इस दुनिया से उस दुनिया तक,कहीं तो होगी कोई राह,
कहीं तो बनी होंगी कुछ सीढ़ियाँ,
जिनसे होकर जाना होता होगा वहाँ,
या फिर कुछ चीज़ें सिर्फ़ बातों में ही अच्छी लगती है,
"मन का बहलाव"
होता कुछ भी नही,
और हम मानकर चलने लगते हैं,
बहुत कुछ,
बना लेते हैं परम्परायें,
भगवान, राक्षस, शैतान, खुदा, पैगंबर,
दे देते हैं अनेकों नाम,
उसे,
जिसके अस्तित्व को भी कभी महसूस नही किया,
लेकिन बन जाता है, अपने चारो ओर,
एक ऐसा चक्र,
कि वह नही होकर भी होता है हर जगह,
हमारे चारो ओर,
हमेशा, "अनंत तक",
हाशिए पर लटके प्रमाणों से हम खुश होते रहते हैं,
और एक सीमा से बाँध लेते हैं खुद को,
और टाँग देते हैं अपनी देह,
विचारों की,
वृक्ष की सबसे कमजोर साख से,
और उसके होने का एहसास,
रोज़ महसूसते हैं,
उसकी तरफ से नज़रें घुमा कर,
कहीं दूर तक बिधे रहते हैं,
खून से तर बतर,
उस रहस्यमय मायाजाल में,
और घोटते रहते हैं गला,
अपने अंदर छिपे इंसान का,
हमेशा, लगातार।
- नीरज
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