25 मई 2014

कनेर


आज कनेर को बंद कर लिया,
हमेशा के लिए यादों के बुद्धू बक्से में,
याद है तुम्हारा कनेर को मुठ्ठी में बंद करके सो जाना,
और कहना ,
यह कनेर कहाँ,
यह तो तुम्हारी यादें हैं,
जो तुम्हारे ना होने पर बंद कर लेती हूँ अपनी मुठ्ठी में,
कि कहीं तुम छूट ना जाओ,
और मैं लपककर कस लेता था तुम्हें.
आज कनेर फिर खिला है,
झरने को आमादा,
लेकिन अब मुठ्ठी में बंद करने को तुम नहीं हो,
कहाँ से लाऊं तुम्हे,
डायरी के फडफडाते पन्नो से तुम्हारा पता पूछा,
और वक़्त की बर्फ पिघलकर,
पीली पड़ गयी.

- नीरज

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