कहाँ चली गयी तुम यूँ,
नए नए करतब सिखा के मुझे,
अभी बाकी है बहुत कुछ सीखने को मुझे,
जो शायद यह जीवन रहते कभी पूरी न हो,
लेकिन पता है मुझे,
तुम लौट आओगी,
यूँ बीच राह छोड़ना, आदत नहीं तुम्हारी,
चलो जल्दी आना,
मैं उसी गुमशुदा शहर के,
एक भूले हुए चौराहे पर अभी भी खड़ा हूँ,
जहाँ छोड़ गयी थी तुम,
मुझे, अपनी इत्र की भीनी खुशबु में,
मैं जब तक समझता की यह कोई पाठ नहीं,
तुम झर गयी थी बहते पानी की तरह,
मैं अब भी खड़ा हूँ,
उन पानी की बूंदों के साथ,
धुल उड़ाती सड़क की गुमशुदगी में,
तुम्हारी परछाईं खोजता हुआ।
नए नए करतब सिखा के मुझे,
अभी बाकी है बहुत कुछ सीखने को मुझे,
जो शायद यह जीवन रहते कभी पूरी न हो,
लेकिन पता है मुझे,
तुम लौट आओगी,
यूँ बीच राह छोड़ना, आदत नहीं तुम्हारी,
चलो जल्दी आना,
मैं उसी गुमशुदा शहर के,
एक भूले हुए चौराहे पर अभी भी खड़ा हूँ,
जहाँ छोड़ गयी थी तुम,
मुझे, अपनी इत्र की भीनी खुशबु में,
मैं जब तक समझता की यह कोई पाठ नहीं,
तुम झर गयी थी बहते पानी की तरह,
मैं अब भी खड़ा हूँ,
उन पानी की बूंदों के साथ,
धुल उड़ाती सड़क की गुमशुदगी में,
तुम्हारी परछाईं खोजता हुआ।
-नीरज

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