18 मई 2014

अतिक्रमण


यह कुछ अलग था, पहले से बिलकुल अलग,
जीने के नज़रिए में आमूल चूल परिवर्तन आ चुके थे,
सुबह सुबह लोटा लेकर संडास के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी,
बल्कि नलके में पानी आता था,
और गुसलखाना अब घर में ही बन गया था,
पूरा घर तब्दील हो गया था यन्त्र में,
जैसे घर नहीं, मशीन बन गया हो,
इस उम्र में मुझे अब यह ऐसा ही लगता था,
लेकिन बदलाव तो आना ही है,
आकर ही रहेगा, और मैं अपने आप को समझा लिया करता था,
समय के साथ मैं भी बदलाव का शिकार हो गया,
और मुझे अब यह कुछ नया नहीं लगता था,
यह मुझमे शामिल हो गया था,
गाँव की ठंढी हवा रास नहीं आती थी,
कुछ ही दिन में बोरियत होने लगती थी,
चौराहे पर चाय की दूकान की वह महफिलें अब सुनी लगने लगीं थीं,
और चौरसिया का पान फीका,
रात को खाने के बाद छत से दीखता तारों से भरा आसमान खाली लगता था,
और किनारे पर लगी चारपाई पर,
मैं मैट्रेस का स्पंजी सुख खोजने लगा था,
रात बीत जाती थी करवटों में,
गाँव से भागने की जल्दी होती थी,
और शहर पहुंचकर ही राहत मिलती थी,
देखते देखते समय पंख लगाकर उड़ गया,
५० से ८० साल कब हो गए पता ही ना चला,
लेकिन अब बदलाव की जरुरत फिर से थी,
यंत्रों की नहीं, प्रकृति का सानिध्य चाहिए था,
गाँव जाने की इच्छा जोर मारने लगी,
किसी तरह फिर वहीँ पहुंचा,
जहाँ चौरसिया का पान,
और चौराहे की बकर में उम्र के पचास साल बीते थे,
लेकिन घर अब ढह चूका था,
एक बूढी जर्जर ईमारत आखिर कब तक अकेली रहती,
और छज्जों पे उग आये पीपल के पेंड मुह चिढ़ा रहे थे,
टूटे घर के सामने अपना कद छोटा लगने लगा था,
उस दिन टूटी चारपाई पर भी भरपूर नींद आयी,
लेकिन सुबह फिर वही ढह चूका घर,
और खंडहरों के निशानों ने वापस शहर भेज दिया,
अब शहर खाने को दौड़ता था,
और बदलाव मुझे अतिक्रमण लगने लगे थे,
अतिक्रमण, मेरे सपनों पर, मेरे बचपन पर,
पचास साल के जीवन पर,
जिन्हें यंत्रों से बांधने की जिद यहाँ ले आई थी,
एक नए बदलाव में ढलने के लिए,
लेकिन आज उस अतिक्रमण ने मेरे पूरे जीवन को अमर बेल की तरह ढँक लिया है,
और यह अतिक्रमण अभी भी बदस्तूर जारी है,
बस फिर एक बार बदलना चाहता हूँ, सोना चाहता हूँ,
तारों से भरे आसमान के नीचे अपनी उसी पुरानी छत पर,
और उसी मिटटी में सिमट जाना चाहता हूँ,
जो अब गाहे बगाहे मेरे शरीर से कभी कभी फिर से महक जाया करती है.

- नीरज

एक बुजुर्गवार के शब्दों में जो तीस साल पहले दिल्ली आये थे, यहाँ के बदलते परिवेश में वह कुछ यूँ शामिल हुए कि भागती दौड़ती जिंदगी के तीस साल कब यंत्रवत गुजर गए पता ही नहीं चला, जब जीवन में फिर से बदलाव के बुलबुले फूटने शुरू हुए तो शहरी अतिक्रमण इस हद तक हावी हो चूका था कि वह वापस जाना चाहकर भी नहीं जा सके. आजकल रोज़ रात वह छत से आसमान को निहारते रहते हैं इस आस में कि क्या पता कब आसमान तारों से भर जाए और वह अपने अतिक्रमण से आज़ाद से हो सकें.

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