10 फ़रवरी 2016

इश्क़

ये इश्क़ है मेरी जान,
कहाँ ऐसे गुम हो जाएगा,
घुला है साँसों में यूँ,
कि अब मरने के साथ ही जाएगा.
बड़े दिनों बाद आज फिर तारी है इश्क़, अपने पूरे शबाब में, सोच ही नही पा रह हूँ कुछ, मन है कि उड़ता ही जाता है, उड़ता ही जाता है जाने किन दिशाओं में.
कहता है खुदा,
मुझे बुतो में ना तलाश,
और प्यार के सारे कशीदे,
तू बुतो पर ही लिखता है,
अब तू ही बता,
तू "खुदा" है या "रकीब" मेरी मुहब्बत का,
या तुझे भी अब शामिल कर दूं,
काफिरों की फेहरिस्त में.
कई सारे ख़याल, जो कहीं सो गये थे, अचानक ही उठ गये हैं तर-ओ-ताज़ा हो के. ढोल नगाड़े सब बजने लगे हैं, फ़िज़ाओं में घुल गयी है खुश्बू मुहब्बत की और तुम मुस्कुरा के उन्हे हरा भरा किए जा रही हो.
ग़ालिब ये इश्क़ नही आसां,
वाह वाह, वाह वाह,
इक आग का दरिया है,
क्या बात, क्या बात,
अमा, ग़ालिब चाचा दरिया तो हमें दिखता नही, पतझड़ में लाल गुलमोहर ज़रूर जलते से दिखते हैं, क्या यही वो दरिया है, जिसमे इश्क़ डूबता है, अगर ऐसा है तो सचमुच यह बड़ा खूबसूरत है, हम भी कभी कभी सोचा करते थे कि चाचा इतनी आसानी से तो कुछ कहते नही थे, और जब कहा भी तो इश्क़ और आग का दरिया, सच कहें तो उसी दिन हमने ठान लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए हम इश्क़ ना करेंगे, पर भला हो हमारे फिराक़ गोरखपुरी बाबा का कि उन्होने बड़े ही प्यार से हमारे कानो में घोल दिया "पाल ले एक रोग नादां" और सच कहते हैं वो तब का दिन था और ये आज का दिन है, हमने सिर्फ़ और सिर्फ़ इश्क़ किया है, कभी ज़िंदगी से तो कभी अपनी मुहब्बत से.
ये खूबसूरती जो आज फैली है फ़िज़ाओं में,
यही इश्क़ की रोशनी है,
कहता है खुदा गर काफ़िर हमें तो कहता रहे.
एक दिन खुदा से ही पूछ लूँगा,
गर इतनी ही नफ़रत है मुहब्बत से,
तो बता, मगरिब से तेरा वास्ता क्या है?
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कुछ यूँ शामिल हुई है तू ज़िंदगी में,
कि खूबसूरती ने भी अपना नाम बदलकर मुहब्बत रख लिया है.
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लगता है शायरों की आज रहमत है,
जो आसमान से हर्फ उतरने लगे हैं,
इश्क़ की खिदमत में,
यह नसीब ही तो है मेरी मुहब्बत का,
कि फ़िज़ाओं में भी चर्चे,
आज इश्क़ के हैं.
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तू "खुदा" है या "रक़ीब" मेरे इश्क़ का,
जो नाज़िम रहा तू हर इज़हार में.
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नक़ार देता मैं तुझे तेरे ही अख्तियार से,
लेकिन तू तो हर वक़्त फ़ानूस बना रहा मेरी,
कैसे कह दूं आज कि इश्क़ क़ाफिरी है,
पता है मुझे, इसमे तेरी भी रज़ामंदी है.
- नीरज

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