सुबह सुबह तुम्हारे ही मेसेज का इंतज़ार रहता है, तुम्हे पता है, फिर भी तुम नहीं करती, इंतज़ार करती रहती हो पहले मेरे मेसेज का, तब तुम रिप्लाई करती हो, क्यूँ करती हो तुम ऐसा? क्या तुम भी सुबह का इंतज़ार मुझ जैसे ही करती हो, क्या तुम भी स्मृतियों के द्वार रोज़ खोलती हो, क्या तुम भी बहाती हो आँसू मुझे याद करके, शायद हाँ, लेकिन फिर स्मृतियों को क्यूँ नहीं प्रेषित करती तुम मुझसे पहले, क्यूँ जागती रहती हो रात भर मेरा इंतज़ार करते हुए, शायद जागने को तुमने एक शगल बना लिया है, या फिर मैं यह समझ लूँ कि प्रेम की यह भी एक परिभाषा है, या फिर प्रेम के दृष्टिकोण मेरे और तुम्हारे अलग अलग हैं,कुछ भी हो, मुझे प्रेम से मतलब है ना कि उसके दृष्टिकोण से. तो फिर एक बात बताओ तुम्हारा प्रेम मौन क्यूँ रहता है, मुखर क्यूँ नहीं होता?
सुबह होने वाली थी, वह हाथ में टैब लिए खिड़की की ओट के सहारे आसमान को निहार रही थी, व्हाट्सएप्प को बार बार खोलती थी, वह ऐसी लड़की नहीं जो कि मेसेजिंग बार बार करती हो या दिन भर किसी साइट पर ऑनलाइन रहे और बेकार की इधर उधर की बातें करें, उसे सिर्फ रात का इंतज़ार रहता है क्यूंकि रात में ये सारे सोशल मीडिया के साधन हमारी बातचीत में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वह इंतज़ार रात का नहीं, मेरा करती है, मेरे मेसेजेस का , एक हलकी सी आवाज़ पर भी उसके कान खड़े हो जाते हैं कि कहीं कोई मेसेज तो नहीं आया? लेकिन आज मेरा मेसेज नही आया, वह रात भर फेसबुक और व्हाट्सएप्प को खंगालती रही कि क्या पता मैं कहीं दिख जाऊं, उसने मुझे कॉल करने की भी कईयों बार कोशिश की लेकिन मेरा फ़ोन न उठना था, न उठा, वह बेचैन थी, हज़ारों ख्याल बन बिगड़ रहे थे, लेकिन सब बेकार, मुझसे बात नहीं हुयी उसकी, थक हार के खिड़की के पास खड़ी हो गयी, आसमान लाल होने लगा था, रात के निशान धीरे धीरे मिटने लगे थे, स्टेशन पर लोगों की चहल पहल बढ़ने लगी थी, टिकट खिड़की पर कतारें लगने लगी थी, और वह टैब को रह रह कर निहार लेती थी, एक मेसेज चमका, "गुड मॉर्निंग, लव यू!" और उसके होठ सिहर उठे , उसने जवाब देना चाहा लेकिन नहीं दिया, दिन भर की सारी व्यस्तताएं उसके आगे पीछे लाइन लगा कर खड़ी होने लगीं लेकिन आँखों में जम चुकी नींद का क्या? उसने एक बार फिर आसमान को देखा, एक गाडी हॉर्न बजती हुई स्टेशन छोड़ चुकी थी, उसकी पलकों से एक आंसूं चुपके से ढुलक गया, टैब को ऑफ करके उसने एक बार बिस्तर को देखा, अब सिलवटें नहीं पड़ती, दिल एक बार जोर से धड़का, उसने फोन उठाया और टाइप करने लगी " नहीं रहना मुझे यहाँ, नहीं अच्छा लगता, बस."

गुलाब के फूल बिस्तर पर रखे थे, एक कैंडल जला रखी थी, उसकी बड़ी याद आ आरही थी. खाना किसी तरह खाया, फिर फ़ोन को देखने लगा, आज टाइप करने का दिल नहीं कर रहा था, बात हो चुकी थी, थोड़ी लड़ाई भी, मन में अजीब अजीब से ख्याल आ रहे थे, यह लॉन्ग डिस्टेंस का प्यार भी, लेकिन प्यार तो प्यार होता है, भावनाओं के उफान में तैरता, डूबता उतराता कोई ना कोई मंजिल तो पा ही लेता है, लेकिन मेरा प्यार , यह मंजिल के बिलकुल करीब खड़ा था, बस दरवाज़े को हल्का सा धकेलना भर था. अनेकों उथल पुथल चल रहे थे, कभी कैंडल को देखता, कभी गुलाब को और हाथों में थमे फोन को फिर अनलॉक कर लेता कि क्या कोई मेसेज आया है, कोई मेल, कोई पिक्चर...........कुछ भी नहीं, ना आना था, ना आया. आखें बार बार कमरे में टंगी उसकी तस्वीर पर जाकर रुक जाती थी, बड़ी मुश्किल से उससे ये पोज़ दिलवाया था, छोटी छोटी उसकी आँखें बड़ी हो गयी थीं, ऐसा लगता था जैसे मुझसे घूर घूर कर पूछ रहीं हों "नहीं करोगे ना तुम मेसेज, इंतज़ार कर रही हूँ मैं". हाथ फिर बढ़ जाते फोन की तरफ लेकिन ईगो, उसका क्या करूँ? हमेशा मैं ही तो करता हूँ, नहीं करूँगा आज, आज पहले तुम करोगी तब ही मैं करूँगा, हर छोटी छोटी बात का बतंगड़ बना देती हो, एक सिगरेट जला ली और छत को घूरने लगा, धुएं में भी उसी का चेहरा नुमायाँ हो रहा था, उफ़ ये प्यार भी भला क्यूँ होता है? अगर भगवान, खुदा, मसीह आज मिल जाते तो जरूर पूछ लेता कि भाई ऐसी क्या दुश्मनी थी कि भावनाओं को जगाते रहते हो? बता दो और छोडो ये बता दो कि भावना नाम की चिड़िया को तुमने उपजाया ही भला क्यूँ? क्या उसके बगैर दुनिया नहीं चलती और अगर नहीं भी चलती तो उसमे प्यार के अणुओं को क्यूँ डाल दिया? बहुत देर तक यूँ ही अनाप शनाप बकता रहा, रात ढलती जा रही थी लेकिन नींद आँखों से कोसों दूर थी, वह तो फ़ोन महाराज के पास जाकर बैठी हुई थी और दिल वहां उसके पास धड़क रहा था, अजीब सी पेशोपेश में था. पौ फटने लगी थी, सूरज रात को धकियाने लगा था, तारे गायब होने लगे थे, चहल पहल बढ़ने लगी थी, लोग उठ चुके थे लेकिन मैं तो सोया ही नहीं तो भला उठने का क्या फायदा, फिर एक बार फोने को देखा, कैंडल को देखा जो बुझ चुकी थी, गुलाब सांसें लेने लगा था, रहा नहीं जाता तुमसे तो क्यूँ करते हो ऐसे, अगर मेसेज कर के भेज दोगे तो कौन सी नाक कट जाएगी तुम्हारी, फोन उठा के टाइप करने लगा और भेज दिया उसे, दिल में एक अजीब सी राहत नुमायाँ हुई, जैसे बचपन में गाँव में किसी झोपडी की दीवाल पर लटकी हुई सीढ़ी को देखकर होती थी, बड़ा अजीब है, लेकिन मेरे साथ ऐसा ही होता है, फिर से उसकी तस्वीर पर नज़रें टिक गयीं और होठों पे एक हंसी आ गयी, बुदबुदा बैठा "आई लव यू". और बिस्तर को देखकर अपने हाथ पैर जोर से मारने लगा, चद्दर की सिलवटों को देखा और कहा "तुम रात भर मेरे साथ थी फिर भी कुछ नहीं कहा सिर्फ देखती ही रही, गन्दी लड़की". अपने सोचों में गुम था कि आखिरकार मेसेज आ ही गया "नहीं रहना मुझे यहाँ, नहीं अच्छा लगता,बस". बाहर निकल कर कुछ सोचने लगा, क्या सोचा पता नहीं, लेकिन अभी भी नहीं निकल पाया हूँ उस रात से, वैसी ही जगी हुई है मेरे अन्दर कभी ना सोने के लिए.
- नीरज
चित्र साभार: के डी सिंह चौहान





