20 मई 2014

डायरी

अब उस डायरी को 
बुकशेल्फ में,
सबसे नीचे वाले,
ड्रावर के कोने में,
रख दिया है,

काश तुम्हारी 
यादें भी,
ऐसे ही कहीं रख पाता,
जहाँ नज़रें
जाने से इनकार कर देती.

- नीरज

5 टिप्‍पणियां:

  1. यादें कहाँ टिकती हैं ... खुशबू बन के बिखरती हैं ...

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    1. और कभी बंद किताबों में तो कभी मानस में जब तब महका करती हैं, हार्दिक आभार दिगंबर जी

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  2. सुन्दर कविता !इसे तो पहले भी सुन चुका था .....

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