कभी कभी जी करता है कि मैं भी एक कहानी लिख ही मारूं, कविता लिखते लिखते अब जी उकताने लगा है। अब तो कहानियों को खरीदार भी मिलने लगे हैं (किरदार भले ना मिलें), क्या पता किसी को पसंद आ जाये, या फिर हमारी कहानी इतनी फाडू हो कि जैसे बाज झपट्टा मारकर अपने शिकार को ले उड़ता है वैसा ही कुछ यहाँ भी हों और हमारी कहानी की किताब की प्रतियां पालक झपकते ही बिक जाएं। हाय हाय हाय, क्या मस्त खयाली पुलाव है, पका बेटा पका, अच्छा देख लेना कि पुलाव में गाजर, मटर, प्याज सब ठीक ठाक पड़े हों, नहीं तो कोई नहीं खायेगा और तेरा यह खयाली पुलाव ख्यालों में ही दम तोड़ देगा।
उफ़ , बस यही नहीं भाता हमें, इतने मस्त सपने में भी किचन कहीं ना कहीं से शामिल हो जाता है, साला ऐसा लगता है कि जिस दिन हम पैदा हुए थे, मम्मी उस दिन भी किचन में कुछ चटपटा और स्वादिष्ट खाना पका रही थीं, और ये उस खाने का ही असर है, जो हमारे नथुनों के रास्ते दिमाग में चढ़ गया, और हाँ, इतना चढ़ा कि हमें हॉस्पिटल जाना भी गवारा नहीं हुआ, घर ही में टपक पड़े। खैर यह बहस थोड़ा हम परे रख देते हैं इस समय, इस पर फिर कभी बात करेंगे, अभी बात हो रही थी हमारी कहानी की, और कहानी ही क्यों उसके संग्रह के छपवाने की भी बात, लेकिन हम आदमी जरा हट के हैं, कहानी कैसे लिखेंगे और अगर लिखेंगे भी तो हट के वाली, समस्या बस केवल इतनी हो जाती है कि कहानी में बहुत कुछ लिखना पड़ता है, एक छोटी सी बात को भी बताने के लिए बड़ी सी भूमिका बांधनी पड़ती है और बस वहीँ हमारे प्रसंग का सत्यानाश हो जाता है, कविता में कहीं भी कोई बनावटीपन नहीं होता, जो भी कहना हो लिखना हो, सीधे सपाट शब्दों में कह डालो, कहीं से भी किसी तरह की कोई भूमिका लिखने की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन मुझे अब यकीन हो गया है कि दुनिया बनावटी को ही ऊपर उठाती है, अच्छा चलो आप ही बताओ, कवियों को कितने लोग जानते हैं, लेकिन लेखकों को ? तो कुल मिलाकर कहानी यह है कि भाई अब हमें लिखनी है "एक अदद सी कहानी", बस समस्या यह है कि वह मिल ही नहीं रही, खोजने को तो हम खोज लेंगे, थोड़ा समय लग रहा है जरूर , लेकिन अगर भगवान ने उसे हमसे लिखवाने के लिए योजना बना ली है तो कहाँ जाएगी वो, और वैसे भगवान भी क्या करेंगे जब हमने खुद ही ठान लिया है , तो कहानी जी, आप जहां कहीं भी अपनी कॉफ़ी की चुस्की ले रही हों ,सब कुछ छोड़ छाड़ के हमारे पास चले आइये, बहुत ही व्यग्र और व्याकुल हैं हम आपको लिखने के लिए।
पता नहीं नींद में किससे बातें कर रहा था इतनी सारी एक कहानी लिखने की जब झटके से ट्रेन के रुक जाने से नींद खुल गयी, और खिड़की के उस पार सूर्य अपने पूरे उफान पर दौड़ रहा था, धूप की इस मार से चिड़ियाँ भी पेड़ों को छोड़कर नहीं निकल पा रहीं थी, लेकिन खेतों में किसान पूरे मन से लगा हुआ था, हर खेत में कटाई चल रही थी, धुप के तेज़ होने के बावजूद भी उनका काम बंद नहीं हुआ था, और मेरे मष्तिष्क में सपने की वो बात घूम गयी कि कहानी मैं तुम्हे ढूंढ ही लूँगा, तुम भले कहीं भी बैठी ले रही हो अपनी कॉफ़ी की चुस्की, लेकिन असल कहानी तो मेरे आस पास बिखरी हुई थी और उसके पास एयर कंडीशन की ठंढी हवा में बैठकर कॉफ़ी पीने का न तो समय है और न पैसे, वह तो बस बनाता है, भोगने वाला तो कोई और है। ट्रेन चल चुकी थी और खेत ओझल होने लगे थे, शहरों ने अपना सुरसा मुह खोल दिया था।
- नीरज
उफ़ , बस यही नहीं भाता हमें, इतने मस्त सपने में भी किचन कहीं ना कहीं से शामिल हो जाता है, साला ऐसा लगता है कि जिस दिन हम पैदा हुए थे, मम्मी उस दिन भी किचन में कुछ चटपटा और स्वादिष्ट खाना पका रही थीं, और ये उस खाने का ही असर है, जो हमारे नथुनों के रास्ते दिमाग में चढ़ गया, और हाँ, इतना चढ़ा कि हमें हॉस्पिटल जाना भी गवारा नहीं हुआ, घर ही में टपक पड़े। खैर यह बहस थोड़ा हम परे रख देते हैं इस समय, इस पर फिर कभी बात करेंगे, अभी बात हो रही थी हमारी कहानी की, और कहानी ही क्यों उसके संग्रह के छपवाने की भी बात, लेकिन हम आदमी जरा हट के हैं, कहानी कैसे लिखेंगे और अगर लिखेंगे भी तो हट के वाली, समस्या बस केवल इतनी हो जाती है कि कहानी में बहुत कुछ लिखना पड़ता है, एक छोटी सी बात को भी बताने के लिए बड़ी सी भूमिका बांधनी पड़ती है और बस वहीँ हमारे प्रसंग का सत्यानाश हो जाता है, कविता में कहीं भी कोई बनावटीपन नहीं होता, जो भी कहना हो लिखना हो, सीधे सपाट शब्दों में कह डालो, कहीं से भी किसी तरह की कोई भूमिका लिखने की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन मुझे अब यकीन हो गया है कि दुनिया बनावटी को ही ऊपर उठाती है, अच्छा चलो आप ही बताओ, कवियों को कितने लोग जानते हैं, लेकिन लेखकों को ? तो कुल मिलाकर कहानी यह है कि भाई अब हमें लिखनी है "एक अदद सी कहानी", बस समस्या यह है कि वह मिल ही नहीं रही, खोजने को तो हम खोज लेंगे, थोड़ा समय लग रहा है जरूर , लेकिन अगर भगवान ने उसे हमसे लिखवाने के लिए योजना बना ली है तो कहाँ जाएगी वो, और वैसे भगवान भी क्या करेंगे जब हमने खुद ही ठान लिया है , तो कहानी जी, आप जहां कहीं भी अपनी कॉफ़ी की चुस्की ले रही हों ,सब कुछ छोड़ छाड़ के हमारे पास चले आइये, बहुत ही व्यग्र और व्याकुल हैं हम आपको लिखने के लिए।
पता नहीं नींद में किससे बातें कर रहा था इतनी सारी एक कहानी लिखने की जब झटके से ट्रेन के रुक जाने से नींद खुल गयी, और खिड़की के उस पार सूर्य अपने पूरे उफान पर दौड़ रहा था, धूप की इस मार से चिड़ियाँ भी पेड़ों को छोड़कर नहीं निकल पा रहीं थी, लेकिन खेतों में किसान पूरे मन से लगा हुआ था, हर खेत में कटाई चल रही थी, धुप के तेज़ होने के बावजूद भी उनका काम बंद नहीं हुआ था, और मेरे मष्तिष्क में सपने की वो बात घूम गयी कि कहानी मैं तुम्हे ढूंढ ही लूँगा, तुम भले कहीं भी बैठी ले रही हो अपनी कॉफ़ी की चुस्की, लेकिन असल कहानी तो मेरे आस पास बिखरी हुई थी और उसके पास एयर कंडीशन की ठंढी हवा में बैठकर कॉफ़ी पीने का न तो समय है और न पैसे, वह तो बस बनाता है, भोगने वाला तो कोई और है। ट्रेन चल चुकी थी और खेत ओझल होने लगे थे, शहरों ने अपना सुरसा मुह खोल दिया था।
- नीरज

बहुत ही बढ़िया और नेक ख़याल है सर जी
जवाब देंहटाएंकभी हमरे भी ब्लॉग पर आईएगा.
http://iwillrocknow.blogspot.in/
हार्दिक आभार।
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जवाब देंहटाएंबहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
हार्दिक आभार।
हटाएंhttp://lamhesejudalamha.blogspot.in/2015/08/blog-post_23.html
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार रश्मि जी, यह बहुत बड़ी बात है मेरे लिए।
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