गूगल से साभार
आज तुमसे बात करते हुए ऐसा लगा,
जैसे फिर से कहीं किसी कोने में,
जाग गयी हो तुम,
अपने उन्ही सवालों का हल खोजते हुए,
जिन्हें लेकर तुम गुम हो गयी थी,
पगडंडियों के सहारे,
उस गुमशुदा शहर की,
गुमशुदा गलियों में।
आज फिर ऐसा लगा
जैसे पगडंडियों न फिर से देखने शुरू कर दिए हैं,
तारकोल की काली सड़कों में,
तब्दील होने के सपने।
हाथ की रेखाओं की खींचतान सी फैली,
पगडण्डी ने अपनी आखें,
तुम्हारी आँखों में फिर से डाल दी हैं,
और उसके सपने,
अब तुम्हारी आँखों में भी
नुमायाँ होने लगे हैं,
मुझे डर नहीं है,
न ही तुम्हारे सपने से,
न ही सवालों से,
डर है तो केवल इस बात का,
कि कहीं,
तुम फिर से गुमशुदा न हो जाओ,
जैसे तारकोल की कालिख में लिपटी सड़क बनने के बाद,
गुमशुदा है,
आज पगडंडियां,
और गुम है धूल से भरे मंजर,
हौसलों की बिखरी गर्द,
ठीक वैसे ही,
जैसे हाथ की रेखाओं में गुमशुदा,
पानी का कतरा।
-नीरज

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें