कितना धूसर सा होता है समय, बिना बताये आता है और बिना बताये ही चला जाता
है, और इस सबके बीच जो संवाद बचे रह जाते हैं वो निरे धूसर ही होते हैं।
अभी ज्यादा वक़्त नहीं बीता है दिल्ली में हुई घटना को, लेकिन देखिये सब कुछ
धूसर हो चुका है, इतना धूसर कि जैसे वह सारी बातें किताबी होकर जिल्दों
में मढ़ दी गयी हैं, और आने वाला समय उसे इन जिल्दों से पढ़ेगा, अतीत का
सर्वनाश। असल में समस्या की जड़ यही है, जब कुछ होता है तो हम हाथों में
मशाल लिए, मोमबत्तियां लिए और जुलूस निकलकर अपने प्रतिरोध का प्रदर्शन तो
करते हैं लेकिन उसे जारी रखने का बूता हमारे अन्दर नहीं है, और तो और हम उस
समय ऐसी बातें करते हैं जैसा सारा का सारा लावा हमारे अन्दर ही बह रहा है,
जो अब दावानल बनकर जला डालेगा सारी व्यवस्था और फिर देखेगा जमाना हमारे
प्रतिरोध का असर। हालाँकि, इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस घटना ने
झिन्झोरकर रख दिया हमें और हम जगे भी, आशु गैस के गोलों में, पुलिस की लाठी
में, इंडिया गेट पर, रायसीना हिल्स पर, दिखा हमारा प्रतिरोध पूरे जोशो
खरोश के साथ, लेकिन उन्ही दिनों कुछ ऐसी घटनाएं भी हुई जिनकी चर्चा न तो
मीडिया में हुई और न ही उन्हें इतना तवज्जो दिया गया, कारण हम दिखावे में
मरते हैं, हमें पसंद है टीवी में दिखना, रिपोर्टरों की माइक के सामने अपने
गुस्से का इज़हार करना, रिपोर्ताजों में अपना नाम देखकर हमें कितनी ख़ुशी
होती है, यह हमसे बेहतर कौन जानता है। मेरे एक मित्र ने जंतर मंतर पर बोले
अपने भाषण को बाकायदा फिल्म बनाकर फेसबुक पर टैग्स के साथ इज़हार कर रहे थे
अपने जागरूक होने का, हद तो तब हो गयी जब उनके इस कृत्य का अन्य मित्रों
में पूरी गरमजोशी के साथ स्वागत किया, साथी हम साथ हैं, साथी हम लड़ेंगे
जैसे शब्द हर नेटवर्किंग साईट पर ग़ज़ल की तरह गूँज रहे थे, लेकिन कब तक? कब
तक? फिर चली गयी दामिनी(उसका असली नाम अब सबको पता है, लेकिन मुझे उसे
दामिनी कहने में ही सुकून मिलता है) और एक और हाहाकार मचा, कविताओं के भाव
ऐसे रो रहे थे की अब तो वो हो जायेगा जो आज तक नहीं हुआ, इस बीच न जाने
कितने अबलाओं की आबरू फिर लूट ली गयी, गाज़ियाबाद, छतीसगढ़, भोपाल, बनारस,
कोलकाता और दंतेवाडा में तार तार किया जाता रहा महिलाओं को, लेकिन उनकी
सुनने वाला कोई नहीं था, सब मशरूफ थे मीडियागिरी के दिखावे में, दिखने और
दिखाने के खेल में।
अभी ज्यादा दिनों की बात बात नहीं है जब बी एच यु
में विरोध कर रही लड़कियों के साथ सरेआम बदतमीजी की गयी लेकिन हममे से कितने
लोग जानते हैं इस घटना के बारे में, दबा दी जाती हैं ऐसी घटनाएं क्यूंकि
यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसके फुटेज टीआरपी बटोर सकें और न ही कुछ ऐसा हुआ
कि हम मोमबत्ती लेकर खड़े हो सकें इंडिया गेट और जंतर मंतर पर, असल में हम
इंतज़ार करते हैं कुछ होने का, और सही अर्थों में सिर्फ होने का नहीं बल्कि
कुछ ऐसा होने का जिसमें दिखा सकें हम अपना चेहरा, अपनी विद्रूपता और हो
सकें प्रशिद्ध, अब इस प्रसिद्धि की कीमत चाहे जो हो। मुझे समझ में नहीं आता
कि किस भेंड चाल में दौड़ रहे हैं हम, हम यह क्यूँ नहीं समझते की उपदेश
देने से काम नहीं चलने वाला तब तक जब तक कि वह उपदेश हम स्वयं की
ज़िन्दगी में न ढालें, नारी अधिकारों पर बातें करने वाले बड़े बड़े बुद्धिजीवी
अपनी बुद्धिमता छोड़कर छिछोरेपन पर उतर आते हैं, जब बात उनके अपने पर आ
जाती है, सारे नारी विचार धरे के धरे रह जाते हैं। हम बात करते हैं नारी
अधिकारों की लेकिन उसे अपने पैर की जूती ही समझते हैं, अब यह दीगर है की
इसे समझने के तरीके को हमने थोडा विस्तार दे दिया है।
मेरे एक परिचित की
लड़की को एक दूसरी जात का लड़का पसंद आ गया, भाई साहब पढ़े लिखे हैं और बड़े
ही संभ्रांत परिवार से ताल्लुक हैं, लेकिन यह बात लग गयी उन्हें, भला उनकी
लड़की कैसे ऐसा कर सकती है, सारी पढाई, सारे संस्कार उसी वक़्त ख़तम हो गए,
अधिक बात करने पर उन्होंने जो खुलासा किया वह उनकी सोच को और निखार देता
है, अगर लड़का होता तो बात चल भी जाती लेकिन लड़की का मामला है, सारे समाज
में नाक कट जाएगी, किसी को मुह दिखाने लायक न रहेंगे। यह सोच सिर्फ उनकी
नहीं बल्कि हमारे बीच के बहुत सारे समाजवादियों की भी है, जो लड़कियों को आज
भी बोझ ही समझते हैं, जब तक यह सोच रहेगी, ऐसी घटनाएं धूसर ही होती
रहेंगी।
-नीरज