कहानी शहर के लोहे वाली लाइनों पर खत्म हो जाती हैं, उनकी पहचान अखबार के पन्नों तक नहीं पहुंचती और ना ही टीवी के चमकते हुए रंगों के भीतर मुखौटे पहने खबर नवीसों के पास। मंज़िलों की यह लड़ाई सतत् जारी रहेगी, उन्हे रोकना ख़ुद से खुद को मिटाना होता है।
खैर, शनिवार अपनी धमक के साथ आ चुका है, कल का दिन बहुत अच्छा नहीं गया, ऑफिस का कुछ काम बचा हुआ है, गलती मेरी ही है, चाहता तो पहले से लगकर खतम कर सकता था, लेकिन हम सब इंतज़ार करते हैं डेड लाइन का, यह डेड लाइन कभी सीधी होकर खतम हो जाती है तो कभी आपके अंदर ना जाने कहाँ कहाँ जाकर उलझनों की रेलम पेल लगा देती हैं, लेकिन एक ऑफिस की यही कहानी है, वह सुबह से शुरू होकर शाम तक ऐसे कईयों डेड लाइन से लड़कर थककर सो जाती है, फिर से एक नयी डेड लाइन से लड़ने के लिए। कल ट्रेफिक बहुत था, दो घंटे मे घर पहुंचा, साढ़े 9 घंटे की नौकरी और चार घंटे बस के अंदर उस घर से आने जाने मे जो हम सब का एक बनावटी मकान होता है, जहां हम रहते है, तैयार होते हैं, रोज़ एक नयी लड़ाई लड़ने के लिए। कॉर्पोरेट सिर्फ एक ही फलसफे पर काम करता है, "Survival of the fittest".... आप के अंदर की आग जितनी जलती रहेगी आप उतने दिन तक जीएंगे, लड़ाई लड़ेंगे, डेड लाइन का पीछा करेंगे और जिस दिन भी यह आग थोड़ी कम हुयी, आपके बगल से कोई आगे निकलता हुआ आपको लडाई से बाहर कर देगा, लड़ाई के इस मौत की कोई आवाज़ नहीं होती और ना ही इस शहादत को कोई चक्र मिलता है, लड़ो या मरो, और कोई चारा नहीं है आपके पास। इस लड़ाई से लड़ने के लिए तैयार होने के बहुत सारे बहाने हैं। मसलन आपने कितना करज़ा लिया हुआ है, कौन कौन सी ई एम आई हर महीने आपके खाते से रूपयों को निकाल ले जाती है, यह होम लोन है, आईफोन के सपने को सच करने की कवायद है या फिर भेड़ चाल की इस नयी दुनिया में अपने स्टेटस का दिखावा करने की जुगत। जो भी हो, करज़े की इस दौड़ मे हर कोई शामिल है किसी ना किसी तरह, हम सब कर्जदार हैं, देश कर्जदार, उसके नागरिक कर्जदार और यह करज़ा सुरसा के मुह की तरह रोज़ फैलता जाता है, कहते हैं कुछ तो होना चाहिए इल्म कि मौत क्या है, तो यह करज़ा रोज़ दौड़ने का इल्म है, जहां रुके सब ख़तम। अनुभवों की इस रेजगारी मे रोज़ कुछ ना कुछ शामिल होता है, दिन बढ़ रहा है, काम बहुत है और छुट्टी बड़ी तेज़ी से भागती है।
खैर, शनिवार अपनी धमक के साथ आ चुका है, कल का दिन बहुत अच्छा नहीं गया, ऑफिस का कुछ काम बचा हुआ है, गलती मेरी ही है, चाहता तो पहले से लगकर खतम कर सकता था, लेकिन हम सब इंतज़ार करते हैं डेड लाइन का, यह डेड लाइन कभी सीधी होकर खतम हो जाती है तो कभी आपके अंदर ना जाने कहाँ कहाँ जाकर उलझनों की रेलम पेल लगा देती हैं, लेकिन एक ऑफिस की यही कहानी है, वह सुबह से शुरू होकर शाम तक ऐसे कईयों डेड लाइन से लड़कर थककर सो जाती है, फिर से एक नयी डेड लाइन से लड़ने के लिए। कल ट्रेफिक बहुत था, दो घंटे मे घर पहुंचा, साढ़े 9 घंटे की नौकरी और चार घंटे बस के अंदर उस घर से आने जाने मे जो हम सब का एक बनावटी मकान होता है, जहां हम रहते है, तैयार होते हैं, रोज़ एक नयी लड़ाई लड़ने के लिए। कॉर्पोरेट सिर्फ एक ही फलसफे पर काम करता है, "Survival of the fittest".... आप के अंदर की आग जितनी जलती रहेगी आप उतने दिन तक जीएंगे, लड़ाई लड़ेंगे, डेड लाइन का पीछा करेंगे और जिस दिन भी यह आग थोड़ी कम हुयी, आपके बगल से कोई आगे निकलता हुआ आपको लडाई से बाहर कर देगा, लड़ाई के इस मौत की कोई आवाज़ नहीं होती और ना ही इस शहादत को कोई चक्र मिलता है, लड़ो या मरो, और कोई चारा नहीं है आपके पास। इस लड़ाई से लड़ने के लिए तैयार होने के बहुत सारे बहाने हैं। मसलन आपने कितना करज़ा लिया हुआ है, कौन कौन सी ई एम आई हर महीने आपके खाते से रूपयों को निकाल ले जाती है, यह होम लोन है, आईफोन के सपने को सच करने की कवायद है या फिर भेड़ चाल की इस नयी दुनिया में अपने स्टेटस का दिखावा करने की जुगत। जो भी हो, करज़े की इस दौड़ मे हर कोई शामिल है किसी ना किसी तरह, हम सब कर्जदार हैं, देश कर्जदार, उसके नागरिक कर्जदार और यह करज़ा सुरसा के मुह की तरह रोज़ फैलता जाता है, कहते हैं कुछ तो होना चाहिए इल्म कि मौत क्या है, तो यह करज़ा रोज़ दौड़ने का इल्म है, जहां रुके सब ख़तम। अनुभवों की इस रेजगारी मे रोज़ कुछ ना कुछ शामिल होता है, दिन बढ़ रहा है, काम बहुत है और छुट्टी बड़ी तेज़ी से भागती है।

बहुत सुंदर.
जवाब देंहटाएंसादर आभार
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