यादें कहाँ टिकती हैं ... खुशबू बन के बिखरती हैं ...
और कभी बंद किताबों में तो कभी मानस में जब तब महका करती हैं, हार्दिक आभार दिगंबर जी
सुन्दर कविता !इसे तो पहले भी सुन चुका था .....
हाँ, हार्दिक आभार।
हार्दिक आभार।
यादें कहाँ टिकती हैं ... खुशबू बन के बिखरती हैं ...
जवाब देंहटाएंऔर कभी बंद किताबों में तो कभी मानस में जब तब महका करती हैं, हार्दिक आभार दिगंबर जी
हटाएंसुन्दर कविता !इसे तो पहले भी सुन चुका था .....
जवाब देंहटाएंहाँ, हार्दिक आभार।
हटाएंहार्दिक आभार।
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