26 अक्टूबर 2015

नींद

आजकल देर रात तक नींद नहीं आती, मन ना जाने कहाँ कहाँ विचरता रहता है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये, कैसे इस मर्ज़ से छुटकारा मिले। ज्यादा दिन नहीं हुए हैं अभी जब यही बात मैं उसको समझाया करता था, की फेसबुक से दूर रहो, रात को मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया करो, लैपटॉप को तो अपने अगल बगल भी मत रखना, कहीं ऑफिस का जिन्न निकल आया तो इ मेल के जहर बुझे बाण फिर सोने न देंगे। एक बड़े शहर से दूसरे बड़े शहर में जाना कितना आसान होता है, हम कितनी आसानी से कह भी देते हैं, "आई जस्ट हैव शिफ्टेड हियर" और फिर हँसी के ठहाकों और ग्लासों की खनक में शाम को बीतते समय नहीं लगता, लेकिन अपने अंदर हम भी यह जानते हैं की हाँ छोड़ा है एक शहर, बल्कि यूँ कह लीजिये की एक पूरी ज़िन्दगी ही छोड़ आते हैं हम और नए शहर में हम ज़िन्दगी को फिर से जीने की कोशिश करते हैं, पोस्ट लैम्पों के काले खम्भों की तरह खड़े होते हैं हम और हमारी ज़िन्दगी ऊपर लटके लैंप की तरह बदलती रहती है, कभी फ्यूज हो जाने से, कभी ख़राब होने से या कभी फूट जाने से, लेकिन उसी लैंप की रौशनी में खम्भे को पता चलता है की वह लैंप के न जलने की स्थिति में नहीं देख पायेगा अपने अगल बगल, न ही वह देख पायेगा रात के अँधेरे में तारों पर लटकते हुए बैठे उल्लू को जो उसकी तरफ एक टक देखता हुआ रात गुज़ार देता है और खम्भा लजाकर अपनी कालिमा छुपाने में लग जाता है। हम भी कुछ ऐसा ही करते हैं, ज़िन्दगी बोस्किआना नहीं होती कि ऊपर वाले की रहमत हमेशा रहे, ज़िन्दगी लेकिन फिर कभी खत्म भी नहीं होती, अभी हम हैं, कल कोई और होगा, परसों कोई और और फिर ऐसे ही कहानी बढ़ती जाती है, साल दर साल, और इतना कि हम गिन भी नहीं सकते, लेकिन फिर भी लगे रहते हैं हम ज़िन्दगी की अनंत खोज में।  कब, कैसे, कहाँ? जहाँ भी, लेकिन कैसे शुरू हुई थी ज़िन्दगी, हर प्रश्न का एक उत्तर और हर उत्तर का एक प्रश्न और ज़िन्दगी जटिल से जटिल होती चली जाती है।

ज़िन्दगी की इस जटिल खोज में हम इतने लीन होते हैं कि हमें अपने आस पास कुछ भी नहीं दीखता, सूरज सुबह के कितने बजे चढ़ा था आसमान पर सीढ़ी लगाकर, कितने बजे भूखा प्यासा थक कर, शावर लेने के लिए समुद्र में उतर गया। भोर होते ही चिड़ियों के झुण्ड का एक साथ उड़ना देखे कितने दिन हो गए हैं, हम में से कितनों को तो अब यह याद भी नहीं होगा, गन्ने को चूसते हुए भैंसे के पीछे दौड़ पड़ना और गिरना, उठना और फिर दौड़ना और जब तक भैंसा भागे दौड़ते रहना, लेकिन वही जब घूमके हमें दौड़ा दे, तो सर और पैर दोनों बराबर होकर एक साथ दौड़ने लग जाते, साँसे बाहर आकर धौंकनी बन जाती थी और मुह लट्टू बनकर चकरघिन्नी जैसा नाचने लगता था, और सब कुछ हो जाने के बाद पुल्हिया पर बैठकर बतकही और डूबते हुए सूरज को देखते हुए कहानियां बनाना, फिर मोर, भालू, शेर सबकी कहानियां सुनाना, कितने किस्से फेंके जाते थे, यह तो नहीं पता लेकिन रात को छत पर लेटते ही तारों से भरी एक छत लोरी गाकर सुना देती थी। अब तो तारों से भरी छत के भी लाले पड़ गए हैं।

अनेको ख्याल, अनेको सपने शहर के साथ साथ बदलने लगते हैं अपनी जगह, ठीक वैसे ही जैसे मन अभी भी वहीँ कहीं उस मनी प्लांट में अटका पड़ा है जिसे छोड़ आये थे पुराने शहर, क्या वह अब भी वैसे ही होगा? सूखा नहीं होगा न? लोग पानी दते होंगे? कितना अच्छा लगता था न? और न जाने क्या क्या, शहर बदलते हैं, लेकिन हम नहीं और ज़िन्दगी एडजस्ट करने में लग जाती है, उस पुरानी वाइन के बोतल की तरह जो १०० सालों से पड़े पड़े उक्ता गयी थी, लेकिन फ्रिज में घुसते ही ठंढाने के प्रयास में लग जाती है और फिर सारी उथल पुथल कुछ समय के लिए बंद होकर सुस्ताने लग जाता है।  क्या पता नींद के साथ भी कुछ ऐसा ही हो।

- नीरज

3 टिप्‍पणियां:

  1. नींद नहीं आती है जब गिनने चाहिये घोड़े, गधे, भैंसें या बकरियाँ जो एक गेट के दूसरी ओर बहुत सारी हों और एक एक करके गेट से निकल कर आ रही हों :)

    अच्छा लिखा है ।

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  2. नींद नहीं आती है जब गिनने चाहिये घोड़े, गधे, भैंसें या बकरियाँ जो एक गेट के दूसरी ओर बहुत सारी हों और एक एक करके गेट से निकल कर आ रही हों :)

    अच्छा लिखा है ।

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    1. हार्दिक आभार सुशील जी। वैसे सुझाव सही है :)

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