24 सितंबर 2013

अनसुलझा प्रेम

मुंबई के उस वीरान से टापू पर बैठा कुछ सोच रहा था, क्या सोच रहा था, ये याद नहीं लेकिन कुछ था जो अंतर्मन में घुमड़ घुमड़ के बौखलाया हुआ था, शायद मैं भी, लेकिन अब नहीं याद आता कि वो क्या था, जो भी था बीते वक़्त में झाँकने पर ऐसा  ही कुछ होता है, एक चलचित्र अचानक ही चलने लगता है लेकिन वो क्यूँ चलता है कुछ समझ में नहीं आता, अगर कुछ आता है तो वह यह कि वह अतीत था, जो बीत गया उसे बीत जाने दो, लेकिन क्या इतना आसान है बीते हुए पल भूलना, शायद मेरे लिए तो नहीं, और सबसे बड़ी बात यह कि ऐसे समय में ऐसा क्यूँ लगता है कि कहीं किसी बारिश में जाकर खूब भीगा जाये, कि आंसुओं को कोई देख ही न सके।
वह आज फिर कई सालों बाद मेरे सामने खड़ा था, सॉरी खड़ा है, और उसके इस खड़े होने की वजह से कुछ वजूहात फिर जिंदा हो गए हैं, जिन्हें मैंने सालों पहले लखनऊ के लाल पुल पर खड़े होकर घाघरा में बहा दिए थे, और यह सोचकर खुश था कि चलो अब फिर कभी इनसे नहीं मिलूँगा और न ही करूँगा ज़िक्र कि फिर न खड़े हों देवदार के जैसे मेरी ज़िन्दगी में ये हालात फिर से, लेकिन वक़्त को देखो आज फिर लेकर खड़ा हो गया है विस्मृतियाँ जिन्हें स्मृतियों ने स्वीकारने से ही इनकार कर दिया था।

१)
हजरतगंज की वह शाम कुछ अजीब थी, अभी कुछ देर पहले ही उतरा हूँ हाथों में थैला टाँगे चारबाग पर, कहाँ जाऊं कुछ समझ में नहीं आ रहा, हजरतगंज चलते है, कुछ न कुछ तो हो ही जायेगा रहने का इंतज़ाम, यूँ तो कईयों को जानता हूँ लखनऊ में लेकिन इस बार कहीं जाने का दिल नहीं हो रहा था, घर छोड़ते समय यह सोचकर निकला था कि अब वापस नहीं जाऊंगा, कुछ भी हो। अपने आप को समझाते हुए बस चल रहा हूँ, चलता ही जा रहा हूँ, कहाँ जा रहा हूँ नहीं जानता लेकिन चल रहा हूँ, बरिस्ता के सामने पहुंचकर कदम कुछ ठिठकते है, एक कॉफ़ी पी लूँ। 
बरिस्ता के उस कोने की टेबल पे बैठा चुस्कियां लेता हुआ यही सोच रहा था कि कहाँ जाऊं, सामने पेपर पर कुछ बना रहा हूँ, आड़ी तिरछी रेखाएं, दरवाज़े के पास वाली टेबल पे आई आई एम् के कुछ स्टूडेंट्स बहस कर रहे है, उनके एक हाथ में कलम और दुसरे में एक नोटपैड (उफ़, कितने सर्वे करे थे हमने भी, कितने सवाल और उतने ही ज़वाब, जागती रातों में आसमान में टंगे तारों को भी देखकर सोचा करता था की कहीं इनका सर्वे करने को न मिल जाये और फिर लैपटॉप और कंप्यूटर पर न जाने कितनी डाटा एंट्री, एनालिसिस, सोर्टिंग और प्रूफिंग, फिर भी बॉस की आँखें ऐसे देखती थी जैसे चोरी का सर्वे हो।), कुछ कपल्स भी बैठे हुए हैं अलग अलग कुर्सियों पर अपना डेरा जमाये हुए, लेकिन एक कपल पर निगाहें जा कर टिक जाती हैं, लड़का लड़की से कुछ कहता है और लड़की उसकी बातों को सुनकर खुश नहीं दिखती लेकिन उसकी आँखें बहुत कुछ कहती हैं, वह सदमे में थी, ऐसा क्या कह दिया था उस लड़के ने या फिर मांग लिया था उससे ऐसा कुछ जो कि ग़लत था, जो भी हो मैं उसकी आँखों को अपने तरीके से ट्रांसलेट करने की कोशिश में लगा हुआ था, मेरी परेशानियां कुछ पल के लिए कहीं गुम हो गयीं थी, ज्यादा बड़ी आँखें नहीं थी उसकी, छोटो छोटी लेकिन इतनी गहरी थीं कि उनमे आसानी से डूबा जा सकता था। अचानक दोनों उठ खड़े हुए और बाहर निकल गए, मैं अपनी ही सोच में मस्त था, सारी परेशानी गायब, क्या सोच रहा था, नहीं याद, फिर बाहर निकलकर एक सिगरेट जला ली, हज़रतगंज की शाम भी उस सिगरेट के धुएं में डूब गयी थी, लेकिन मैं सोच रहा था कि क्या बोला था उस लड़के ने? क्यूँ कसमसाई सी लग रही थी वो? खैर रात स्टेशन पर बीती, दिसम्बर के जाड़े में स्टेशन की चाय और अच्छी हो जाती है, और सिग्नल पर कंपकंपाती ओस मांग लेती है कुछ गर्मी, दूर पटरियों पर ओस गिर रही थी, कभी लाल, कभी हरी, कुछ नीली भी थी।

२)
गोरखपुर की दोपहरी भी कभी कभी अच्छी लगती है और खास कर के तब जब आप बाल विहार में बैठे हों, दुनिया भर के गपैत यहीं आते हैं और पुर्वाञ्चल की गप्पबाजी को भला कोई पछाड़ सका है। कॉफी का मग हाथ में लिए हुए मैं इंतज़ार कर रहा था उसका, गर्मी दो दिनों में कुछ बढ़ गयी थी, फिर भी मैं कॉफी पी रहा था, लेकिन बस पी रहा था, और माथे पर पसीने की बूंदे ओस की तरह बैठी हुई थीं, कभी कभी अपने टी शर्ट की बाँह से पोछ लिया करता था उन्हें, लेकिन कॉफी बड़ी सोंधी थी। अचानक दिखी वो बाल विहार के गेट पर, इतनी पतली कि फूंक दो तो उड़ जाये पत्ते की मानिंद, छोटी छोटी आँखें, हाथों में एक बैग और वैसे ही छोटे छोटे कदम भरती हुई वह मेरे पास आ ही गई, उसकी आँखों में एक बचपना था, अबोध बचपना, लेकिन कुछ दर्द भी थे, कुछ वैसे ही जो मैंने पहली बार उसकी आँखों में देखा था, कुछ था जो उसको सालता था लेकिन बोलने की हिम्मत नहीं थी उसके अन्दर, क्या दर्द था, भगवान जाने। 
खैर, यह हमारी पहली ऑफिसियल मुलाक़ात थी, उसका एम बी ए ख़त्म होने वाला था और उसे एक अदद नौकरी की तलाश थी, उसके कॉलेज से कैंपस प्लेसमेंट से कुछ नौकरियाँ तो आई थीं, लेकिन उसका इंटरेस्ट नहीं था उन्हें करने में या फिर वह उन्हें अपने लायक नहीं समझती थी, छोटी छोटी इन आँखों के सपनों की उड़ान का अंदाजा तब मुझे पहली बार हुआ था, लेकिन उन परों पर रखे हुए बोझ से वह नाकाम हो जाती थी उड़ने में, जाने क्या दर्द था।
कुछ देर बात करने के बाद यह तय हो गया था कि वह अब मेरे साथ काम करेगी, मेरे सपनों में अपने सपनों का छौंका लगाएगी, और फिर, फिर क्या? वह जैसे आई थी वैसे ही छोटे छोटे कदमों से चली गयी, मैंने कॉफ़ी भी पूछा, लेकिन उसने मना कर दिया, बाद में ख़याल आया कि इस भरी दोपहरी में कॉफ़ी की सोंध सिर्फ मुझे ही अच्छी लग सकती है, दूकान वाले ने भी कई बार कन्फर्म करा था कि मैं कॉफ़ी ही मांग रहा हूँ न मई की इस दोपहर में, बाहर पीपल के पेंड से कुछ टूटी टहनियां ऐसा प्रतीत होती थी कि अब चटक जाएँगी, धीरे धीरे शाम होने को आ गई थी और मैं लम्बे लम्बे कदम लेता हुआ बाल विहार से बाहर गोलघर की चीखती चिल्लाती सड़क पर आ गया था और गाँधी गली के कोने वाली बाटा की दूकान के पास बैठा मोची, जाने क्यूँ लगा मुझे ही देख रहा है अपनी लाल लाल आँखों से, न जाने क्यूँ सोचने लगा कि इतनी दूर और तेज भागूं कि वो समझ भी न पाए कहाँ गया मैं, लेकिन मुझे जाना भी था गाँधी गली में ही, खैर मानव जन्म में इतना कुछ तो करना ही पड़ता है,पीपल के पेंड से ढेर सारे कौवे एक साथ उड़े थे।

३)
उससे लगातार बात करते हुए अब कई दिन हो गए थे, शायद महीना लगने वाला है, लेकिन कैसी बात.……… रात भर एस एम एस, और रेडियो पर होने वाली बातें, कौन सा गाना किस चैनल पर आ रहा है, क्या बोल हैं उसके, कुछ गाने जो उसे बहुत पसंद थे, बताते हुए चहकने लगती थी, इसी दौरान पता चला कि वो किसी(वही बरिस्ता वाला लड़का, जिसके साथ मैंने उसे पहली बार देखा था, उस तनहा शाम को) से प्रेम करती है, अब यह प्रेम ही था या फिर कुछ और, या फिर मजबूरी, समझ में नहीं आ रहा था और एक दिन नशे में मैंने उसे तीन जादुई शब्द बोल ही दिए, बिना कुछ सोचे समझे।
लखनऊ के उस चौराहे पर जहाँ शंकर जी की बड़ी सी मूर्ति है और हनुमान जी का एक बहुत पुराना मंदिर भी कोने पर है,मैं खड़ा सोच रहा था कि ये क्या कर दिया मैंने, क्या मैंने सही किया, नहीं करना चाहिए था मुझे, बहुत कुछ समझाए जा रहा था मैं अपने आपको, लेकिन कहीं कुछ था जिसने बाकी सारे ख्यालात दिल से दूर कर दिए थे, बस इतना याद था कि मैंने उसे क्या बोला है, और अब अगर बोल दिया है तो क्या उसपे अड़ नहीं सकता, इतनी ग़लतियाँ की है ज़िदगी में, एक अच्छा काम भी नहीं कर सकता, क्यूँ समझा रहा था मैं अपने आपको इतना ज्यादा, आज तक नहीं समझा जबकि मैं बड़ी आसानी से उस मकड़जाल से निकल सकता था जो मेरे ख्यालों पर उस समय अपने पूरे जी जान से हावी था। 
पिकनिक रोड पर खड़े खड़े जब न रहा गया तो बाइक स्टार्ट करके यूँ ही चल पड़ा, सीतापुर रोड पर आगे बढ़ने पर लखनऊ कुछ खुल सा जाता है, सडकें चौड़ी हो जाती हैं, भले ही टूटी हुई हों, शाम धीरे धीरे काली रात बनने पर अमादा थी, बाइक की स्पीड मैंने बढ़ा दी थी, ऊपर चाँद मेरे साथ दौड़ रहा था और नीचे काली सड़क पीछे छोडती जाती थी टायरों के निशान, और मेरा दिमाग सुन्न था, बख्शी का तालाब आ गया था, सर बहुत तेज घूम रहा था, अभी भी नहीं पता था कहाँ जा रहा हूँ, एक सिगरेट ली और जला ली, सामने चन्द्रिका देवी जाने वाली सडक का द्वार था, मैं उधर ही बढ़ चला, काली रात, सूनी सड़क, मैं और उसकी छोटी छोटी समंदर वाली आँखें, कुछ कहीं डूब गया था या फिर डूब रहा था, बाइक चली जा रही थी, सड़क भाग रही थी और साथ में भाग रहा था मेरा दिमाग भी.....................................................................रात बढ़ चली थी, चाँद सिर पर चमकने लगा था। 

४)
उसने मुझे मना नहीं किया, मिलने लगी मुझसे लेकिन उसे भी ना नहीं कर पायी थी अभी, दूर भागती थी उससे, लेकिन क्या दूर भागना किसी समस्या का हल है, अगर भागना ही हल होता तो दुनिया कब का पलायन कर गयी होती, वह भी पलायन की ही राह पर थी, एक महीन सी लाइन भर केवल रह गयी थी, उसके और पलायन के मध्य, लेकिन उसका जाना क्या मैं झेल पाता, यह भी सोचने वाली बात है, खैर मैंने सोचना छोड़ दिया है, सोचने से समस्याएं बढती हैं, उनका हल बात चीत में है, न कि चुप बैठकर सोचने में।
एक दिन उस लड़के का फोन आया, जी भर के गालियाँ सुनाई और कहा "देख अब उस रांड का क्या करता हूँ, बहुत गुलछर्रे उड़ा रही है न तेरे साथ, तू अब देखता जा कि कैसे बीच बाज़ार नीलाम करूँगा उसे, तू भी आ जाना अगर खुलेआम तमाशा देखना हो, क्या पता तुझे भी कुछ मिल जाये.............।" 
अजीब उहापोह थी, अजीब सी जलन, क्या करूँ मैं, कुछ कर भी नहीं सकता था, उसने मना कर दिया था, बात करना भी बंद कर दिया, मिलना तो दूर की बात थी। फिर एक दिन उसकी कॉल आई, मिलना चाहती थी, उसकी आवाज़ का वह अबोध बचपना कहीं गुम हो गया था, कुएँ में चिल्लाने से उत्पन्न प्रतिध्वनि के बाद के सन्नाटे जैसी लग रही थी उसकी आवाज़, फिर उसने कहा, " जल्दी आना, मैं पॉलिटेक्निक चौराहे पर पहुँच रही हूँ।" और लाइन कट ........मेरे कुछ बोलने से पहले ही।
पॉलिटेक्निक चौराहे की चीखती चिल्लाती सड़क के एक कोने पर मुझे वो मिल गयी और उसे लेकर मैं कहाँ चला, मुझे कुछ नहीं पता था, हाथ एक्सेलरेटर पर थे, और पाँव गियर पर, कट, रफ़्तार कम, कट , रफ़्तार ज्यादा और भागती सडकें, छूटता लैंडस्केप।
अम्बेडकर पार्क के पीछे वाली सड़क मुझे बहुत अच्छी लगती है, वहां गाड़ियाँ भी कम आती हैं और शान्ति भी रहती है, फिर सड़क का घुमाव बहुत ही सुन्दर प्रतीत होता है, अगल बगल इतनी जगह भी है कि आप बाइक खड़ी करके बातें भी कर सकते हैं, मैंने बाइक वहीँ पर रोक दी, वह उतरी और मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी, कुछ दिन हो गए थे देखे उसका चेहरा, लेकिन वह बदल चुकी थी, आँखों के नीचे काले गढ्ढे बन गए थे और ऐसे निशान अभी भी गोचर थे जो यह आसानी से बता रहे थे कि अभी आंसू सूखे ज्यादा वक़्त नहीं बीता है। उसने मेरी आँखों में देखा और नज़रें नीचे करके मुझे भींच कर पकड़ लिया, और पहली बार उसने मुझे कहा, "आई लव यू" और "उसने मुझे मारा है, मैं जहाँ पी जी में रहती हूँ, उन लोगों ने पापा को भी तुम्हारे बारे में बता दिया है, मुझे ही गलत साबित करने पे लगे हैं सब लोग, वह मुझसे हमबिस्तर होने को कहता है, कहता है कि मेरी नंगी तसवीरें खींचेगा और तुम्हे एम् एम् एस करेगा, उसने मेरी टी शर्ट फाड़ दी परसों जब घर पर कोई नहीं था और अपने लात से मेरे पेट पर मारा है, वह जो मांग रहा मैं नहीं दे सकती उसे, कैसे दे दूँ, मैं रांड थोड़े ही हूँ।" और सुबक सुबक के रोने लगी, मैं हतप्रभ था, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था की क्या करूँ क्या न करूँ, दूर आसमान में सूरज डूबने वाला था, एक लाल गोला धीरे धीरे ललाता जा रहा था, स्ट्रीट लाइट्स जलने लगी थी और पीली रौशनी सड़क पर अपनी आबरू खोले फ़ैल गयी थी, कुचली हुई।

५)
गोमती का वह लाल पुल बड़ा ही फेमस हो गया है, जबसे ग़दर की शूटिंग हुई वहां, शाम को ट्रैफिक जब उस पुल को रौंदता हुआ गुजरता है तो उफ़ भी नहीं कहता या शायद कह ही नहीं पाता होगा और हज़ारों गाड़ियाँ उसे रोज़ रौंदते हुए उस पार/इस पार आया जाया करती हैं, पुल से गंज की तरफ बढ़ते समय कई पार्क पड़ते हैं, उन्ही पार्कों में से एक पार्क के बीचो बीच आज वह मेरे सामने खड़ा था, उसके कुछ दोस्त भी उसके साथ थे, लकिन मुझे देखते ही वह चुप चाप चले गए थे(गलती या तो उसकी थी या फिर मेरी कि मेरे दोस्तों के भाई थे वो सब, एक डरा हुआ चेहरा तो दूसरा हतप्रभ, लेकिन किसी ने कुछ नहीं बोला, दोनों जैसे आये थे वैसे चले गए और रह गया वो मेरे साथ अकेला), अब वह थोडा डरा हुआ लगा, लेकिन फिर भी कुछ था कि वह हंस रहा था, उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन शायद कह नहीं पा रहा था। मैंने कहा, "तो?" ...........................................और चुप हो गया, उसने कहा " ले लिए मजे कि अभी लेना बाकी है, भाई क्यूँ तू उस खेली खाई माल के पीछे पड़ा है, हज़ारों मिल जाएँगी तुझे अ..................................." इससे पहले कि उसका वाक्य पूरा होता उसके गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ मैं रसीद कर चुका था और रसीद के निशान बहुत ही आराम से देखे जा सकते थे, " क्या तुम अपनी बहन के लिए भी ऐसा ही कहते, और फिर क्यूँ कहते, किसने तुम्हे यह अधिकार दे दिया किसी भी लड़की को ऐसा कहने के लिए, अब सुनो, जाओ उससे माफ़ी माँगों, और फिर आइन्दा उसके इर्द गिर्द भी नज़र मत आना, न तुम और न ही तुम्हारी परछाईं, और उसके ही क्यूँ लखनऊ की किसी भी लड़की के साथ मत दिखना तुम, आगे तुम जैसा सोचो वैसा करना, बाकी के लिए मैं हमेशा तुम्हे कहीं न कहीं मिल ही जाऊंगा।"  
बाहर निकलकर मैंने सिगरेट जला ली थी, शाम होने को चली थी, मौसम अच्छा हो चला था लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कोई तूफ़ान आने वाला है, उस दिन लखनऊ में बहुत तेज़ बारिश हुई थी, और मैं टपकती बूंदों को पानी की शक्ल अख्तियार करते हुए रात भर देखता रहा।

उस दिन के बाद मैं उससे कभी नहीं मिला, ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार से आगे बढती रही, हमने शादी भी कर ली और यादों की पोटरी को मैंने लखनऊ छोड़ते समय गोमती में प्रवाहित कर दिया था, यह कहते हुए कि अब याद मत आना भूल से भी, लेकिन आज वह फिर खड़ा है सामने, उसकी आँखें आज कुछ कहना चाहती हैं, पर शायद मैं ही नहीं सुनना चाहता, उसको धकियाते हुए लगभग मैं आगे बढ़ गया और उसे पीछे छोड़ आया हूँ, बंद बक्से में पड़ी यादों की तरह, जो पानी के बुलबुले की तरह निकलना चाहती हैं यादों के झरोखे से, लेकिन मैंने उससे वादा किया है कि अनसुलझे प्रेम की वह कहानी अब नहीं याद करूँगा और ना ही उसकी आँखों के पोरों पे उसकी याद का एक कतरा भी आने दूंगा, सड़क जो अमूमन भरी रहती है, आज खाली दिख रही है, समंदर की नमकीन हवाएं रह रह कर लिपट जाती हैं, शाम हो गयी है, मैं एक बार घूमकर क्षितिज़ को देखता हूँ जो समुद्र में डूबता जा रहा है, मेरे डूबते मन की तरह। चलूँ, तैयारी करनी है, इस शहर में शायद ये मेरी आखरी शाम है।

-नीरज  

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