30 जनवरी 2013

गुमशुदा तलाश


हर बार हो जाती हो तुम गुमशुदा,
कभी प्रेम के बनाये सामंती पन्नों में,
तो कभी संदेह की उग आई नागफनी में,
और मैं ढूंढता ही रहता हूँ तुम्हे,
गुम गयी गलियों में,
धूल उड़ाती सड़कों पर,
कभी कभी पूछ आता हूँ तुम्हारा पता,
सपने में आने वाली उस परी से भी,
जो बिलकुल तुम्हारी ही तरह दिखती है,
खंगालता आता हूँ डायरी के तुम्हारे पन्ने,
जो अब पीले पड़ गए हैं,
तुम्हारी याद में,
टांकने बैठ जाता हूँ शर्ट के टूटे हुए बटन,
जो तुमने तोड़े थे मेरी आगोश में लिपट के,
और तुम्हारी सांसे फिर,
ताज़ा होकर महकने लगती हैं,
गमले में खिल आये बेला की पंखुड़ियों में,
गुलाब और भी गुलाबी हो जाता है,
तुम्हारी यादों की महकती रोशनायी से,
लेकिन मैं वहीँ रह जाता हूँ,
सपनों के भंवर में फंसा हुआ,
करता गुमशुदा तलाश।

-नीरज

29 जनवरी 2013

शैक्षिक दखल

चपन की कुछ यादें आज भी वैसी ही हैं जैसे बचपन अभी जस का तस हो, वही स्कूल वही माटर जी जो साइकिल पर चढ़कर बच्चों को पढ़ाने आया करते थे और शुरू होती थी पाठशाला किसी भी पेंड के नीचे तकथी और खड़िया के साथ। मेरे लिए यह दृश्य बड़ा नायाब होता था, मेरा भी मन करता था तकथी और खड़िया लेकर पेंड के नीचे बैठ कर पढने का और जोर जोर से चिल्लाकर ककहरा पढने को, लेकिन यह सिर्फ मेरे सोच में ही रह गयी क्यूंकि जब भी मैं उस स्कूल में पंहुचता था माटर जी के साथ साथ बच्चे भी चुप हो जाते थे, और यूँ देखने लगते थे जैसे किसी दूसरे ग्रह का प्राणी अपनी डरावनी सूरत लेकर खड़ा हो गया है, लेकिन यह एहसास सिर्फ पल भर का ही होता था क्यूंकि माटर जी स्वयं मेरे पास आकर इस तरह नतमस्तक होते थे जैसे मैं उनसे भी बड़ा शिक्षक होऊं, फिर शुरू होता था गुणगान शहरी शिक्षा का और मेरा इतना बखान होता था की स्वयं शिक्षा की देवी सरस्वती भी नतमस्तक हो जायें, और सारे बच्चे शाम होते ही शहर के मेरे स्कूल के बारे में पूछने मेरे पास पहुँच जाते थे और मेरा बालमन समय से पहले ही प्रौढ़ हो जाता था। खैर, आप सोच रहे होंगे कि मैं यह कौन सा विषय लेकर बैठ गया, असल में महेश पुनेठा जी के माध्यम से शैक्षिक दखल का पहला अंक प्राप्त हुआ है और अनजाने में ही सही बचपन में गाँव की यह यादें अनाहूत मन मस्तिष्क में अपना डेरा जमती चली गयीं, तबसे लेकर आज तक कितना समय बीत चुका लेकिन आज भी रूककर अगर एक बार पीछे मुड़कर देखता हूँ तो कुछ बदला हुआ नहीं मिलता, शिक्षा और शैक्षिक स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है, वैसे यहाँ यह बता दूँ कि बात गाँव की शिक्षा से शुरू हुई है लेकिन मैं उसे गलत या हेय नहीं कह रहा, असल में शिक्षा कहीं भी सही तरीके से नहीं हो रही, फिर चाहे वह गाँव हो या फिर शहर, सिर्फ ककहरा और बेसिक जानकारी को शिक्षा का नाम नहीं दिया जा सकता, शिक्षा असल में बंधनों से मुक्त करने वाली होनी चाहिए(सा विद्या या विमुक्तये), जहाँ ग्रामीण शिक्षा
में बंधनों का ज्ञान ही नहीं कराया जाता वहीँ सहरी शिक्षा इतने वन्धनों से बांध देती है कि सुलभ बाल मन का समय से पहले ही अंत हो जाता है, पाठ्य पुस्तकों की बढ़ती भीड़, होम वर्क का बोझ, यदा कदा बाल मन को इतना झिंझोर देता है कि फिर कुछ रचनात्मकता बची ही नहीं रह जाती, और रचनात्मकता की जगह विनाशात्मकता घर करती है जिसका उदाहरण हमें आये दिन मिलता रहता है। या तो हमने शिक्षा का भारतीय दृष्टिकोण बदल दिया है, या फिर हम एक ऐसी शिक्षा की तरफ भाग रहे हैं जहाँ गला काट प्रतियोगिता का वर्चस्व है, और यह वर्चस्व बड़ों के लिए कुछ मायने में अगर सही है तो बच्चों के लिए हर मायने में गलत, क्यूंकि ऐसी स्थिति में रचनाधर्मिता का अंत हो जाता है, या फिर यूँ कहें कि स्वतंत्रा की परिभाषा में स्वतंत्रता का अवर्गीकरण।
और उपरोक्त स्थिति में शैक्षिक दखल का प्रवेशांक एक नयी रह खोलता है, महेश पुनेठा और दिनेश कर्नाटक जी के संपादन में पत्रिका अपना पूरा प्रभाव छोडती है, शैक्षिक परिचर्चा जहाँ दिमाग की गिरहें खोलती हुई स्वतंत्रता और स्वछंदता का प्रभावपूर्ण परिभाषण करते हुए रचनाधर्मिता का एक नया सोपान रचती है, वहीँ मोहन श्रोतिय जी का कविता के भविष्य पर प्रभावपूर्ण लेख गहरे पैठ बनाता है। दिनेश कर्नाटक जी का लेख वर्त्तमान परिदृश्य में शिक्षा की विसंगतियों और विडम्बनाओं की पोल खोलती है। लेकिन कहीं कहीं पर यह एहसास अपने आप ही घर कर जाता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इस पत्रिका के माध्यम से शिक्षकों को ज्यादा तरजीह दी जा रही हो वह भी उस समय में जब अधिकतर विद्यालयों में शिक्षक सबसे ज्यादा मजाखोरी कर रहा है(लेकिन यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि यहाँ बार बार उसी शिक्षक की बात की जा रही है जो अपने कर्त्तव्य को समझता है और उसके पालन में उसे किस अवरोध का सामना करना पड़ रहा है,अच्छा होता की इस अवरोध को और भी सशक्त तरीके से रखा जाता।) , आज जबकि समाज को एक कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक की आवश्यकता है ऐसे समय में वर्तमान शिक्षक कहीं न कहीं फीके ही नज़र आते हैं, और इसका सबसे बड़ा कारण वर्तमान समय में शिक्षा को एक ढोय की संज्ञा से परिभाषित करना है, आज शिक्षा इसलिए जरुरी नहीं की वह ज्ञानार्जन है और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने का जरिया वल्कि इसलिए कि यह कैसे धनार्जन में सहायक हो, और इस परिदृश्य में ऐसे शिक्षकों की बाढ़ आ गयी है जो शिक्षक कम बल्कि व्यापारी ज्यादा हैं। शमशाद जी की कहानी टोलम ऐसे अनेकों पात्र पुनः जीवित कर देती है जो हमारे बचपन के अभिन्न अंग रहे हैं, औए साथ ही विचारों को झकझोरते हुए अनेकों सवाल पूछ जाते हैं की ऐसे टोलम भला बनते कैसे हैं औए इनके जिम्मेदार कौन हैं? खजान सिंह जी की कहानी ऐसे अनेकों सवाल पूछती है जो हमारे अन्दर कबसे बंद पड़ी हैं लेकिन उन्हें शायद शब्द न मिल रहे हों, खजान सिंह भाई को इसके लिए अत्यन्त बधाई। कुल मिलाकर शैक्षिक दखल का यह प्रवेशांक अपने उद्देश्य में सफल हुआ है और आशा है कि अन्य अंक भी इसी परम्परा का निर्वाह करेंगे।

-नीरज




28 जनवरी 2013

धूसर

कितना धूसर सा होता है समय, बिना बताये आता है और बिना बताये ही चला जाता है, और इस सबके बीच जो संवाद बचे रह जाते हैं वो निरे धूसर ही होते हैं। अभी ज्यादा वक़्त नहीं बीता है दिल्ली में हुई घटना को, लेकिन देखिये सब कुछ धूसर हो चुका है, इतना धूसर कि जैसे वह सारी बातें किताबी होकर जिल्दों में मढ़ दी गयी हैं, और आने वाला समय उसे इन जिल्दों से पढ़ेगा, अतीत का सर्वनाश। असल में समस्या की जड़ यही है, जब कुछ होता है तो हम हाथों में मशाल लिए, मोमबत्तियां लिए और जुलूस निकलकर अपने प्रतिरोध का प्रदर्शन तो करते हैं लेकिन उसे जारी रखने का बूता हमारे अन्दर नहीं है, और तो और हम उस समय ऐसी बातें करते हैं जैसा सारा का सारा लावा हमारे अन्दर ही बह रहा है, जो अब दावानल बनकर जला डालेगा सारी व्यवस्था और फिर देखेगा जमाना हमारे प्रतिरोध का असर। हालाँकि, इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस घटना ने झिन्झोरकर रख दिया हमें और हम जगे भी, आशु गैस के गोलों में, पुलिस की लाठी में, इंडिया गेट पर, रायसीना हिल्स पर, दिखा हमारा प्रतिरोध पूरे जोशो खरोश के साथ, लेकिन उन्ही दिनों कुछ ऐसी घटनाएं भी हुई जिनकी चर्चा न तो मीडिया में हुई और न ही उन्हें इतना तवज्जो दिया गया, कारण हम दिखावे में मरते हैं, हमें पसंद है टीवी में दिखना, रिपोर्टरों की माइक के सामने अपने गुस्से का इज़हार करना, रिपोर्ताजों में अपना नाम देखकर हमें कितनी ख़ुशी होती है, यह हमसे बेहतर कौन जानता है। मेरे एक मित्र ने जंतर मंतर पर बोले अपने भाषण को बाकायदा फिल्म बनाकर फेसबुक पर टैग्स के साथ इज़हार कर रहे थे अपने जागरूक होने का, हद तो तब हो गयी जब उनके इस कृत्य का अन्य मित्रों में पूरी गरमजोशी के साथ स्वागत किया, साथी हम साथ हैं, साथी हम लड़ेंगे जैसे शब्द हर नेटवर्किंग साईट पर ग़ज़ल की तरह गूँज रहे थे, लेकिन कब तक? कब तक? फिर चली गयी दामिनी(उसका असली नाम अब सबको पता है, लेकिन मुझे उसे दामिनी कहने में ही सुकून मिलता है) और एक और हाहाकार मचा, कविताओं के भाव ऐसे रो रहे थे की अब तो वो हो जायेगा जो आज तक नहीं हुआ, इस बीच न जाने कितने अबलाओं की आबरू फिर लूट ली गयी, गाज़ियाबाद, छतीसगढ़, भोपाल, बनारस, कोलकाता और दंतेवाडा में तार तार किया जाता रहा महिलाओं को, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था, सब मशरूफ थे मीडियागिरी के दिखावे में, दिखने और दिखाने के खेल में।
अभी ज्यादा दिनों की बात बात नहीं है जब बी एच यु में विरोध कर रही लड़कियों के साथ सरेआम बदतमीजी की गयी लेकिन हममे से कितने लोग जानते हैं इस घटना के बारे में, दबा दी जाती हैं ऐसी घटनाएं क्यूंकि यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसके फुटेज टीआरपी बटोर सकें और न ही कुछ ऐसा हुआ कि हम मोमबत्ती लेकर खड़े हो सकें इंडिया गेट और जंतर मंतर पर, असल में हम इंतज़ार करते हैं कुछ होने का, और सही अर्थों में सिर्फ होने का नहीं बल्कि कुछ ऐसा होने का जिसमें दिखा सकें हम अपना चेहरा, अपनी विद्रूपता और हो सकें प्रशिद्ध, अब इस प्रसिद्धि की कीमत चाहे जो हो। मुझे समझ में नहीं आता कि किस भेंड चाल में दौड़ रहे हैं हम, हम यह क्यूँ नहीं समझते की उपदेश देने से काम नहीं चलने वाला तब तक जब तक कि वह उपदेश हम स्वयं की ज़िन्दगी में न ढालें, नारी अधिकारों पर बातें करने वाले बड़े बड़े बुद्धिजीवी अपनी बुद्धिमता छोड़कर छिछोरेपन पर उतर आते हैं, जब बात उनके अपने पर आ जाती है, सारे नारी विचार धरे के धरे रह जाते हैं। हम बात करते हैं नारी अधिकारों की लेकिन उसे अपने पैर की जूती ही समझते हैं, अब यह दीगर है की इसे समझने के तरीके को हमने थोडा विस्तार दे दिया है।
मेरे एक परिचित की लड़की को एक दूसरी जात का लड़का पसंद आ गया, भाई साहब पढ़े लिखे हैं और बड़े ही संभ्रांत परिवार से ताल्लुक हैं, लेकिन यह बात लग गयी उन्हें, भला उनकी लड़की कैसे ऐसा कर सकती है, सारी पढाई, सारे संस्कार उसी वक़्त ख़तम हो गए, अधिक बात करने पर उन्होंने जो खुलासा किया वह उनकी सोच को और निखार देता है, अगर लड़का होता तो बात चल भी जाती लेकिन लड़की का मामला है, सारे समाज में नाक कट जाएगी, किसी को मुह दिखाने लायक न रहेंगे। यह सोच सिर्फ उनकी नहीं बल्कि हमारे बीच के बहुत सारे समाजवादियों की भी है, जो लड़कियों को आज भी बोझ ही समझते हैं, जब तक यह सोच रहेगी, ऐसी घटनाएं धूसर ही होती रहेंगी।

-नीरज

27 जनवरी 2013

क्रांति





हम खड़े थे काले कपड़ों में वहां,
हाथों में झंडे, मशाल और लवों पर,
क्रांति के नारे थे,
फिर भी हम शांत थे,
उन भीमकाय आलीशान इमारतों के बीच,
चिल्लाकर मांग रहे थे,
अपना अधिकार(इससे अधिक और कुछ कर भी सकते थे क्या?)
और पता है,
बैठता है उन इमारतों के बीच हमारा ही चुना हुआ,
हमारा मुखिया,
और उनसे आगे एक और आलीशान ईमारत में,
रहता है हमारा महामहिम,
हमारे खून पसीने की कमाई पर करते हैं ये राज़,
और रोज़ हमारी बोटियों को चबा कर खाते हैं,
हम फिर भी खामोश हैं,
विवश हैं,
भीगते हुए कड़ाके की ठंढ में,
रोते हुए आसू गैस के गोलों में,
इस उम्मीद के साथ कि कुछ बदलेगा,
टकराकर इन इमारतों से हमारी आवाजें हमारे अन्दर ही समाहित होती रहीं,
हम चिल्लाते रहे, गरियाते रहे,
कुछ मोमबत्तियां और मशाल जलाकर,
करते रहे अपना विरोध प्रदर्शन,
लेकिन पता है,
हम सब भूल जायेंगे,
आने वाले दिनों में,
और फिर से चुनकर बनायेंगे,
इन्हें ही अपना मसीहा,
जो आज बंद है इन विशालकाय इमारतों में,
और नहीं गूंज रही जिसके कानों में हमारी आवाज़,
फिर एक दामिनी लुटेगी,
मनोरमा को मार दिया जायेगा नोचने के बाद,
औए सोनी सोरी चिल्लाती रहेगी,
दिखाती रहेगी अपने ज़ख्म,
और लुटती रहेगी इनके हाथों,
तब फिर हम खड़े हो जायेंगे,
हाथों में मशाल और मोमबत्तियों की,
परेड निकालने के लिए।

-नीरज

दामिनी

क्या बोलूं, क्या लिखूं,
कलम चुपचाप रो रही है,
और धडकनें इंकार कर रही है,
धड़कने को,
हमारी हैवानियत ने ले ली एक जान,
और देखो,
हम फिर भी तैयार हो रहे हैं,
एक राजनीति तैयार करने को,
बजाय अन्दर बैठे हैवान को मारने को,
दामिनी तुम चली गयी,
अच्छा किया,
नहीं देख पाती तुम यह राजनीति,
लेकिन हम खड़े हैं, एकत्रित
हाथों में थामे मोमबत्तियां और मशाल,
एक नयी क्रांति की,
एक नए समाज की,
शुद्ध, स्वच्छ और परिष्कृत,
दामिनी,
तुम यूँ न भुला दी जाओगी,
करेगा इतिहास तुम्हे याद हमेशा,
एक क्रांति के रूप में,
हाँ दामिनी!!

-नीरज

26 जनवरी 2013

गुमशुदा

गूगल से साभार 

आज तुमसे बात करते हुए ऐसा लगा,
जैसे फिर से कहीं किसी कोने में,
जाग गयी हो तुम,
अपने उन्ही सवालों का हल खोजते हुए,
जिन्हें लेकर तुम गुम हो गयी थी,
पगडंडियों के सहारे,
उस गुमशुदा शहर की,
गुमशुदा गलियों में।
आज फिर ऐसा लगा
जैसे पगडंडियों न फिर से देखने शुरू कर दिए हैं,
तारकोल की काली सड़कों में,
तब्दील होने के सपने।

हाथ की रेखाओं की खींचतान सी फैली,
पगडण्डी ने अपनी आखें,
तुम्हारी आँखों में फिर से डाल दी हैं,
और उसके सपने,
अब तुम्हारी आँखों में भी
नुमायाँ होने लगे हैं,
मुझे डर नहीं है,
न ही तुम्हारे सपने से,
न ही सवालों से,
डर है तो केवल इस बात का,
कि कहीं,
तुम फिर से गुमशुदा न हो जाओ,
जैसे तारकोल की कालिख में लिपटी सड़क बनने के बाद,
गुमशुदा है,
आज पगडंडियां,
और गुम है धूल से भरे मंजर,
हौसलों की बिखरी गर्द,
ठीक वैसे ही,
जैसे हाथ की रेखाओं में गुमशुदा,
पानी का कतरा।

-नीरज


25 जनवरी 2013

अपनी बोली

चित्र गूगल से साभार 

अमराइयों की छांव में सहेजी हुई यादें,
खो खो, कबड्डी और भोजपुरी के बोल में,
छिपी आत्मीयता,
कहाँ खो गयीं?
डर लगता है कभी कभी,
कि कहीं भोजपुरी बोलते हुए पकड़ा न जाउं,
और मजाक का पात्र न बनना पड़े,
नहीं समझ आती लोगों को अब अपनी ही बोली,
उभर आती है एक छुपी हुई कुटिल मुस्कान,
होठों पर, सुनते ही अपनी भाषा,
और बुदबुदा उठते हैं होठ,
अंग्रेजी के कुछ शब्द,
शब्द जो अंजान थे,
आज बदस्तूर अपनी धमक जमा जाते हैं,
और अपने शब्द खो जाते हैं,
बड़ी बड़ी उभर आई इमारतों के पिछवाड़े में,
उग आई बस्तियों की गलियों में।

-नीरज 

22 जनवरी 2013

कतरा कतरा


कतरा कतरा मैं,
और एक पूरे तुम,
लेकिन इन कतरों में, 
बिखरे पड़े हो तुम,
ठीक वैसे ही,
जैसे ओस की हर बूंद में,
छुपी कायनात,
तब तक नहीं चुप होती,
जब तक कि वो फिसल कर,
मिट्टी में न मिल जाये।

-नीरज

मधुमास


चलो अब चलो भी,
चाँद की चांदनी में,
गीत गायेंगे मिलन के,
चलो चलें उस नाव पर,
जहाँ अभी भी नदी पकड़ लेना चाहती है,
तुम्हारा आँचल,
चलो आम की अमराइयों में,
महक आते हैं बिखरी खुशबु,
तुम्हारे बालों की,
चलो अब चलो भी,
मधुमास बीता जा रहा है।

-नीरज

बीच राह


कहाँ चली गयी तुम यूँ,
नए नए करतब सिखा के मुझे,
अभी बाकी है बहुत कुछ सीखने को मुझे,
जो शायद यह जीवन रहते कभी पूरी न हो,
लेकिन पता है मुझे,
तुम लौट आओगी,
यूँ बीच राह छोड़ना, आदत नहीं तुम्हारी,
चलो जल्दी आना,
मैं उसी गुमशुदा शहर के,
एक भूले हुए चौराहे पर अभी भी खड़ा हूँ,
जहाँ छोड़ गयी थी तुम,
मुझे, अपनी इत्र की भीनी खुशबु में,
मैं जब तक समझता की यह कोई पाठ नहीं,
तुम झर गयी थी बहते पानी की तरह,
मैं अब भी खड़ा हूँ,
उन पानी की बूंदों के साथ,
धुल उड़ाती सड़क की गुमशुदगी में,
तुम्हारी परछाईं खोजता हुआ।
-नीरज

21 जनवरी 2013

कुछ लोग


वह बैठी थी और वह हंस रहा था,
दोनों के बीच दूरियां ज्यादा नहीं थी,
शायद जानते भी न हों एक दूसरे को,
लेकिन वह लगातार हंस रहा था,
बस अड्डे के एक कोने से,
वह देख रही थी उसे/या नहीं/पता नहीं,
शायद न देखने का ही प्रयत्न कर रही थी,
कुछ लोग और खड़े थे,
शायद बस के इंतज़ार में,
वह अभी भी हंस रहा था,
कुछ लोग शायद बहरे थे,
या बन गए थे/या बहरे होने का नाटक कर रहे थे,
उसने कुछ बोला,
कुछ लोगों ने देखा(सुना या नहीं पता नहीं लेकिन उसकी ओर देखा),
उसने फिर कुछ बोला,
वह अब भी उसे नहीं देख रही थी,
बैठी हुई थी,
बस आई,
कुछ लोग उठे,
वह भी उठी,
वह आगे बढ़ा,
उसका दुपट्टा उसके हाथ में आया,
लेकिन वह बस में अन्दर आ चुकी थी,
उसका दुपट्टा बहार ही रह गया,
कुछ लोगों ने फिर देखा,
लेकिन वे चुप थे अब भी,
शायद मौन व्रत था उनका आज।
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वह उड़ने आई थी,
एक लम्बी उड़ान,
दौड़ना चाहती थी,
एक लम्बी दौड़,
कई जिंदगियां जीना चाहती थी,
इस एक ज़िन्दगी में,
उसका दुपट्टा भी उसकी ज़िन्दगी का,
एक हिस्सा था।
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कुछ लोग बस में पहले से थे,
उसे कहीं जाना था,
टिकट ले लिया उसने,
कंडक्टर ने टिकट देते समय,
उसे गौर से देखा,
हंसा भी( शायद कुटिल मुस्कान),
उसने कुछ नहीं बोला,
वह एक सीट पर चुपचाप बैठ गयी,
कुछ लोग उसे अब भी देख रहे थे,
वो बहरे नहीं थे,
बातें कर रहे थे,
उसे देखते हुए,
फिर वह उतर गयी,
लोग अब भी देख रहे थे,
कुछ लोग बाहर भी थे,
वे भी उसे देख रहे थे,
लेकिन उसने कुछ नहीं बोला,
चुपचाप अपने घर चली आई,
दरवाज़ा बंद कर एक लम्बी साँस ली,
कुछेक आंसू धुलक गए थे,
उसके गालों पर,
यह आंसू भी,
उसकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा थे,
वह बी एक हिस्सा था उसकी ज़िदगी का,
और वो बहरे कुछ लोग भी।

- नीरज 

7 जनवरी 2013

गर्मी


आज अल सुबह,
ठंढ ने आकर लिहाफ खींचा,
कुछ आग जल रही थी अभी भी,
उसके अन्दर,
कुहासों के समंदर में,
बरसती हुई,
कुम्हलाई हुई ठंढ,
मुझसे मांग रही थी,
कंपकपाती हुई मेरी "गर्मी".

झप्प से गुजर गयी,
पीछे से आती हुई गाड़ी,
लेकिन आगे दिखी ही नहीं,
सफ़ेद लिहाफों ने घेर लिया था उसे,
कुछ "गर्मी" बाँटने के लिए।

-नीरज 

सालन.....

खाली कैनवास ठीक वैसा ही होता है,
जैसे कोरे कागज़,
जो चाहो लिख डालो,
जैसे गीली मिटटी,
जैसा चाहो रूप दे दो,
एक नयी रचना को निमंत्रण देता हुआ,
और उसके बाद की खुशियों में घुलता हुआ,
पर खाली कैनवास दर्द भी देता है,
सालता रहता है रह रह कर,
अगर कुछ रह जाये अधूरा, छूटा हुआ,
मिट्टी के महीन कणों सा,
किर्र किर्र करकर।

-नीरज

5 जनवरी 2013

गुमशुदा


उस शहर की पगडंडियां भले ही खो गयी हों,
तारकोल की कालिख में,
पर धूल अब भी याद करती हैं,
तुम्हारे पगों के निशान,
जो बना आई थी तुम उनके दिलों पर,
गिरती हुई ओस,
अब भी गुमती है,
तुम्हारे सांसों की गर्म एहसासों के बीच,
भले हो खो गयी हो वो,
खेतों की पुरवाई,
पछुआ अब भी तुम्हारी राह देखती है,
मिटते पैरों के निशानों में,
गुमशुदा नहीं है शहर,
न ही मिटा है,
बस खोज रहा है,
तुम्हारी भटकती हुई आँखों में,
अपने निशान।

-नीरज