रात के ढाई बज चुके हैं, घड़ी की सुई फिर भी नहीं थमती है, सड़कें लैंपपोस्ट की रोशनी मे नहायी हुयी हैं, पीली रोशनी का आतंक सड़कों को अपने मोहपाश मे जकड़ चुका है। सड़कें फिर भी काली हैं, जैसे रोशनी को चिढ़ा रही हों कि मोह भले चाहे जितना हो, अंतः और सतह जस के तस रहते हैं। उपर आसमान का कालापन बढ़ जाता है, चाय की चुस्की मन मे चल रहे झंझावातों को थोड़ा सा शूकून देती है। चेहरे की किताब पर एक टिप्पणी आती है। मतलब मैं अकेला नहीं जगा हुआ हूँ, लेकिन कुछ देर मे ही यह खुशी टूटने लगती है, बड़े होने का दायित्व हिलोरे लेने लगता है, अमल अभी तक जगा है? पूछता हूँ, फिर रहा नहीं जाता, फ़ोन कर लेता हूँ, इधर उधर की बातों को करते हुए उसे सोने की हिदायत देता हूं, फोन रख देता हूं। सड़क की उदासी बढ़ने लगती है, कैब वाला भी एक किनारे चाय पी रहा होता है। सामने दो बाइक हैं, उन पर दो लड़के, अपनी नौकरी की तैयारी मे हैं, उनका नाम पूछता हूँ फिर भूल जाता हूँ। ऑस्ट्रेलिया की शिफ्ट है उनकी, रात के समय से कल दोपहर तक नौकरी से उनकी मार काट चलती रहेगी, दूसरे की भाषा में गिट्ट पिट्ट करते हुए वह अपना पेट पाल लेते हैं। सामने कैब वाला हंसते हुए मेरी तरफ देखता है, सोचता हूँ कि 200 स्क्वेयर फीट मे छह लोग कैसे रह लेते हैं, एक कमरा और एक रसोईघर, साझा बाथरूम...... फिर अपने आपको देखता हूँ और ऊपर आसमान को देखते हुए भगवान का शुक्र बजाता हूं। आप भले ही उसे मानें ना मानें, उसके अस्तित्व को नकार दें लेकिन कुछ तो है कि कभी ना कभी आप उसे याद कर ही लेते हैं। सोचता हूँ कल अगरबत्ती जला दूँगा, बहुत दिन हो गया है जलाए। चाय खत्म होने वाली है, आखिरी घूँट ग्लास मे दिखाई दे रही है, वह अपने अस्तित्व को लेकर बेखबर है, और कोई उसे पीने के लिए भारत का हर कोना अपने कैमरे के साथ किसी ट्रक पर बैठ कर घूमना चाहता है, पीना चाहता है हर स्वाद की चाय.... और बतियाना चाहता है अपने पीठ पर टंगे बैग से, हाथों मे लटके कैमरे से एक लंबी बातचीत.... उन सपनों के ठौर नहीं होते, उनकी बातें होती हैं.... बिना ठौर के भी ज़िन्दगी खूबसूरत लगती है, है ना? चाय खत्म हो चुकी है, घर की तरफ बढ़ जाता हूँ, नींद नहीं आती आजकल, लेकिन आँखों के सपने बहुत चमकने लगे हैं, ऊपर एक तारा आसमान से झांकता है, शायद ध्रुव तारा है और टिमटिमाते हुए कुछ कहना चाहता है, मुझे सुनने का दिल नहीं करता और अपनी नज़रें उससे हटा लेता हूँ, गुस्सा हो तो होता रहे। मन के किसी कोने मे पहाड़ के बीच एक नदी बहती हुई दिखती है, पत्थरों के बीच एक आवाज़ गूंजती रहती है, वहीं कहीं मैं भी हूँ, और एक पीला सा फूल पत्थरों के बीच खिला हुआ है, अस्तित्व की इस लड़ाई मे वह पत्थरों से जीत गया है, मैं खुश हो जाता हूँ कि कहीं से पत्नी की आवाज़ आती है, "नदी के बीच, पत्थरों मे रहने के लिए शादी की थी क्या?" मन के द्वार बंद होने लगते है, वह सब कुछ चुंबक की तरह खींच रहे हैं, लेकिन कुछ नहीं कर सकता मैं, सारे नज़ारे खो चुके हैं, मैं घर पहुंच चुका हूं, एक रात फिर ढल जाएगी और कुछ देर मे आसमान फिर उजास किरणों से नहाते हुए सफेद हो जाएगा..... रात का ढलना जारी है।
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