रात आँखों में थी,
तुम सिरहाने,
सुबह की चुरायी हुई धूप का पुर्ज़ा लिए,
गुलमोहर सी बातें थी,
और रिश्तों का सावन,
दरख्तों से गुजरती हुई हवा का गुनगुनाना,
कि जब कुछ नहीं होगा,
जला लूँगा तुम्हारी यादों की लकड़ियाँ,
पसलियों में सुस्त पड़ती सांसों की गर्मी के लिए।
-नीरज
आपका यह पोस्ट अच्छा लगा। मेरे नए पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंबहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद, आभार।
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