18 सितंबर 2013

समय



उसे गए हुए अब छह महीने होने को आ रहे हैं, कितना सही चल रहा था सब कुछ, पानी की तरह ज़िन्दगी ढलान पर फिसलती ही जा रही थी, वैसे ढलान पर हर कोई फिसलता है, बस वक़्त साथ दे। लेकिन कंगूरे को चमकाना भी ज़िन्दगी ही है और हमें चमकाने थे अपने कंगूरे, अपने मकान के आगे लगे उस नेमप्लेट को सजाना भी तो है जो आने वाले समय में हमारे बच्चों और हमारी पहचान बनेगी, कितना सोचते हो तुम? नहीं चाहिए बच्चे हमें, हम तो खुद ही बच्चे हैं जी, क्या बिना सोचे और बच्चों के जीवन नहीं होता क्या? कहकर हंस देती है वो और उसकी हंसी की लय तरंगों में बदलकर हज़ारों किलोमीटर पार करते हुए मेरे मोबाइल के अन्दर गूँज उठती है और फिर ऐसा लगता है जैसे बहुत कुछ बदल गया है, समय परों पे सवार जरुर है लेकिन कहीं ठहरा हुआ सा खुद में सिमटा हुआ है। देखते देखते महीने गुजर गए और यूँ गुजरे जैसे अभी कल की हो तो बात है जब वो मेरे साथ यहीं खड़ी खिलखिला रही थी, और उसकी छोटी छोटी आँखें जैसे अचानक बड़ी हो गयी हों ख़ुशी में छलकती हुई, अजीब शास्त्र है यह जीवन भी, कठिन भी तो सरल भी। उसकी आवाज़ अचानक भारी हो गयी है और मेरे दिल में कुछ शंकाएं अपने आप ही पनपने लगती हैं, फिर उसकी आवाज़ गूंजती है " कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करें, रोज़ वही रूटीन होती है, अच्छा नहीं लगता हमको यहाँ बिलकुल", उसको बहलाने के लिए ही सही मैं कहता हूँ " यहाँ भी तो ऐसा ही था?", और वो बोल पड़ती है " लेकिन फिर भी वहां ठीक लगता था, घर भी वहां से पास था, फिर वहां लाइवली एट्मोससफेयर लगता है, यहाँ तो ज़िन्दगी दौड़ लगाती है बस दौड़ते रहो, तुम भी नहीं हो कि एक झलक देख लूँ गंदे" और उसकी आवाज़ और भारी हो जाती है, फिर कहती है " अच्छा चलो अब सो जाओ, रात ज्यादा हो गई है, तुम्हे तो सुबह सुबह ही ऑफिस जाना है न, चलो सो जाओ, कल बात करेंगे जी मेल पर, लव यू" और फोन कट जाता है, और अकेलापन फिर तारी होने लगता है, उसको कैसे समझाऊं कि सारे शहर एक जैसे ही हैं, उन्हें बदलते हैं रिश्ते और उनकी आंच, और जब ये आंच कम होने लगती है या फिर होती ही नहीं है तो सब कुछ दूर और तनहा लगता है, शायद मैं होता तो ऐसा नहीं सोचती वो, लेकिन मै भी कैसे चला जाऊं, कंगूरे भी तो चमकाने हैं। अचानक से हवा गर्म होने लगती है, गर्मी और वो भी रात में, कुछ अलग नहीं लगता क्या? बाहर रात चमकने लगी है, और आकाश तारों से भरा हुआ मेरी तरफ देख रहा है, सब कुछ गड्ड मड्ड, रात, आकाश, तारे, पानी और उँगलियों में थमी सिगरेट।


रात गहरी हो गयी है, गली के उस कोने पर लैम्पपोस्ट के नीचे कुछ कुत्ते खड़े हैं, मेरी खिड़की के सामने वाला लैम्पपोस्ट अचानक बुझ गया है, रात के सन्नाटे में कहीं पानी के कलकल की आवाज़ प्रतिध्वनित होती रहती है, सोने का दिल हो रहा लेकिन आँख लग ही नहीं रही, कुत्ते भौंकने लगे हैं, शायद दुसरे मोहल्ले का कोई कुत्ता आ गया है, वह एक कोने में दुबका हुआ है और बाकी सारे अपनी जोर आज़माइश लगा रहे हैं, अकेला मिला है, दिखा देंगे आज कि हम भी कोई आलू के छिलके नहीं, यह भी एक एक अजीब बात है कमज़ोर होने पर हर दूसरा बलशाली अपनी जोर आज़माइश करने के लिए तत्पर रहता है, जैसे वक़्त अभी मुझसे खेल रहा है, कभी मैं खेलता था वक़्त के साथ।

-नीरज

4 टिप्‍पणियां:

  1. जैसे वक़्त अभी मुझसे खेल रहा है, कभी मैं खेलता था वक़्त के साथ।
    .....भावपूर्ण नीरज ..
    इस सुन्दर ब्लॉग के लिए अशेष शुभकामनायें एवं बधाई !!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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