चाँद शांत पानी में झलकता रहा,
लहरों ने टुकड़े बिखेर दिए।
दिल्ली आज फिर शिद्दत से याद आ रही है। कई शहरों में रहा लेकिन दिल्ली दिल में घर कर गयी, इसके अपने कारण हैं, हर शहर रोज उठता है, दौड़ता है और थक हार कर रात में तनहाइयाँ गिनता है, सोता फिर भी नहीं , लेकिन दिल्ली सोती है चैन की नींद, आखिर उसे अगली सुबह लिखनी होती हैं हज़ारों कहानियां। कहानियां जिनमे हम और आप बड़ी शिद्दत से अपनी अपनी चाय और कॉफ़ी की चुस्की लेते रहते हैं। दिल्ली रुलाती है, हंसाती है, नचाती है, दौड़ाती है और जब ज्यादा हो जाता है तो ठंढ की लिहाफ में भींच कर सुला देती है। दिल्ली मुस्काती है कातिल हंसी, कुछ इसमें उलझ कर खो जाते हैं और कुछ आग में डुबकी लगाकर आँखें खोलकर खौलते लावे से आँखों को सेंक लेते हैं। दिल्ली महबूब है , महबूबा नहीं, दिल्ली दर्द है, और है वह जिसमे डूबकर ग़ालिब भी काफ़िर हो गए।
खैर, बहुत कुछ खोकर पहुंचा था यहाँ, दिवाली से ठीक एक दिन पहले, पूर्वा एक्सप्रेस थी शायद, कोलकाता से दिल्ली.........थोड़ी देर हो गयी थी, स्टेशन पहुँचने पर अलग ही नज़ारा था, सरसो गिराने की भी जगह ना थी, हर कोई अपने अपने घर पहुँच जाना चाहता था, हर किसी का कोई इंतज़ार कर रहा था सिवाय मेरे, जिसको यह भी नहीं पता था कि उसे जाना कहाँ है। दिल्ली भले ही छोटी दिखती हो , है बहुत बड़ी, बड़ी बड़ी चौड़ी सड़कें, एक के ऊपर एक.......इंसान तो बढ़ा ही है इस शहर में, उससे भी तेजी से बढ़ी हैं सड़कें और उनका चिकनापन.......काली धारदार सड़कें, कि उनमे अपना मुह भी चमक जाये। स्टेशन के बाहर पीली रोशनी बिखरी हुई थी, आँखों को चकाचौंध कर देने के लिए काफी थीं, दूर तक कारों, ऑटो और गाड़ियों का काफिला दिख रहा था, रुकी हुई , खुद से यह पूछने की कोशिश में लगी हुई थीं, कि यह कारवां है किसका, कौन है वह तुग़लक़ जो इन्हें रोज़ इस काफिले से जोड़ता जाता है। ऐसा लगा जैसे काफिले का हर शख्स मुझे ही देख रहा है, सबके अंदर एक बेचैनी है मुझे मेरी मंज़िल तक पहुँचाने के लिए सिवाय मेरे जिसकी मंज़िल का पता ही गुमा हुआ था। काफिले से थोड़ा अलग जहाँ स्टेशन थोड़ा एकांत हो जाता है, कुछ लोग बेतरतीबी से पड़े हुए थे, एक के बाद एक, लाशों को ऐसे कैसे फेंक दिया गया है बबल में रैप करके, दिल्ली तो ऐसी न थी, सामने एक अखबार वाला आया, जेब टटोली तो तीन रुपये मिल गए, पर्स में थे कुछ पैसे लेकिन पर्स में थे जेब में नहीं , ले लिया एक अखबार। कोने की न्यूज़ में था कि गरीबों को बाँटे गए बबल रैप, ओह.........तो वह लाशें नहीं बबल रैप में लिपटे इंसान हैं, क्या सच में गर्म है वह रैप ? कुछ देर यूँ ही बैठा रहा, रात के १२ बज चुके थे, दिवाली आ गयी थी और उसकी तैयारियां हर तरफ थीं, और मैं अपने को बबल में लपेटने की सोच रहा था, एक रात ऐसी भी सही, तभी फ़ोन बजने लगा, पापा का फ़ोन था, "पहुँच गए ठीक से?"
"हाँ पापा, पहुँच गया "
"कोई परेशानी तो नहीं है न?"
"नहीं, बिलकुल नहीं, किसी का फ़ोन नहीं मिल रहा, इतनी रात गए किसका दरवाज़ा खटखटाउं? होटल ले लिया है " - अपने पर्स को एक बार छू के देखता हूँ और कहता हूँ खुद से ही ,"ग़ालिब रहने के ठौर और भी हैं "
"ठीक है , कोई दिक्कत हो तो फ़ोन कर देना "
मम्मी अचानक से आ जाती हैं फ़ोन पर ,"ठंढी बहुत होई न वंह ? कहत रहली कि लेते जा जाकिट, लेकिन तुहें तो लगत नाई ठंढी ?"
माँ का प्यार और दिल कोई नहीं बन सकता और न बाप का स्नेह कोई दे सकता है, पापा भी शायद पूछना चाहते थे , लेकिन पूछ नहीं पाए, हर बाप अपने बेटे को मजबूत देखना चाहता है, टूटते और बिखरते हुए नहीं। वह बोले थे जब गांव से निकला था, पैसे की कोई दिक्कत हो तो मांग लेना , भेज दूंगा। लेकिन उनको भी पता था कि अब नहीं मांगूंगा, कुछ भी हो जाये।
"अरे हम ठीक हई, होटल में बाटी, रजाई बहुत मोट बाय, खिड़किया खोलले हई तनी तो आवाज़ अंदर आवत बाय , अब रखा, बिहान बतिआईब। " अपने पर्स को एक बार फिर छूता हूँ, और जल्दी से फ़ोन रख देता हूँ, बैलेंस ख़तम हो गया तो दिक्कत हो जाएगी और अगर माँ को पता चल गया कि कहाँ हूँ तो उसे रात भर नींद नहीं आएगी, नाज़ों से पाले बेटे को बाहर रात गुज़ारना पड़े, वह शायद यह सह नहीं पाती और घंटों अपने पति को सुनाती कि दिल्ली के सारे जानने वाले और रिश्तेदार मर गए हैं क्या जो उसके बेटे को अपने घर रख भी नहीं सकते या फिर उसने यूँ ही अपनी ज़िन्दगी सबकी सुनने में ख़तम कर दी और रोती तब तक जब तक कि आंसूं सुख नहीं जाते, वह सो नहीं पाती रात भर और सुबह होते ही उसका फ़ोन दनदनाते हुए फिर आ जाता और साथ में आते कई औरों के फ़ोन जो अपनी झूठी कहानियां गढ़ कर नकली माफ़ी मांग रहे होते और मैं उनके होने या न होने का मतलब खोज रहा होता। खैर रात काली होने लगी थी ऊपर आसमान में और नीचे पीली रोशनी और तेज होती जा रही थी, बबल खोजने का काम शुरू कर दिया था, इतना गरीब भी नहीं था कि एक रात किसी होटल में न गुज़ार सकूँ, भला किस गरीब का बबल खींचूं? अंत में एक चाय की दुकान पर आकर चाय पीने लगा, रात लंबी लगने लगी थी और चाय कड़वी।
फ़ोन एक बार फिर गुर्राने लगा था, खीझ बढ़ रही थी कि इस गरीब की याद अब किसको आ गयी, फ़ोन उठाया ,"कहाँ है बे?"
"क क कौन?" शब्द बड़ी मुश्किल से निकले थे, इतने प्रेम की संभावना अब किसी तरफ नहीं दिख रही थी।
"नवीन "
"नवीन भैया ?"
"हाँ, नवीन भैया.......कहाँ है? दिल्ली पहुँच गया?"
"हाँ भैया, बस अभी अभी, ट्रेन लेट हो गयी थी " कितनी साफगोई से मैं झूठ बोल गया था, रश्क़ होता है आज खुद पर कि झूठ बोलना भी एक कला है और मैं उस दिन इस कला में हर पल पी एच डी करने की तरफ बढ़ा जा रहा था।
"चुपचाप घर आ जा, तेरा ही इंतज़ार कर रहा था, साथ खाना खाएंगे " उन्होंने अपना पता दिया और फ़ोन रख दिया।
बहुत कुछ एक साथ दिमाग में चलने लगा था, आँखों में थोड़ी नमी भी थी जो कभी भी बाहर आने के लिए तैयार खड़ी थी, हलक थोड़ा रुंधने लगा था और बचपन के नवीन भैया और उनकी यादें , उनके थप्पड़ और उनकी चाय... सब कुछ गुथ्थम गुथ्था होकर दिमाग में दौड़ने लगा था, यह भी सोच रहा था कि इनको मेरा नंबर कैसे मिला? किसी तरह चाय वाले का पैसा पूछा और पहली बार पर्स से दिल्ली आने के बाद चार घंटों में पैसे निकाले, उसे दिए और ऑटो स्टैंड की तरफ बढ़ गया। रात का कालापन घटने लगा था और सामने सड़क पर बिछे, ठहरे हुए काफिलों के चेहरे चमक उठे थे।
"बदरपुर चलोगे भैया ?"
"हाँ हाँ साहब क्यों नहीं चलेंगे , आइये बैठिये"
"मीटर से चलोगे न?"
"अब इतनी रात गए मीटर से कौन चलता है भैया, दो सौ दे देना, मीटर से भी उतना ही आएगा और इतनी रात गए बदरपुर जाता कौन है, खाली ही आना पड़ेगा उधर से "
"अरे मुझे बदरपुर नहीं प्रहलादपुर जाना है, उससे पहले पड़ेगा " भैया ने बता दिया था, दिल्ली के इस छोर पर अकेले पहली बार जा रहा था।
"सही बताओ" मैंने फिर से पूछा , रात के साथ साथ मेरी भी छटपटाहट बढ़ती जा रही थी और बहुत कुछ चल रहा था दिमाग में जिसे एकांत की जरुरत थी।
"चलो एक सौ अस्सी दे देना, अब बैठो" उसके कहने में ऐसा था कि कहीं मैं दूसरे ऑटो की तरफ न बढ़ जाऊं।
"चलो"
"कौन से रस्ते से चलें भैया ? रिंग रोड ले लेते हैं , जल्दी पहुँच जायेंगे"
दिल्ली अब बचपन की दिल्ली नहीं रह गयी थी, बदल चुकी थी, सडकों का एक मायाजाल बिछ चूका था अब , मैं कहाँ जानता था सब और नहीं जानता हूँ, जाहिर भी नहीं करना चाहता था।
"ठीक है, वही ले लो जिससे जल्दी पहुँच जाएं " कहते हुए मैंने अपना सामान उठा के ऑटो में डाल दिया और बैठ गया।
खैर, बहुत कुछ खोकर पहुंचा था यहाँ, दिवाली से ठीक एक दिन पहले, पूर्वा एक्सप्रेस थी शायद, कोलकाता से दिल्ली.........थोड़ी देर हो गयी थी, स्टेशन पहुँचने पर अलग ही नज़ारा था, सरसो गिराने की भी जगह ना थी, हर कोई अपने अपने घर पहुँच जाना चाहता था, हर किसी का कोई इंतज़ार कर रहा था सिवाय मेरे, जिसको यह भी नहीं पता था कि उसे जाना कहाँ है। दिल्ली भले ही छोटी दिखती हो , है बहुत बड़ी, बड़ी बड़ी चौड़ी सड़कें, एक के ऊपर एक.......इंसान तो बढ़ा ही है इस शहर में, उससे भी तेजी से बढ़ी हैं सड़कें और उनका चिकनापन.......काली धारदार सड़कें, कि उनमे अपना मुह भी चमक जाये। स्टेशन के बाहर पीली रोशनी बिखरी हुई थी, आँखों को चकाचौंध कर देने के लिए काफी थीं, दूर तक कारों, ऑटो और गाड़ियों का काफिला दिख रहा था, रुकी हुई , खुद से यह पूछने की कोशिश में लगी हुई थीं, कि यह कारवां है किसका, कौन है वह तुग़लक़ जो इन्हें रोज़ इस काफिले से जोड़ता जाता है। ऐसा लगा जैसे काफिले का हर शख्स मुझे ही देख रहा है, सबके अंदर एक बेचैनी है मुझे मेरी मंज़िल तक पहुँचाने के लिए सिवाय मेरे जिसकी मंज़िल का पता ही गुमा हुआ था। काफिले से थोड़ा अलग जहाँ स्टेशन थोड़ा एकांत हो जाता है, कुछ लोग बेतरतीबी से पड़े हुए थे, एक के बाद एक, लाशों को ऐसे कैसे फेंक दिया गया है बबल में रैप करके, दिल्ली तो ऐसी न थी, सामने एक अखबार वाला आया, जेब टटोली तो तीन रुपये मिल गए, पर्स में थे कुछ पैसे लेकिन पर्स में थे जेब में नहीं , ले लिया एक अखबार। कोने की न्यूज़ में था कि गरीबों को बाँटे गए बबल रैप, ओह.........तो वह लाशें नहीं बबल रैप में लिपटे इंसान हैं, क्या सच में गर्म है वह रैप ? कुछ देर यूँ ही बैठा रहा, रात के १२ बज चुके थे, दिवाली आ गयी थी और उसकी तैयारियां हर तरफ थीं, और मैं अपने को बबल में लपेटने की सोच रहा था, एक रात ऐसी भी सही, तभी फ़ोन बजने लगा, पापा का फ़ोन था, "पहुँच गए ठीक से?"
"हाँ पापा, पहुँच गया "
"कोई परेशानी तो नहीं है न?"
"नहीं, बिलकुल नहीं, किसी का फ़ोन नहीं मिल रहा, इतनी रात गए किसका दरवाज़ा खटखटाउं? होटल ले लिया है " - अपने पर्स को एक बार छू के देखता हूँ और कहता हूँ खुद से ही ,"ग़ालिब रहने के ठौर और भी हैं "
"ठीक है , कोई दिक्कत हो तो फ़ोन कर देना "
मम्मी अचानक से आ जाती हैं फ़ोन पर ,"ठंढी बहुत होई न वंह ? कहत रहली कि लेते जा जाकिट, लेकिन तुहें तो लगत नाई ठंढी ?"
माँ का प्यार और दिल कोई नहीं बन सकता और न बाप का स्नेह कोई दे सकता है, पापा भी शायद पूछना चाहते थे , लेकिन पूछ नहीं पाए, हर बाप अपने बेटे को मजबूत देखना चाहता है, टूटते और बिखरते हुए नहीं। वह बोले थे जब गांव से निकला था, पैसे की कोई दिक्कत हो तो मांग लेना , भेज दूंगा। लेकिन उनको भी पता था कि अब नहीं मांगूंगा, कुछ भी हो जाये।
"अरे हम ठीक हई, होटल में बाटी, रजाई बहुत मोट बाय, खिड़किया खोलले हई तनी तो आवाज़ अंदर आवत बाय , अब रखा, बिहान बतिआईब। " अपने पर्स को एक बार फिर छूता हूँ, और जल्दी से फ़ोन रख देता हूँ, बैलेंस ख़तम हो गया तो दिक्कत हो जाएगी और अगर माँ को पता चल गया कि कहाँ हूँ तो उसे रात भर नींद नहीं आएगी, नाज़ों से पाले बेटे को बाहर रात गुज़ारना पड़े, वह शायद यह सह नहीं पाती और घंटों अपने पति को सुनाती कि दिल्ली के सारे जानने वाले और रिश्तेदार मर गए हैं क्या जो उसके बेटे को अपने घर रख भी नहीं सकते या फिर उसने यूँ ही अपनी ज़िन्दगी सबकी सुनने में ख़तम कर दी और रोती तब तक जब तक कि आंसूं सुख नहीं जाते, वह सो नहीं पाती रात भर और सुबह होते ही उसका फ़ोन दनदनाते हुए फिर आ जाता और साथ में आते कई औरों के फ़ोन जो अपनी झूठी कहानियां गढ़ कर नकली माफ़ी मांग रहे होते और मैं उनके होने या न होने का मतलब खोज रहा होता। खैर रात काली होने लगी थी ऊपर आसमान में और नीचे पीली रोशनी और तेज होती जा रही थी, बबल खोजने का काम शुरू कर दिया था, इतना गरीब भी नहीं था कि एक रात किसी होटल में न गुज़ार सकूँ, भला किस गरीब का बबल खींचूं? अंत में एक चाय की दुकान पर आकर चाय पीने लगा, रात लंबी लगने लगी थी और चाय कड़वी।
फ़ोन एक बार फिर गुर्राने लगा था, खीझ बढ़ रही थी कि इस गरीब की याद अब किसको आ गयी, फ़ोन उठाया ,"कहाँ है बे?"
"क क कौन?" शब्द बड़ी मुश्किल से निकले थे, इतने प्रेम की संभावना अब किसी तरफ नहीं दिख रही थी।
"नवीन "
"नवीन भैया ?"
"हाँ, नवीन भैया.......कहाँ है? दिल्ली पहुँच गया?"
"हाँ भैया, बस अभी अभी, ट्रेन लेट हो गयी थी " कितनी साफगोई से मैं झूठ बोल गया था, रश्क़ होता है आज खुद पर कि झूठ बोलना भी एक कला है और मैं उस दिन इस कला में हर पल पी एच डी करने की तरफ बढ़ा जा रहा था।
"चुपचाप घर आ जा, तेरा ही इंतज़ार कर रहा था, साथ खाना खाएंगे " उन्होंने अपना पता दिया और फ़ोन रख दिया।
बहुत कुछ एक साथ दिमाग में चलने लगा था, आँखों में थोड़ी नमी भी थी जो कभी भी बाहर आने के लिए तैयार खड़ी थी, हलक थोड़ा रुंधने लगा था और बचपन के नवीन भैया और उनकी यादें , उनके थप्पड़ और उनकी चाय... सब कुछ गुथ्थम गुथ्था होकर दिमाग में दौड़ने लगा था, यह भी सोच रहा था कि इनको मेरा नंबर कैसे मिला? किसी तरह चाय वाले का पैसा पूछा और पहली बार पर्स से दिल्ली आने के बाद चार घंटों में पैसे निकाले, उसे दिए और ऑटो स्टैंड की तरफ बढ़ गया। रात का कालापन घटने लगा था और सामने सड़क पर बिछे, ठहरे हुए काफिलों के चेहरे चमक उठे थे।
"बदरपुर चलोगे भैया ?"
"हाँ हाँ साहब क्यों नहीं चलेंगे , आइये बैठिये"
"मीटर से चलोगे न?"
"अब इतनी रात गए मीटर से कौन चलता है भैया, दो सौ दे देना, मीटर से भी उतना ही आएगा और इतनी रात गए बदरपुर जाता कौन है, खाली ही आना पड़ेगा उधर से "
"अरे मुझे बदरपुर नहीं प्रहलादपुर जाना है, उससे पहले पड़ेगा " भैया ने बता दिया था, दिल्ली के इस छोर पर अकेले पहली बार जा रहा था।
"सही बताओ" मैंने फिर से पूछा , रात के साथ साथ मेरी भी छटपटाहट बढ़ती जा रही थी और बहुत कुछ चल रहा था दिमाग में जिसे एकांत की जरुरत थी।
"चलो एक सौ अस्सी दे देना, अब बैठो" उसके कहने में ऐसा था कि कहीं मैं दूसरे ऑटो की तरफ न बढ़ जाऊं।
"चलो"
"कौन से रस्ते से चलें भैया ? रिंग रोड ले लेते हैं , जल्दी पहुँच जायेंगे"
दिल्ली अब बचपन की दिल्ली नहीं रह गयी थी, बदल चुकी थी, सडकों का एक मायाजाल बिछ चूका था अब , मैं कहाँ जानता था सब और नहीं जानता हूँ, जाहिर भी नहीं करना चाहता था।
"ठीक है, वही ले लो जिससे जल्दी पहुँच जाएं " कहते हुए मैंने अपना सामान उठा के ऑटो में डाल दिया और बैठ गया।
ऑटो चल पड़ी थी, स्टेशन के बाहर भी भीड़ ही थी, अभी भी लोग आ रहे थे, सबको अपने घर पहुंचना था किसी भी तरह और मैं इस उधेड़ बन में था कि आगे क्या? आगे आकर सड़क और चौड़ी हो गयी थी, फुटपाथ पर कुछ लोग सोये हुए थे, ठंढ की आगोश अपने लिहाफ में बहुत कुछ समेटती है, यह किसी के लिए गर्म तो किसी के लिए ठिठुरती है, कोई बिना किसी सोच के सो रहा होता है आसमान के नीचे तो कोई ब्लोअर से गर्म घरों में भी बेचैनी से इधर उधर करवटें लेता है। लैम्पोस्ट जले हुए थे और सड़कें पहाड़ों सी कहीं ऊपर तो कहीं मैदान की तरह सोई हुईं थीं, दिमाग में घंटे बज रहे थे कि भैया को कैसे पता चला मैं दिल्ली आ रहा हूँ, फेसबुक वाली किताब पर तब उतना आना जाना नहीं होता था कि कहाँ जा रहा हूँ बताता चलूँ।
बचपन के कई किस्से अपनी किस्सागोई लिए उतर जाना चाहते थे आँखों की पलकों पर, ऑटो की आवाज़ और सामने सड़क का शोर मिलकर एक ऐसे एकांत को बना रहे थे जो अब सहा नहीं जा रहा था, अकेले होना अच्छा होता है, लेकिन किसी का अचानक आ जाना और आपके दुःख में शामिल हो जाना आपको हिला जाता है , मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।
नवीन भैया को तब से जानता हूँ जब से खड़ा होना सीख लिया था, कलकत्ते में हम जहाँ रहते थे, हमारा घर बहुत बड़ा हुआ करता था और हम वहां के बड़े लोगों में गिने जाते थे, हमारे घर के सामने एक पोस्टऑफिस था, आज भी है और उसके कोने पर सीढ़ियों के नीचे एक दुकान हुआ करती थी चाय की, नवीन भैया उसी चाय की दुकान को चलाया करते थे। हमारे घर के नीचे हमारी दुकानें थीं, एक कपडे की, एक जनरल स्टोर, एक आटा चक्की और एक दरजी की दुकान थी जिसे पलान दा चलाते थे, गरीब थे इसलिए उनसे कोई किराया नहीं लिया जाता था बदले में वह हम सबके कपडे सिल दिया करते थे, हम बच्चे उन्हें दादू कहा करते और वह दिन भर हमारे साथ खेल पुचकार करते। नवीन भैया दुकान पर किसी के भी आने पर चाय ले आया करते और हम बच्चे उन्हें भैया कहते, उनकी उम्र कोई ज्यादा ना थी, रही होगी कोई दस बारह साल, घर से कुछ दूर पर एक स्कूल था, कमला हाई स्कूल, वहीँ पढ़ते थे भैया, पढ़ते क्या थे सिर्फ परीक्षा देने जाते और कभी कभी स्कूल भी ऐंवई चले जाते। बड़े घर के थे हम लेकिन पापा नहीं चाहते थे कि हमें कोई अलग से सम्मान मिले बल्कि सब के साथ घुल मिल कर रहें, सबके प्रति इज्जत हो, तो नवीन भैया हम बच्चों के साथ खेलते, हम उनकी दुकान पर भी जाकर बैठ जाते और वह हमें कुछ न कुछ खिला दिया करते। पापा के लाख कहने पर भी वह पैसे न लेते, इस तरह नवीन भैया हमारे बड़े भाई थे और हम उनके छोटे भाई, एक बार कहीं बदमाशी करते हुए धर लिया गया, थोड़ा बड़ा हो गया था, उनका थप्पड़ आज तक याद है। घर आने पर जो जुत्तम जुताई पापा के हाथों हुई वह अलग, कुछ दिन नवीन भैया से कट्टी रही और फिर कब बोल चाल हो गयी, पता ही नहीं चला। नवीन भैया दिल्ली बहुत पहले आ गए थे, तीन भाइयों ने मेहनत करके न सिर्फ अपना घर बनाया बल्कि समाज में देखे जाने वाले नज़रिये को भी बदला, इससे बड़ी बात कुछ नहीं हो सकती। हमारे लिए वह जैसे पहले थे, वैसे ही आज भी हैं और रहेंगे।
प्रहलादपुर आ गया था और भैया भी वहीँ चौराहे पर अपनी बाइक लिए खड़े थे, घडी में सुई साढ़े बारह बजा रही थी। घर पहुंचा, "बताया क्यों नहीं कि दिल्ली आ रहा है?"
"अरे अचानक ही प्लान बन गया "
"पता है मुझे तेरा अचानक, मुझे मत बना "
ऐसी ही कुछ बातों के बीच हमने खाना खाया और मैं उनके घर के आगे वाले कमरे में सो गया, नींद जैसे दबोचे खड़ी थी, बिस्तर पर गिरते ही कब नींद आयी पता ही नहीं चला, सारी सोच, सारी समस्याएं न जाने कहाँ गायब हो गयीं, वैसे यह भी एक सच है कि जब पेट में भोजन और सर पर छत हो तो कई समस्याएं स्वतः ही ख़त्म हो जाती हैं और मेरे पास तो अब बड़े भाई का स्नेह भी था।
बचपन के कई किस्से अपनी किस्सागोई लिए उतर जाना चाहते थे आँखों की पलकों पर, ऑटो की आवाज़ और सामने सड़क का शोर मिलकर एक ऐसे एकांत को बना रहे थे जो अब सहा नहीं जा रहा था, अकेले होना अच्छा होता है, लेकिन किसी का अचानक आ जाना और आपके दुःख में शामिल हो जाना आपको हिला जाता है , मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।
नवीन भैया को तब से जानता हूँ जब से खड़ा होना सीख लिया था, कलकत्ते में हम जहाँ रहते थे, हमारा घर बहुत बड़ा हुआ करता था और हम वहां के बड़े लोगों में गिने जाते थे, हमारे घर के सामने एक पोस्टऑफिस था, आज भी है और उसके कोने पर सीढ़ियों के नीचे एक दुकान हुआ करती थी चाय की, नवीन भैया उसी चाय की दुकान को चलाया करते थे। हमारे घर के नीचे हमारी दुकानें थीं, एक कपडे की, एक जनरल स्टोर, एक आटा चक्की और एक दरजी की दुकान थी जिसे पलान दा चलाते थे, गरीब थे इसलिए उनसे कोई किराया नहीं लिया जाता था बदले में वह हम सबके कपडे सिल दिया करते थे, हम बच्चे उन्हें दादू कहा करते और वह दिन भर हमारे साथ खेल पुचकार करते। नवीन भैया दुकान पर किसी के भी आने पर चाय ले आया करते और हम बच्चे उन्हें भैया कहते, उनकी उम्र कोई ज्यादा ना थी, रही होगी कोई दस बारह साल, घर से कुछ दूर पर एक स्कूल था, कमला हाई स्कूल, वहीँ पढ़ते थे भैया, पढ़ते क्या थे सिर्फ परीक्षा देने जाते और कभी कभी स्कूल भी ऐंवई चले जाते। बड़े घर के थे हम लेकिन पापा नहीं चाहते थे कि हमें कोई अलग से सम्मान मिले बल्कि सब के साथ घुल मिल कर रहें, सबके प्रति इज्जत हो, तो नवीन भैया हम बच्चों के साथ खेलते, हम उनकी दुकान पर भी जाकर बैठ जाते और वह हमें कुछ न कुछ खिला दिया करते। पापा के लाख कहने पर भी वह पैसे न लेते, इस तरह नवीन भैया हमारे बड़े भाई थे और हम उनके छोटे भाई, एक बार कहीं बदमाशी करते हुए धर लिया गया, थोड़ा बड़ा हो गया था, उनका थप्पड़ आज तक याद है। घर आने पर जो जुत्तम जुताई पापा के हाथों हुई वह अलग, कुछ दिन नवीन भैया से कट्टी रही और फिर कब बोल चाल हो गयी, पता ही नहीं चला। नवीन भैया दिल्ली बहुत पहले आ गए थे, तीन भाइयों ने मेहनत करके न सिर्फ अपना घर बनाया बल्कि समाज में देखे जाने वाले नज़रिये को भी बदला, इससे बड़ी बात कुछ नहीं हो सकती। हमारे लिए वह जैसे पहले थे, वैसे ही आज भी हैं और रहेंगे।
प्रहलादपुर आ गया था और भैया भी वहीँ चौराहे पर अपनी बाइक लिए खड़े थे, घडी में सुई साढ़े बारह बजा रही थी। घर पहुंचा, "बताया क्यों नहीं कि दिल्ली आ रहा है?"
"अरे अचानक ही प्लान बन गया "
"पता है मुझे तेरा अचानक, मुझे मत बना "
ऐसी ही कुछ बातों के बीच हमने खाना खाया और मैं उनके घर के आगे वाले कमरे में सो गया, नींद जैसे दबोचे खड़ी थी, बिस्तर पर गिरते ही कब नींद आयी पता ही नहीं चला, सारी सोच, सारी समस्याएं न जाने कहाँ गायब हो गयीं, वैसे यह भी एक सच है कि जब पेट में भोजन और सर पर छत हो तो कई समस्याएं स्वतः ही ख़त्म हो जाती हैं और मेरे पास तो अब बड़े भाई का स्नेह भी था।
- नीरज

:) अच्छी है ।
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