30 जनवरी 2013

गुमशुदा तलाश


हर बार हो जाती हो तुम गुमशुदा,
कभी प्रेम के बनाये सामंती पन्नों में,
तो कभी संदेह की उग आई नागफनी में,
और मैं ढूंढता ही रहता हूँ तुम्हे,
गुम गयी गलियों में,
धूल उड़ाती सड़कों पर,
कभी कभी पूछ आता हूँ तुम्हारा पता,
सपने में आने वाली उस परी से भी,
जो बिलकुल तुम्हारी ही तरह दिखती है,
खंगालता आता हूँ डायरी के तुम्हारे पन्ने,
जो अब पीले पड़ गए हैं,
तुम्हारी याद में,
टांकने बैठ जाता हूँ शर्ट के टूटे हुए बटन,
जो तुमने तोड़े थे मेरी आगोश में लिपट के,
और तुम्हारी सांसे फिर,
ताज़ा होकर महकने लगती हैं,
गमले में खिल आये बेला की पंखुड़ियों में,
गुलाब और भी गुलाबी हो जाता है,
तुम्हारी यादों की महकती रोशनायी से,
लेकिन मैं वहीँ रह जाता हूँ,
सपनों के भंवर में फंसा हुआ,
करता गुमशुदा तलाश।

-नीरज

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी .बेह्तरीन अभिव्यक्ति शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
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