20 मार्च 2016

उसने कहा था

सने कहा था कि कुछ ना कहना लेकिन समय की परतों पर जमती धूल ने उसे और उसके कहे को कहीं भुला दिया, अब ......अब क्या? ज़िंदगी? लेकिन ज़िंदगी भी इतनी आसान कहाँ......उसने कहा था, लेकिन उसका कहा मेरे अंदर हर्फ हर्फ वैसा ही रहा जैसे पतझड़ की शाम में गिरते पत्तों के बीच खड़ा मेरा वज़ूद कुछ भी नही देख पाता।
लिखता रहता हूँ कुछ कि भुला सकूँ,
कि उसने कहा था,
कुछ ना कहना,
और समय सिमटके,
फिर वहीं पहुँच जाता है,
जहाँ से शुरू होती है हर यात्रा जीवन काल की।
दुनिया गोल है, लेकिन क्या सब कुछ गोल है, कुछ तो ऐसा ज़रूर होगा जो गोल नही है, लेकिन जब भी इबारतों में छिपे हर्फ बोलते हैं, कतरा कतरा जम कर बहने लगता है, और समय के आयामों में तैरते हुए वह फिर हूबहू ठीक उसी तरह कैसे खड़े हो जाते हैं सामने?
उसने कहा था कि जो भी है, भुला देना
लेकिन कहाँ इतना आसान होता है भूलना?
भावों में उतर कर जम जाना,
बर्फ होना नही होता,
बल्कि यादों का पत्थर हो जाना होता है,
उन तमाम किताबों का एक हो जाना भी होना होता है,
जो यह चीख चीख कर कहती हैं,
कि गोल दुनिया नही होती,
गोल वह विंदु होता है,
जिससे हम सब एक टक लटके हुए रहते हैं।
ऐसा बहुत कुछ अब भी है, जो शायद प्रेम नही है, आकर्षण के भुलावे में भी मत जाना, वह भी प्रेम का ही एक रूप है, लेकिन यह कहना कि प्रेम नही है, कदाचित् सच भी नही, उसने कहा था, प्रेम छलावा है, और वह आज तक उसी प्रेम के लिबलिबे जालों में बिधी हुई समय के ना जाने कितने आयामों में बह रही है, उसका कहा अब भी वैसे ही मेरे इर्द गिर्द है, जैसे उसका मुझसे प्रेम।

- नीरज

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