22 मई 2015

दिल्ली मैं फिर लौटूंगा

रात के १२ बजे  जब स्टेशन पहुंचा, तो खचाखच भरा हुआ था, २४ घंटे की थका देने वाली यात्रा के बाद मैं अब यह सोच रहा था कि इस भीड़ को पार कर स्टेशन से बाहर निकल पाउँगा कि नहीं? अपने ऊपर खीझ रहा था "इसीलिए कभी त्योहारों के समय बाहर नहीं निकलना चाहिए, लो अब भुगतो , अरे भुगतने को तो हम भुगत बाद में भी लेंगे, प्रश्न यह है कि अभी बाहर कैसे निकलेंगे? अरे प्रश्न गया भांड में, तुम चले ही क्यों इस समय , अगर एक दो दिन बाद आ जाते तो क्या कुछ बिगड़ जाता?"
"नीरज चुप कर, बाहर निकलने के लिए जगह बना पहले, फ़ालतू की बक झक बाद में कर लेना, यह तो खुद के ही साथ ही करनी है न?":
"हाँ वो तो है, लेकिन इस भीड़ में बाहर निकलेंगे कैसे? अगर सरसो गिरा दिया जाय ऊपर से तो अक्को नीचे नहीं गिरने वाला, जाने कहाँ से यह जन सैलाब उमड़ पड़ता है छुट्टियों का सीजन आते ही?"
अपने आप से मन ही मन लड़ता मैं किसी तरह पुरानी दिल्ली स्टेशन से बाहर निकला धक्का मुक्की करते हुए, दिल्ली मैं कोई पहली बार नहीं आया था, लेकिन इस बार का बाकी हर दफे से अलग था, सब कुछ छोड़ के, लुट पिट के मैं आया था दिल्ली, एक नयी ज़िन्दगी की शुरुआत करने, कुछ नया करने, अपने ज़िन्दगी के पन्नों को एक नयी स्याही से रंगने के इर्रादे से आया था।

५ नवंबर, २०१० , यहीं से शुरू होती है मेरी दिल्ली की कहानी, एक ऐसी कहानी जो अगर सच कहूँ तो एक तिलिस्म जैसी लगती है अब, दिल्ली एक एकलौता ऐसा शहर है मेरी ज़िन्दगी में जहाँ मैंने कोई दुःख नहीं देखे, रोया हूँ, लेकिन ख़ुशी के आंसूं और हंसा तो हमेशा ही मन भर के इस शहर में, दिल्ली अब ऐसी लगती है, जैसे मेरे शरीर का एक हिस्सा हो गयी हो, जैसे किसी ने गोदने की तरह गोद दिया हो दिल्ली को मुझमे और अब वह मुझमे हर जगह दिखती है, मेरे साथ हंसती है, रोती है, खाती है, घूमती है  और न जाने क्या क्या , मेरे सांसों के साथ दिल्ली जब साँस लेती है , तो दिल की धड़कनों के साथ धमनियों में धकेले जाते हुए खून के कतरे भी एक बार चुपके से दिल्ली को गले लगा लेता है और मैं बदहवास सा खुद को आईने में देखता हुआ केवल इतना ही कह पाता हूँ "फिर लौटूंगा मैं, फिर लौटूंगा। "

हाँ, दिल्ली प्रवास अब खत्म होने को है और मैं यहाँ बैठा बस यही सोच रहा हूँ कि "अरे इतनी जल्दी कैसे, अभी कल ही की तो बात है, जब उस भीड़ को चीरते हुए जैसे तैसे हम स्ट्रीट लाइट की उस रौशनी वाली दिल्ली में पहुंचे थे , जैसे हमने उसको कभी नहीं देखा था। "
स्टेशन से बहार जब निकला तो यकायक लगा की अरे कहाँ आ गए हम, यह दिल्ली ही है ना? और दिल्ली ने हौले से हमारे(दिल्ली आने से पहले हम "मैं" की जगह "हम" का ही प्रयोग होता था) कानों में कहा था कि हाँ मैं ही हूँ दिल्ली, हम तो अकबका के इधर उधर देखने लगे थे, किसी को न पाकर ऑटो लेने  बढ़ गए, लेकिन "दिल्ली" - दिल्ली ने उस दिन से ही हमें अपना लिया, हम से मैं पर कब आ गया पता ही नहीं चला। दिल्ली आपको अपना बना लेती है, आप इसे अपना बनाये या न बनाएं, यही दिल्ली की खासियत है और देखते देखते कब चार साल बीत गए पता ही चला, बस कुछ दिन और फिर दिल्ली को रोज़ याद करूँगा और उसकी यादों का तकिया रोज़ मेरी बाहों में सांसें भरेगा।  लेकिन यह भी एक सच है कि मैं अपने अंतर्मन में बसी उस दिल्ली से हर बार रोज़ यही कहूँगा कि "मैं फिर लौटूंगा, मैं फिर लौटूंगा।"

- नीरज 

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