10 मार्च 2014

रतजगा

सुबह सुबह तुम्हारे ही मेसेज का इंतज़ार रहता है, तुम्हे पता है, फिर भी तुम नहीं करती, इंतज़ार करती रहती हो पहले मेरे मेसेज का, तब तुम रिप्लाई करती हो, क्यूँ करती हो तुम ऐसा? क्या तुम भी सुबह का इंतज़ार मुझ जैसे ही करती हो, क्या तुम भी स्मृतियों के द्वार रोज़ खोलती हो, क्या तुम भी बहाती हो आँसू मुझे याद करके, शायद हाँ, लेकिन फिर स्मृतियों को क्यूँ नहीं प्रेषित करती तुम मुझसे पहले, क्यूँ जागती रहती हो रात भर मेरा इंतज़ार करते हुए, शायद जागने को तुमने एक शगल बना लिया है, या फिर मैं यह समझ लूँ  कि प्रेम की यह भी एक परिभाषा है, या फिर प्रेम के दृष्टिकोण मेरे और तुम्हारे अलग अलग हैं,कुछ भी हो, मुझे प्रेम से मतलब है ना कि उसके दृष्टिकोण से. तो फिर एक बात बताओ तुम्हारा प्रेम मौन क्यूँ रहता है, मुखर क्यूँ नहीं होता?

सुबह होने वाली थी, वह हाथ में टैब लिए खिड़की की ओट के सहारे आसमान को निहार रही थी, व्हाट्सएप्प को बार बार खोलती थी, वह ऐसी लड़की नहीं जो कि मेसेजिंग बार बार करती हो या दिन भर किसी साइट पर ऑनलाइन रहे और बेकार की इधर उधर की बातें करें, उसे सिर्फ रात का इंतज़ार रहता है क्यूंकि रात में ये सारे सोशल मीडिया के साधन हमारी बातचीत में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वह इंतज़ार रात का नहीं, मेरा करती है, मेरे मेसेजेस का , एक हलकी सी आवाज़ पर भी उसके कान खड़े हो जाते हैं कि कहीं कोई मेसेज तो नहीं आया? लेकिन आज मेरा मेसेज नही आया, वह रात भर फेसबुक और व्हाट्सएप्प को खंगालती रही कि क्या पता मैं कहीं दिख जाऊं, उसने मुझे कॉल करने की भी कईयों बार कोशिश की लेकिन मेरा फ़ोन न उठना था, न उठा, वह बेचैन थी, हज़ारों ख्याल बन बिगड़ रहे थे, लेकिन सब बेकार, मुझसे बात नहीं हुयी उसकी, थक हार के खिड़की के पास खड़ी हो गयी, आसमान लाल होने लगा था, रात के निशान धीरे धीरे मिटने लगे थे, स्टेशन पर लोगों की चहल पहल बढ़ने लगी थी, टिकट खिड़की पर कतारें लगने लगी थी, और वह टैब को रह रह कर निहार लेती थी, एक मेसेज चमका, "गुड मॉर्निंग, लव यू!" और उसके होठ सिहर उठे , उसने जवाब देना चाहा लेकिन नहीं दिया, दिन भर की सारी व्यस्तताएं उसके आगे पीछे लाइन लगा कर खड़ी होने लगीं लेकिन आँखों में जम चुकी नींद का क्या? उसने एक बार फिर आसमान को देखा, एक गाडी हॉर्न बजती हुई स्टेशन छोड़ चुकी थी, उसकी पलकों से एक आंसूं चुपके से ढुलक गया, टैब को ऑफ करके उसने एक बार बिस्तर को देखा, अब सिलवटें नहीं पड़ती, दिल एक बार जोर से धड़का, उसने फोन उठाया और टाइप करने लगी " नहीं रहना मुझे यहाँ, नहीं अच्छा लगता, बस." 


गुलाब के फूल बिस्तर पर रखे थे, एक कैंडल जला रखी थी, उसकी बड़ी याद आ आरही थी. खाना किसी तरह खाया, फिर फ़ोन को देखने लगा, आज टाइप करने का दिल नहीं कर रहा था, बात हो चुकी थी, थोड़ी लड़ाई भी, मन में अजीब अजीब से ख्याल आ रहे थे, यह लॉन्ग डिस्टेंस का प्यार भी, लेकिन प्यार तो प्यार होता है, भावनाओं के उफान में तैरता, डूबता उतराता कोई ना कोई मंजिल तो पा ही लेता है, लेकिन मेरा प्यार , यह मंजिल के बिलकुल करीब खड़ा था, बस दरवाज़े को हल्का सा धकेलना भर था. अनेकों उथल पुथल चल रहे थे, कभी कैंडल को देखता, कभी गुलाब को और हाथों में थमे फोन को फिर अनलॉक कर लेता कि क्या कोई मेसेज आया है, कोई मेल, कोई पिक्चर...........कुछ भी नहीं, ना आना था, ना आया. आखें बार बार कमरे में टंगी उसकी तस्वीर पर जाकर रुक जाती थी, बड़ी मुश्किल से उससे ये पोज़ दिलवाया था, छोटी छोटी उसकी आँखें बड़ी हो गयी थीं, ऐसा लगता था जैसे मुझसे घूर घूर कर पूछ रहीं हों "नहीं करोगे ना तुम मेसेज, इंतज़ार कर रही हूँ मैं". हाथ फिर बढ़ जाते फोन की तरफ लेकिन ईगो, उसका क्या करूँ? हमेशा मैं ही तो करता हूँ, नहीं करूँगा आज, आज पहले तुम करोगी तब ही मैं करूँगा, हर छोटी छोटी बात का बतंगड़ बना देती हो, एक सिगरेट जला ली और छत को घूरने लगा, धुएं में भी उसी का चेहरा नुमायाँ हो रहा था, उफ़ ये प्यार भी भला क्यूँ होता है? अगर भगवान, खुदा, मसीह आज मिल जाते तो जरूर पूछ लेता कि भाई ऐसी क्या दुश्मनी थी कि भावनाओं को जगाते रहते हो? बता दो और छोडो ये बता दो कि भावना नाम की चिड़िया को तुमने उपजाया ही भला क्यूँ? क्या उसके बगैर दुनिया नहीं चलती और अगर नहीं भी चलती तो उसमे प्यार के अणुओं को क्यूँ डाल दिया? बहुत देर तक यूँ ही अनाप शनाप बकता रहा, रात ढलती जा रही थी लेकिन नींद आँखों से कोसों दूर थी, वह तो फ़ोन महाराज के पास जाकर बैठी हुई थी और दिल वहां उसके पास धड़क रहा था, अजीब सी पेशोपेश में था. पौ फटने लगी थी, सूरज रात को धकियाने लगा था, तारे गायब होने लगे थे, चहल पहल बढ़ने लगी थी, लोग उठ चुके थे लेकिन मैं तो सोया ही नहीं तो भला उठने का क्या फायदा, फिर एक बार फोने को देखा, कैंडल को देखा जो बुझ चुकी थी, गुलाब सांसें लेने लगा था, रहा नहीं जाता तुमसे तो क्यूँ करते हो ऐसे, अगर मेसेज कर के भेज दोगे तो कौन सी नाक कट जाएगी तुम्हारी, फोन उठा के टाइप करने लगा और भेज दिया उसे, दिल में एक अजीब सी राहत नुमायाँ हुई, जैसे बचपन में गाँव में किसी झोपडी की दीवाल पर लटकी हुई सीढ़ी को देखकर होती थी, बड़ा अजीब है, लेकिन मेरे साथ ऐसा ही होता है, फिर से उसकी तस्वीर पर नज़रें टिक गयीं और होठों पे एक हंसी आ गयी, बुदबुदा बैठा "आई लव यू". और बिस्तर को देखकर अपने हाथ पैर जोर से मारने लगा, चद्दर की सिलवटों को देखा और कहा "तुम रात भर मेरे साथ थी फिर भी कुछ नहीं कहा सिर्फ देखती ही रही, गन्दी लड़की". अपने सोचों में गुम था कि आखिरकार मेसेज आ ही गया "नहीं रहना मुझे यहाँ, नहीं अच्छा लगता,बस". बाहर निकल कर कुछ सोचने लगा, क्या सोचा पता नहीं, लेकिन अभी भी नहीं निकल पाया हूँ उस रात से, वैसी ही जगी हुई है मेरे अन्दर कभी ना सोने के लिए.

- नीरज

चित्र साभार: के डी सिंह चौहान


प्रेम


तुम्हे जाना था, चली गयी,
मुझे अभी रुकना है प्रिय,
मुझे झेलने हैं अभी बहुत कुछ,
तुम्हारी आँखों से ढुलका वह आंसूं सब कुछ राख कर चूका है,
तुम्हे निहारती आँखों ने अपने आगोश में ले लिया है,
तुम्हे शायद कोई कन्धा मिल जाये प्रिय,
जिसपे तुम अपने सिर को रख कर रो सको,
मुझे अभी खेलना है इस राख से,
इसकी भभूती मुझे जीवित रखेगी,
युग युगांतर तक,
दुखों के अनेको युग देखने के लिए,
मुझे ढूंढनी है अभी वह गुफा,
जहाँ जाकर मैं अपने प्रेम की तिलांजलि दे सकूँ,
जहाँ मुझे अपना प्रेम सुरक्षित दिखाई दे,
घायल और लथपथ ही सही,
लेकिन ह्रदय की धमनियां उसे इतना रक्त दे सकें,
कि वह देख सके मेरे साथ, दुखों के अनेकों युग,
प्रेम को सिसकते हुए, मरते हुए, आहें भरते हुए,
वह देख सके मेरे साथ,
मेरी आँखों में बहता तेज़ाब.

तुम अब दुखी मत होना प्रिय,
ना ही जगाना अपनी रातों को,
मत करना मुझे याद, जब बत्तियां बुझ जायें,
ना ही डूबते हुए सूरज को देखकर,
क्षितिज में अपनी आहें डालना,
क्या पता तुम्हे मैं इसीलिए मिले था कि,
तुम जान सको की मुझसे बेहतर भी कोई है इस संसार में,
मुझे कोई राग या द्वेष नहीं है प्रिय,
क्यूंकि तुमसे बेहतर मेरे लिए कोई नहीं है,
फिर भी मैं प्रेम की धुनी रमाऊंगा,
तुम ना सही, तुम्हारे यादों की चिलम जलाऊंगा,
और उसधुएं से वही संसार बनाऊंगा, जो तुम्हे प्रिय था,
अंधेरों और ओट का प्यार, बनावटी दुनिया से छिपा हुआ इकरार,
बेमतलब की सामाजिकता का प्यार,
सिसकती टूटती रश्मों रिवाजों वाला प्यार प्रिय,
मैं फिर से पाषाण बनने को तैयार हूँ,
बस तुम खुश रहना,
तुम्हारे आंसुओं को मैंने रख लिए हैं, जब समंदर का खारापन कम हो जायेगा,
तब डाल दूंगा उसे समंदर में, मुझे ना सही,
कईयों को जीवनदान मिल जायेगा प्रिय.

क्षितिज सिमटने लगा है,
मैं देख रहा हूँ तुम्हे, मेरी आँखें मुदने लगी हैं,
डूबते हुए सूर्य की लालिमा में मैं देख सकता हूँ, तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में,
मेरा हाथ तुम्हारे हाथों में, हम दोनों को एक साथ,
सूर्य रुक जाओ जरा, अपने अश्वों को रोक लो,
रुक जाओ समय, कि शायद प्रेम अभी बाकी है.

- नीरज


चित्र साभार: के डी सिंह चौहान

9 मार्च 2014

बक बक, कुछ ऐसा भी

स इतनी सी कहानी है मेरी, एक प्रेयसी जो मुझसे दूर है, एक घर जिसे छूटे सालों गुजर गए, कुछ दोस्त जो अब अपनी दुनिया में सिमट चुके हैं. समय के पहिये चलते रहते हैं, कौन रोक सका है इन्हें, फिर मैं क्या चीज़ हूँ? लेकिन कुछ तो है जो जीने को कहता रहता है, शायद कोई आग? आग ही कह लीजिये, जब तक जलती है, जलाती है, मारती है लेकिन ज़िन्दगी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा भी वही बनती है, तो शायद यह आग ही है जो सीने में धधक रही है और जीने को उकसाती रहती है. किसी ने कभी कहा था कि जीवन पानी का बुलबुला है, मुझे भी लगता है यह बुलबुला ही है, लेकिन वो नहीं जो बनते ही भद्द से फूट जाये, लेकिन वह बुलबुला जो ऊपर उठता जाता है, उठता जाता है, आकाश की तरफ और फूटता तब है, जब हवा का दबाव उसे चारो तरफ से घेर लेता है, सांसें रोकना चाहता है वो, रोकता भी है और वहीँ वह फूटता है, इसलिए नहीं कि टना उसकी नियति है बल्कि इसलिए क्यूंकि उसकी आग शुन्य हो जाती है, उसकी रुकी हुई साँस एक शुन्य का क्षितिज बनती है, और शून्य फिर जीने कहाँ देता है.
चार बजने वाले है, दोपहर कितनी तेजी से गुजर गया पता भी ना चला, वैसे ही जैसे दिन, महीने, साल कितनी तेजी से गुजर गए, बचपन कब फिसला और जवानी की दहलीज ने अपने पांव कब पसार के लम्बे कर लिए, पता भी नहीं चला, और बीता हुआ समय यादों के जंगल का एक हिस्सा बन गया, ऐसा हिस्सा जो जब तब दावानल बन जाता है, और उसकी राख उड़ उड़ कर हर तरफ फ़ैल जाती है, फिर बारिश का पानी भी नहीं धुल पता उन्हें, जंगल के पत्ते उस राख में ऐसे लिपटे रहते है जैसे जन्म-जन्मान्तर का रिश्ता हो, शायद है भी ऐसा, नहीं तो दावानल, राख और जंगल जैसे शब्दों की उत्पत्ति ही कहाँ से होती. कहाँ से इस छोटे से दिमाग में इतने ख्याल उपजते, इतने रहस्यों का निर्माण कहाँ से होता, समय इतनी गुलातियाँ अहन से लगाता और बंदर की तरह उछल उछल कर पल भर में ओझल कैसे हो जाता?
एक कहानी लिखने का मन हो रहा है, लेकिन क्या लिखूं, इतनी कहानियां तो बिखरी पड़ी है, फिर भला मेरी कहानी कुछ खास होगी क्या? क्या पता हो भी सकती है, जंगल वाली लड़की क्या पता अपनी कहानी छोड़कर मेरी कहानी में आकर बस जाए, इग्लू में रह रहे हिम मानव क्या पता , रेतों पे स्केट करते हुए भरी गर्मी में फर वाले कपडे पहने हुए बर्फ उड़ाते मेरी कहानी के कुएं का पानी पीने चले आयें, उससे भी कुछ ना हो तो क्या पता सबरी की कुटिया के जूठे बैर ही मांग लें, द्रोपदी के बर्तन का एक चावल ही ले लें और खाते रहे फिर सालों साल, और वो लड़की एकटक देखती रहे मुझे प्रेम भाव में और मैं समझ बैठूं कि यह उसके प्रणय निवेदन का तरीका है, फिर क्या पता निकल आये मेरी भी कहानी में कुछ दैत्य, कुछ लोग, और एक भरा पूरा समाज, विश्व, और मैं उन सामाजिक यातनाओं में हो रहे प्रणय के इस निवेदन में पीट दिया जाऊं, और अस्पताल की एक टूटी चारपाई पर बंद आँखों से सखी सैयां गाने को बुदबुदाता रहूँ, और मेरी भी कहानी को बुकर और ऑस्कर मिल जाए, सपने अछे हैं लेकिन कहानी अभी भी नदारद है, बोलने से कहानी नहीं बनती सिर्फ बच्चे सोते हैं, क्यूंकि उन कहानियों के सिर और पांव नहीं होते, मेरे बचपन के थे शायद? क्या पता?

- नीरज

चित्र साभार: के डी सिंह चौहान 

8 मार्च 2014

औरत.......एक इल्ल्यूज़न


रत, जंगल में बहती नदी की तरह एक इल्ल्यूज़न, 
साफगोई से देखती है सब कुछ,
और समा लेती है अपने अन्दर जाने कितने दर्द, ख्वाब, ख्वाहिशें,
जीती रहती है, किसी न किसी की ख़ुशी में,
अपनी खुशियों को भूलते हुए,
बहती रहती है, पाषाण पर,
अपने निशान छोडती हुई,
और ज़ज्ब कर लेती है,
अपने हिस्से की ख़ुशी,
छलकती हुई हिलती परछाइयों में,
सिमटती हुई शिलाओं में,
जीवन देती हुई, जीवन दायिनी,
और हरा हो उठता है क्षितिज,
डूबते हुए सूरज की लालिमा में,
बनता इल्ल्यूज़न, बिगड़ता इल्ल्यूज़न,
हमेशा एक नया रूप लेता हुआ,
ढल जाती है औरत,
खुशियों को बांटते हुए,
भूल जाती है अपना दर्द,
मिट जाती है, बिखरती हुई,
कई नामों में, कई रिश्तों में,
अपना अक्स खोती हुई, एक इल्ल्यूज़न,
औरत...........तस्वीर बनती हुई,
खुशियाँ बांटती हुई,
एक नए इल्ल्यूज़न में तब्दील होती हुई,
एक नयी तस्वीर, एक नया अक्स,
जन्म से मृत्यु तक,
कई रिश्तों में, कई नामों में बंटती हुई, औरत.

========महिला दिवस की शुभकामनाएं मित्रों, आशा है यह तस्वीर बदलेगी, और बोलेगी, गाएगी नए गान, भरेगी नए उड़ान, छुएगी नए आकाश, डिकोड होगा यह इल्ल्यूज़न एक दिन, बदलेगा मानस एक दिन, हाँ एक दिन आएगा, जरूर आएगा, हम रहे न रहे, एक आस रहेगी, चिंगारी भड़की है तो आग जरुर बनेगी.


चित्र साभार - संदीप Sandeep Godkhindi

7 मार्च 2014

कल रात



ल रात सपने में, तुम्हे देखा,
देखता ही रहा,
बहता रहा तुम्हारी आँखों में,
और सुबह की ओस सा टपक गया,
एक आंसूं तुम्हारी आँखों से,
सम्भालना चाहा,
लेकिन आंसूं पत्ते की ओस जैसा फिसल गया,
मैं देखता ही रहा।
तुम ओझल होने लगी,
मैं चिल्लाता रहा, चिल्लाता रहा,
लेकिन तुम चली गयी,
स्वप्न के अंधकूप में, जैसे आयी थी,
पर तुम्हारी छवि अब अभी मेरी आँखों में तैरती है,
और पत्ता भीग जाता है,
रह जाती हैं,
कुछ बूँदें,
जिनका फिसलना अभी बाकी है,
लेकिन नमी,
वह नमी पत्ता ताउम्र सम्भाल कर रखेगा,
मेरी तरह.....।

- नीरज  

रात और ख़याल

रात जगाने पर आमादा थी और मैं सोने पर, पलकों के मुंदने मुंदने तक फिर से कुछ ख्याल जग जाते थे और पलकें झट से खुल जाती थी, जैसे नींद कभी आयी ही न हो. कई ख्यालों को सिरहाने सोने के लिए कहा लेकिन सब के सब गुटर गूं गुटर गूं गुटर गूं करते ही रहे, अंततः थक हार कर बैठ ही गया, लो जगा लो, मिल गयी कलेजे को राहत, क्या हुआ? अब क्यूँ नहीं बोलते, बोलो………… बोलो बोलो, सुन रहा अब, शास्त्रार्थ भी कर लो, अभी रात पूरी बाकी है, चार घंटे, बहुत होते हैं, क्यूँ है ना ? सारे ख्याल टुकटुकाते हुए मुझे देखने लगे, अभी तक जो शोर मचा हुआ था, जाने कहाँ गुम हो गया, बस झींगुरों के झिंगुरने कि आवाज़ ही आती रही, मैंने फिर पूछा, फिर पूछा, फिर फिर पूछा………………………………………लेकिन कोई जवाब नहीं, जवाब नहीं हुआ फेसबुक हो गया, अब बोलो क्या हुआ मियाँ ? अचकचाते हुए एक ख़याल आगे बढ़ा लेकिन पीछे के सारे ख्यालों ने उसे धकिया के पीछे कर दिया और सिर्फ पीछे ही नहीं किया बल्कि उसके ऊपर बैठ गए और वो बेचारा गूं गूं गूं गूं  करता ही रहा फिर कुछ देर में शांत पड़ गया, फिर वही नज़ारा, टुकटुकाते हुए देखने का, लेकिन बोलना कुछ नहीं, फेसबुक की तरह, हज़ारों सवाल लेकिन जवाब? ये न पूछो, भला किसी ने अपने पाँव कीचड़ में डालने का थोड़े ही शौक चर्राया है, सवाल पूछना था, राह तो वही चलनी है जो दिखाई देगी, भेंड़ बकरियों वाली, हज़ारों मोदी, लाखों केजरीवाल, लेकिन, लेकिन क्या? नयी राह खोजने की हिम्म्त है कहाँ, मुह में आया बक दिए, चलते रहो, अब समय कहाँ? मैं कहता हूँ तो फिर मियां रो क्यूँ रहे हो अगर देश को उसी के हाल पर छोड़ना है, जैसा चल रहा है, चलने देना है, तो दोषी कोई और क्यूँ, हम क्यूँ नहीं? खैर ख्याल कुछ देर में खुद ही ढ़ेर हो गए, रात सिसकने लगी थी, आसमान चलने लगा था और मैंने फिर से तकिये को पकड़ा और सर को दबाकर सो गया, सुबह ऑफिस जाना है भाई।

- नीरज़