शाम ढल चुकी थी, रात बढ़ने लगी थी, समुद्र की लहरों पर रोशनी ने अपना डेरा डाल लिया था. रह रह कर चमक उठती थी उसकी निगाहें पानी की लहरों को रोशनी की रोशनाई में नहाते हुए, सामने टेबल पे रखा काग़ज़ खिड़की से होकर आती हुई हवा से उड़ने लगता था, पेपरवेट शायद इसी समय के लिए इज़ाद किए गये थे जिससे उड़ते पंखों को दबा कर रखा जा सके, वह अब भी चुपचाप खड़ा था, उसकी पीठ अब खिड़की की तरफ हो गयी थी और निगाहें अटक गयी थी पेपरवेट से दबे हुए फड़फड़ाते काग़ज़ पर. कमरे की रोशनी ज़्यादा नही थी और बाहर की रोशनी कमरे में पहुँच कर अपना अधिपत्य जमा लेना चाहती थी, टेबल पर बिखरी हुई किताबें कुछ कहानियाँ लिखना चाहती थी, लेकिन कलम शांत पड़ी हुई थी, किताबों मे वह साहस अब भी नही था कि वे कलम से लड़ाई लड़ सकें, हमेशा से ही कलमें किताबें लिखती आई हैं, किताबों ने कलम नही गढ़ा. लेकिन आज किताब के पन्ने रह रह कर सिहर उठते थे, ना जाने कितने इतिहास उन पन्नों में जब्त थे, वह भी जिन्हे कलमें लिख नही पाईं, लेकिन पन्नों ने निगाहों से उन्हे जब्त कर लिया अपने अंदर, किताबों के वह पन्ने अपने अंदर ज़ज़्ब उन कहानियों को आज लिख डालना चाहते थे, लेकिन कलम की रोशनाई का वह ज़ज़्बा कहीं जब्त हो गया था, उसके अंदर का सिपाही शहीद होकर काली इबारतों में चुनवा दिया गया था, और हर इबारत ज़िंदा होकर जल जाना चाहती थी. हवा तेज़ हो गयी थी, उसके अंदर का इंसान जिंदा हो जाना चाहता था, वह फिर से घूम गया खिड़की की तरफ, और समुद्र की लहरें सिमटती चली गयीं उसकी निगाहों में, खारापन उसकी रगों से निकलकर बहने लगा था, हर आँसू मीठा होने लगा था, हर जंगल फिर से बढ़ने लगे थे, ज़ख़्म भरने लगा था, और पूरी की पूरी कायनात दर्द से निज़ात पा चुकी थी, और उसकी आँखों से एक कतरा चुपके से ढूलक गया उसके गालों पर, किताब के पन्ने चुप हो गये, कलम खड़खड़ाते हुए नीचे जा गिरी, पूरा का पूरा अलिखा इतिहास रोशनाई में बह गया और समुद्र लहराकर साहिल से टकराकर वापस लौट गया.
सुबह का सूरज एक सिपाही की मौत पर रो रहा था, जो कभी नही लिख पाया सच............लेकिन उसके खून से क्षितिज लाल हो गया था, और कोई प्रवासी पक्षी सूरज की तरफ उड़ते हुए काले रंग में किसी कैमरे के लेंस में क़ैद हो गया. दुनिया वैसी ही चलती रही, लेकिन खिड़की के पर्दे उसकी कहानी के गवाह थे जो अब हवा के बहने पर भी तन कर खड़े रहते हैं, किताबों के हर्फ बर्फ में तब्दील होकर जम गये थे, उन्हे लिखने वाला अब कोई नही है.
सुबह का सूरज एक सिपाही की मौत पर रो रहा था, जो कभी नही लिख पाया सच............लेकिन उसके खून से क्षितिज लाल हो गया था, और कोई प्रवासी पक्षी सूरज की तरफ उड़ते हुए काले रंग में किसी कैमरे के लेंस में क़ैद हो गया. दुनिया वैसी ही चलती रही, लेकिन खिड़की के पर्दे उसकी कहानी के गवाह थे जो अब हवा के बहने पर भी तन कर खड़े रहते हैं, किताबों के हर्फ बर्फ में तब्दील होकर जम गये थे, उन्हे लिखने वाला अब कोई नही है.
- नीरज

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21 - 04 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2319 में दिया जाएगा
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
परिचर्चा में सारी रचनायें एक से बढ़कर एक हैं, मेरी रचना को भी उनमें स्थान देने के लिए हर्दिक आभार दिलवाग जी.
हटाएंबहुत बढ़िया लिखा है..
जवाब देंहटाएंहर्दिक आभार!!
हटाएं