29 जनवरी 2013

शैक्षिक दखल

बचपन की कुछ यादें आज भी वैसी ही हैं जैसे बचपन अभी जस का तस हो, वही स्कूल वही माटर जी जो साइकिल पर चढ़कर बच्चों को पढ़ाने आया करते थे और शुरू होती थी पाठशाला किसी भी पेंड के नीचे तकथी और खड़िया के साथ। मेरे लिए यह दृश्य बड़ा नायाब होता था, मेरा भी मन करता था तकथी और खड़िया लेकर पेंड के नीचे बैठ कर पढने का और जोर जोर से चिल्लाकर ककहरा पढने को, लेकिन यह सिर्फ मेरे सोच में ही रह गयी क्यूंकि जब भी मैं उस स्कूल में पंहुचता था माटर जी के साथ साथ बच्चे भी चुप हो जाते थे, और यूँ देखने लगते थे जैसे किसी दूसरे ग्रह का प्राणी अपनी डरावनी सूरत लेकर खड़ा हो गया है, लेकिन यह एहसास सिर्फ पल भर का ही होता था क्यूंकि माटर जी स्वयं मेरे पास आकर इस तरह नतमस्तक होते थे जैसे मैं उनसे भी बड़ा शिक्षक होऊं, फिर शुरू होता था गुणगान शहरी शिक्षा का और मेरा इतना बखान होता था की स्वयं शिक्षा की देवी सरस्वती भी नतमस्तक हो जायें, और सारे बच्चे शाम होते ही शहर के मेरे स्कूल के बारे में पूछने मेरे पास पहुँच जाते थे और मेरा बालमन समय से पहले ही प्रौढ़ हो जाता था। खैर, आप सोच रहे होंगे कि मैं यह कौन सा विषय लेकर बैठ गया, असल में महेश पुनेठा जी के माध्यम से शैक्षिक दखल का पहला अंक प्राप्त हुआ है और अनजाने में ही सही बचपन में गाँव की यह यादें अनाहूत मन मस्तिष्क में अपना डेरा जमती चली गयीं, तबसे लेकर आज तक कितना समय बीत चुका लेकिन आज भी रूककर अगर एक बार पीछे मुड़कर देखता हूँ तो कुछ बदला हुआ नहीं मिलता, शिक्षा और शैक्षिक स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है, वैसे यहाँ यह बता दूँ कि बात गाँव की शिक्षा से शुरू हुई है लेकिन मैं उसे गलत या हेय नहीं कह रहा, असल में शिक्षा कहीं भी सही तरीके से नहीं हो रही, फिर चाहे वह गाँव हो या फिर शहर, सिर्फ ककहरा और बेसिक जानकारी को शिक्षा का नाम नहीं दिया जा सकता, शिक्षा असल में बंधनों से मुक्त करने वाली होनी चाहिए(सा विद्या या विमुक्तये), जहाँ ग्रामीण शिक्षा
में बंधनों का ज्ञान ही नहीं कराया जाता वहीँ सहरी शिक्षा इतने वन्धनों से बांध देती है कि सुलभ बाल मन का समय से पहले ही अंत हो जाता है, पाठ्य पुस्तकों की बढ़ती भीड़, होम वर्क का बोझ, यदा कदा बाल मन को इतना झिंझोर देता है कि फिर कुछ रचनात्मकता बची ही नहीं रह जाती, और रचनात्मकता की जगह विनाशात्मकता घर करती है जिसका उदाहरण हमें आये दिन मिलता रहता है। या तो हमने शिक्षा का भारतीय दृष्टिकोण बदल दिया है, या फिर हम एक ऐसी शिक्षा की तरफ भाग रहे हैं जहाँ गला काट प्रतियोगिता का वर्चस्व है, और यह वर्चस्व बड़ों के लिए कुछ मायने में अगर सही है तो बच्चों के लिए हर मायने में गलत, क्यूंकि ऐसी स्थिति में रचनाधर्मिता का अंत हो जाता है, या फिर यूँ कहें कि स्वतंत्रा की परिभाषा में स्वतंत्रता का अवर्गीकरण।
और उपरोक्त स्थिति में शैक्षिक दखल का प्रवेशांक एक नयी रह खोलता है, महेश पुनेठा और दिनेश कर्नाटक जी के संपादन में पत्रिका अपना पूरा प्रभाव छोडती है, शैक्षिक परिचर्चा जहाँ दिमाग की गिरहें खोलती हुई स्वतंत्रता और स्वछंदता का प्रभावपूर्ण परिभाषण करते हुए रचनाधर्मिता का एक नया सोपान रचती है, वहीँ मोहन श्रोतिय जी का कविता के भविष्य पर प्रभावपूर्ण लेख गहरे पैठ बनाता है। दिनेश कर्नाटक जी का लेख वर्त्तमान परिदृश्य में शिक्षा की विसंगतियों और विडम्बनाओं की पोल खोलती है। लेकिन कहीं कहीं पर यह एहसास अपने आप ही घर कर जाता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इस पत्रिका के माध्यम से शिक्षकों को ज्यादा तरजीह दी जा रही हो वह भी उस समय में जब अधिकतर विद्यालयों में शिक्षक सबसे ज्यादा मजाखोरी कर रहा है(लेकिन यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि यहाँ बार बार उसी शिक्षक की बात की जा रही है जो अपने कर्त्तव्य को समझता है और उसके पालन में उसे किस अवरोध का सामना करना पड़ रहा है,अच्छा होता की इस अवरोध को और भी सशक्त तरीके से रखा जाता।) , आज जबकि समाज को एक कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक की आवश्यकता है ऐसे समय में वर्तमान शिक्षक कहीं न कहीं फीके ही नज़र आते हैं, और इसका सबसे बड़ा कारण वर्तमान समय में शिक्षा को एक ढोय की संज्ञा से परिभाषित करना है, आज शिक्षा इसलिए जरुरी नहीं की वह ज्ञानार्जन है और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने का जरिया वल्कि इसलिए कि यह कैसे धनार्जन में सहायक हो, और इस परिदृश्य में ऐसे शिक्षकों की बाढ़ आ गयी है जो शिक्षक कम बल्कि व्यापारी ज्यादा हैं। शमशाद जी की कहानी टोलम ऐसे अनेकों पात्र पुनः जीवित कर देती है जो हमारे बचपन के अभिन्न अंग रहे हैं, औए साथ ही विचारों को झकझोरते हुए अनेकों सवाल पूछ जाते हैं की ऐसे टोलम भला बनते कैसे हैं औए इनके जिम्मेदार कौन हैं? खजान सिंह जी की कहानी ऐसे अनेकों सवाल पूछती है जो हमारे अन्दर कबसे बंद पड़ी हैं लेकिन उन्हें शायद शब्द न मिल रहे हों, खजान सिंह भाई को इसके लिए अत्यन्त बधाई। कुल मिलाकर शैक्षिक दखल का यह प्रवेशांक अपने उद्देश्य में सफल हुआ है और आशा है कि अन्य अंक भी इसी परम्परा का निर्वाह करेंगे।

-नीरज




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